पढ़े, मन को स्पर्श करती मुक्ति शाहदेव की कविताएं

मुक्ति शाहदेव झारखंड रांची से हैं. इनकी कविताएं बहुत ही नरमाई से आपके मन को छू जायेंगी, लेकिन बातें बहुत गंभीर कहेंगी आपको मंथन पर मजबूर करेंगी. लेखन शैली भी उम्दा है, जीवन की जद्दोजहद को जिंदगी सादगी से उकेरती हैं प्रेम कविताओं में आपको उतना ही गुदगुदाने का माद्दा रखती हैं. पेशे से मुक्ति शाहदेव शिक्षिका हैं, इसलिए प्रेरक कविताएं बखूबी लिखती हैं:-

शेष है अभी….!
तुमने बढ़ा कर हाथ अपना
थाम लिया था उस दिन
ना केवल एक हाथ
थाम लिया तुमने
वो सब कुछ …..
जो बहुत हो चुका था जर्जर
हरिया गई उस दिन
फिर से एक सूखती सी डार
कि देखा मैंने फिर से
फुनगियों में कोमल पात !
हां, इस प्रचंड ताप में भी
बरसे तुम बनकर
शीतल फुहार
बच गया था
उस दिन बहुत कुछ……
तार तार विश्वास
टूटने को आतुर आस
दिल के कोने में
सहमी हुई मिठास
और…..
…….शांत हो गई थी
एक आग जो आमादा थी
सब कुछ कर देने को खाक !

और मिल गया था जैसे
पछाड़ खाती लहरों को साहिल !
हां ,बची रह गई उस दिन
इंसान को इंसान कह पाने की हिम्मत !
जानती हूं बहुत कुछ है शेष अभी!

खामोश तूफान
सबसे गहरी वाली रात है
पढ़ लेती थी अक्सर
इस मौन को भी
जाने क्यों सन्नाटा भी
हो गया है बहुत खामोश
बाहर उठने को है
एक बवंडर
चलने को है एक आंधी
और अंदर जब्त कर
एक खामोश तूफान
मुस्कुराते हैं हम
नये सफर की तैयारी में ।

बेचैनियां….!
वो जो मुलाकात अधूरी रह गई
काश !
अलविदा कहने से पहले
हो जाती पूरी
ये ख्वाइश भी
रह गई अधूरी….!
और जो कलात्मक फ्रेम में
कांच के पीछे जकड़े हुए से
सज गए हो तुम सेल्फ में
हर दिन तुम्हारी आंखों में भी
दिखती है एक बेचैनी
जो बढ़ा देती है
कई गुना मेरी अकुलाहट को
तुम्हारे कह देने
और मेरे सुनने के बीच
इतनी बड़ी खाई…..!
हर दिन और अधिक
पसरता हुआ सन्नाटा…..!
असामान्य रूप से बढ़ती
मौन चीखें…..!
तेज सायं सायं करती
हवाओं के मध्य
शांत बहती गंगा….!
पावन मंत्रोच्चार
और मणिकर्णिका से आती
चट चट फट फट
की आवाजें
तेज उठती लपटें
साधुओं औघड़ो की तकरार…!
कहां खो गए तुम??
और वह आखिरी मुलाकात की
अधूरी बातों का
सूत्र तलाशती मैं
बहुत एकाकी हो जाती हूं
इन दिनों!

बेचैनियां-2

ये जो मर रही हैं ना
संवेदनाएं सबके अंदर से
क्या तो बनता जा रहा है
इन दिनों आदमी ।
कुछ अजीब सा
पर आदमी तो कतई नहीं वह !
कुछ रूखा सूखा बंजर रंगहीन
और जलता हुआ सा
जमता हुआ सा
बेजान, बदरंग और उद्देश्यविहीन।
ये जो गुजर रहे हैं ना दिन
संक्रमण काल के
क्या कुछ तो छूट रहा पीछे
क्या कुछ तो चला आ रहा
साथ साथ
और कितना कुछ
नजर आ रहा
जुड़ने को बेताब ।
जाने क्या- क्या
और कितनी गहराई तक
उतर रहा अपने अंदर
कुछ बनाता बिगाड़ता सा
तोड़ता गूंथता सा
एकदम अजीब सा ।
…….और इन्हीं दिनों
कितना भटक रहा मन निरूद्देश्य
मथ रही हैं चीजें
बेचैन हो रही रूह
बारंबार !!!
क्या कुछ झटक देना है
और कितना कुछ
बांध लेना है
अपनी गांठ
ऊफ! ये दौर बेचैनियों का!

पुनर्विचार…..!

ठहर जाओ दरिंदों
सुधर जाओ
होश में आओ
शर्म करो भेड़ियों…….
……….!
नहीं ,
यह समाधान कतई नहीं ।
न्याय दो
दोषियों को सजा दो
धरना/जुलूस
नहीं नहीं ….
………!
यह भी समाधान कतई नहीं ।

उठो जागो और
शुरू करो संहार
करो प्रहार
छोड़ दो चोला
बर्दाश्त का
दफन करो इंतजार
न्याय का ।
लड़ना -भिड़ना और
मरना भी होगा
रणचंडी बन
रक्त पान भी करना होगा
गर सिखाना है सबक
भेड़ियों को ।
चलो करते हैं
पुनर्विचार
बेटियों की
परवरिश का ।
कि सक्षम बनें वे ही
रक्षक बनें वे ही
न्याय करें वे ही
हर अन्याय का
स्वयं ही दे सकें
मुहंतोड जवाब
अपनी ओर उठी
हर घृणित
दुस्साहसी और
देह लोलुप नजरों का
ले सकें प्रतिशोध
हर बर्बर कृत्य का
हां ,चलो करें पुनर्विचार
बेटियों की परवरिश का ।

 


 


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