क्या कर्नाटक चुनाव की एकजुटता 2019 के लोकसभा चुनाव तक कायम रहेगी?

कर्नाटक चुनाव के बाद जो कुछ हुआ और जिस तरह से बहुमत ना होते भी भाजपा ने सरकार बनाने का दावा किया और भाजपा को सत्ता से दरकिनार करने के लिए चुनाव से पहले एक दूसरे को जमकर गरियाने के बावजूद कांग्रेस और जेडीएस परिणाम आने के बाद गलबहियां डाले घूमे, उसने यह बात तो साबित कर ही दी है कि कि राजनीति में ‘नैतिकता’ जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं है और यह सिर्फ और सिर्फ ‘नंबरगेम’ है. बहरहाल अंत भला तो सब भला की तर्ज पर कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी की सरकार बन गयी है, हालांकि अभी तक मंत्रिमडल का गठन संभव नहीं हो पाया है,प्रमुख विभागों को लेकर रार जारी है. गृह, वित्त विभाग कांग्रेस अपनेपास रखना चाहती है, वैसे खबर यह भी है कि कुमारस्वामी गृहमंत्रालय अपने पास रखना चाहते हैं. जिसके कारण मंत्रिमंडल का विस्तार अभी तक टला हुआ है. बहरहाल खबर आयी है कि कांग्रेस जेडीएस के बीच बात बन गयी है और जल्दी ही मंत्रिमंडल का शपथ हो जायेगा. देशभर में हुए 11 विधानसभा और चार लोकसभा उपचुनाव में भी विपक्षी एकता काम कर गयी है, भले राजनाथ सिंह ने यह कह कर  अपनी सरकार का बचाव कर लिया है कि लंबी कूद लगाने के लिए दो कदम पीछे जाना पड़ता है, लेकिन इस एकता से भाजपा खेमे में मंथन तो शुरू हो ही गया होगा.

क्या कांग्रेस का त्याग 2019 तक विपक्ष को एकजुट रख पायेगा

यह तो बात हुई सरकार गठन की, लेकिन जो सबसे बड़ी बात इस चुनाव का संदेश बनी है, वह है विपक्षियों की एकता. कांग्रेस ने जिस तरह भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए त्याग की भावना दिखाई और बड़ी पार्टी होते मुख्यमंत्री का पद जेडीए के खाते में दे दिया और खुद दूसरी पंक्ति में आ गयी, वह वर्ष 2019 के चुनाव को देखते हुए बड़ा संदेश है. राजनीति के जानकार यह मानकर चल रहे हैं कि अगले चुनाव में कांग्रेस भाजपा को सत्ता से दूर करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. कांग्रेस की यह सोच वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव को प्रभावित कर सकती है. नवंबर में तक छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव होना है. इन तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है. अगर पूरा विपक्ष एकजुट रहा, जैसा कि कर्नाटक चुनाव के बाद दिखा तो इन तीनों राज्यों में भी भाजपा को अपनी रणनीति बदलनी होगी. भाजपा के ‘चाणक्य ’बने अमित शाह को भी कर्नाटक चुनाव के बाद काफी सीख मिल गयी होगी.

पहली बार नहीं हुआ है भारत में विपक्ष का जुटान

भारत की आजादी के बाद पूरा देश कांग्रेसमय था और आम जनता एक तरह से कांग्रेस की समर्थक थी, क्योंकि कांग्रेस ने आजादी की लड़ाई का नेतृत्व किया था. लेकिन 1951 आते-आते देश में विपक्षी विचारधाराएं प्रभावी होने लगीं जवाहरलाल नेहरु के मंत्रिमंडल में इंडस्ट्री मिनिस्टर रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनसे कुछ विरोध के बाद 21 मई 1951 में भारतीय जनसंघ का निर्माण किया. लेकिन उस वक्त विपक्ष बहुत मजबूत नहीं था और कांग्रेस की तूती बोलती थी, लेकिन धीरे-धीरे लोगों का कांग्रेस से मोह भंग होता गया और विपक्ष एकजुट होने लगा. जब 1975 में इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी और तमाम तरह की पाबंदी लगा दी, उस वक्त पूरा विपक्ष एकजुट हुआ था और 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की सरकार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी थी. सभी पार्टियां साथ आयीं थीं और इंदिरा गांधी को चुनाव में हराया था.लेकिन यह एकजुटता बहुत कम दिन चली और सरकार मात्र दो वर्ष में ही गिर गयी, क्योंकि जिस वक्त मोरारजी प्रधानमंत्री बने थे उस वक्त दो और लोग प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे, जिनमें चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम शामिल थे. मोरारजी की सरकार गिरने के बाद चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनायी थी लेकिन यह सरकार भी नहीं चल पायी कांग्रेस ने सरकार गिरा दिया था. 1980 में इंदिरा गांधी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में लौटीं, उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था. 1983 में जब इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गयी और 1984 में लोकसभा चुनाव हुआ तो राजीव गांधी प्रचंड बहुमत के साथ आये और सरकार का गठन हुआ. उस वक्त विपक्ष के दिग्गज नेता मसलन अटल बिहारी वाजपेयी और हेमवतीनंदन बहुगुणा तक चुनाव हार गये थे.

वीपीसिंह के नेतृत्व में 1989 में विपक्ष हुआ था एकजुट

बोफोर्स घोटाला मामले को चुनावी मुद्दा बनाकर वीपी सिंह ने विपक्ष को एकजुट किया और लोकसभा चुनाव में उतरे. वे राजीव गांधी की सरकार में रक्षा और वित्त मंत्रालय तक संभाल चुके थे. राष्ट्रीय जनता दल को भाजपा और वामदलों का भी समर्थन मिला. लेकिन यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पायी और मंडल कमीशन और अयोध्या विवाद के कारण भाजपा ने अपना समर्थन सरकार से वापस ले लिया, उस वक्त भाजपा के 86 सांसद थे. उस समय भी सरकार में प्रधानमंत्री पद के दो और उम्मीदवार थे चंद्रशेखर और देवीलाल. भाजपा द्वारा सरकार गिराये जाने के बाद चंद्रशेखर की सरकार कांग्रेस के समर्थन से बनी लेकिन वह भी अल्पायु ही थी.

अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ एकजुट हुआ विपक्ष

वर्ष 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्यौता दिया. उस वक्त पूरा विपक्ष भाजपा के खिलाफ एकजुट था परिणाम यह हुआ था कि वाजपेयी की सरकार लोकसभा में बहुमत साबित नहीं कर पायी और मात्र 13 दिनों के लिए ही अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने. फिर आईके गुजराल और एच देवगौड़ा के नेतृत्व में दो बार सरकार बनी, लेकिन यह प्रयोग चल नहीं पाया और अंतत: 1998 में हुए चुनाव में भाजपा एक बार फिर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन इस बार भाजपा ‘अस्पृश्य’ नहीं रही और एनडीए का गठन हुआ.

कहने का आशय यह है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि देश में विपक्ष एकजुट हुआ हो. पहल कांग्रेस के विरोध में हुआ है आज भाजपा के. लेकिन यह एकजुटता टिकती नहीं है, ऐसे में यह देखना मजेदार होगा कि क्या कर्नाटक चुनाव में एकजुट हुआ विपक्ष क्या भाजपा को हराने के लिए 2019 तक एकजुट रह पायेगा?


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