अब कहां जायें हम तू बता ऐ ज़मीं

 

-ध्रुव गुप्त-

अत्याधुनिक शोध बताते हैं कि हम मनुष्य करोड़ों वर्ष पुरानी इस पृथ्वी नामक ग्रह की मूल संतान नहीं हैं. किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की परिस्थितियाँ खत्म होने के बाद करीब दस लाख साल पहले वहां के परग्रही प्राणियों या एलियन ने आकर पृथ्वी को आबाद किया था. वे अपने मूल ग्रह से ज्ञान-विज्ञान लेकर आये और उनका उपयोग पृथ्वी के विकास में किया. उन्होंने यहां के मनुष्य जैसे आकार के आदिम और असभ्य जीवों की मादाओं से संसर्ग कर संतानें उत्पन्न कीं. बाइबिल सहित दुनिया के अधिकांश धर्मग्रंथों में भी आकाश से आकर देवताओं द्वारा पृथ्वी की आदिम प्रजातियों की मादाओं से संतान पैदा करने की घटनाओं के उल्लेख हैं. हम किसी अज्ञात ग्रह या उपग्रह से आये उन्हीं एलियंस की संतानों के विकसित रूप हैं. इस हिसाब से हम सब एलियंस हैं.

आधुनिक वैज्ञानिकों के एक वर्ग का मानना है कि पृथ्वी पर भी हमारे दिन अब पूरे हो चले हैं. निकट भविष्य में यहां से भी हम मनुष्यों के विस्थापन का दौर शुरू होने वाला है. एक अनुमान के अनुसार पृथ्वी की उम्र अब महज दो सौ से पांच सौ साल ही बची है. या तो कोई धूमकेतु आकर इससे टकराएगा या जल्द ही सूरज का ताप अथवा ग्लोबल वार्मिंग इसे निगल जाने वाला है. हमारी पृथ्वी के नष्ट होने की यह भविष्यवाणी इस बार किसी ज्योतिषी, धर्मगुरु या तांत्रिक की नहीं, आधुनिक युग के एक महान वैज्ञानिक स्वर्गीय स्टीफन हाकिंग्स की है. हाकिंग्स के अनुसार इस पृथ्वी पर अब मनुष्य का कोई भविष्य नहीं है. इस ग्रह पर दस लाख साल बिता चुका है. अगर मनुष्य की प्रजाति को एक और दस लाख साल जीवित बचे रहना है तो उसे पृथ्वी छोड़कर किसी और ग्रह या उपग्रह पर शरण लेनी होगी.

हाकिंग्स की इस चेतावनी को हल्के में लेने की भूल नहीं की जा सकती. उनके ज्यादातर अनुमान विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरे हैं. वैसे भी पृथ्वी का मौसम और यहाँ पर जीवन की परिस्थितियाँ जिस तेज रफ्तार से बदल रही हैं, उन्हें देखते हुए हाकिंग्स की यह भविष्यवाणी कल्पना की उपज भी नहीं लगती. अपने छोटे-बड़े स्वार्थों के लिए हम जिस तरह अपनी जीवनदायिनी पृथ्वी का दोहन, प्रकृति के साथ अनाचार और अपनी नदियों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं, उससे जीवन के लिए खतरा तो उपस्थित हो ही गया है. पृथ्वी का सौंदर्य मिट रहा है. उसकी जीवन-रेखा कहे जाने वाले जंगल लगातार कट रहे हैं. विकास के नाम पर वृक्षों की बेरहम हत्या हो रही है. उनकी जगह हर तरफ ईंट और कंक्रीट के नये-नये जंगल उगाये जा रहे हैं. खेती की जमीन सिकुड़ती जा रही है.

नदियां सूख भी रही हैं और प्रदूषित भी हो रही हैं. पक्षी विलुप्त हो रहे हैं. जानवरों की कई-कई प्रजातियां इतिहास की वस्तु बनती जा रही हैं. अंध औद्योगीकरण की जल्दबाजी में हम हवा में जहर घोल रहे हैं. आकाश धुंधला पड़ रहा है. जमीन बंजर हो रही है. दुनिया भर में ग्लेशियर के तेजी से पिघलने की वजह से समुद्र की सतह ऊपर उठ रही है. धरती का तापमान बढ़ रहा है. इसे हमने ग्लोबल वार्मिंग का नाम दिया है. तमाम भौतिक सुख-सुविधाएं हासिल कर लेने  की जल्दबाजी में हम वे तमाम चीजें हम नष्ट किये जा रहे हैं जो जीवन की बुनियादी जरूरतें हैं. आज हमारी प्रकृति और पर्यावरण विकास की हमारी अंधी दौड़ की कीमत चुका रहे हैं. कल इसकी कीमत हमारी आने वाली पीढ़ियां चुकायेंगी हम जिस रफ्तार से प्रकृति को उजाड़ रहे हैं, उससे तो ऐसा लगता है कि अपने बाद अपनी संतानों के लिए हम इस ग्रह पर कुछ भी छोड़कर नहीं जाना चाहते. वह दिन दूर नहीं जब हमारे बच्चे शुद्ध पानी और हवा के एक ताजा झोंके के लिए भी तरस जायेंगे.

सचमुच यह सोचने का वक्त है कि अपनी मूर्खताओं से अपनी पृथ्वी को अगर हमने नष्ट कर दिया तो हमारा अगला ठिकाना कहां हो सकता है. अबतक की वैज्ञानिक प्रगति के आलोक में फिलहाल भागने के हमारे पास दो ही विकल्प उपलब्ध हैं – चांद और मंगल. इन दोनों ही ग्रहों पर पानी और जीवन की अन्य परिस्थितियों का मसला अभी हल नहीं हुआ है. वहां थोड़ा-बहुत पानी हो भी तो क्या वह पृथ्वी के अरबों लोगों की जरूरतों के लिए पर्याप्त हैं ? वहां हवा तो होगी, लेकिन उस हवा का घनत्व क्या होगा ?

क्या असंख्य लोगों की सांसों से दूषित होने के बाद हवा की रिसाइकिलिंग कर उसे फिर से जीवनदायिनी बनाने वाले पेड़-पौधे भी वहां मौजूद हैं ? वहां की चट्टानी सतह पर खेती कैसे कर सकेंगे आप ? इन दोनों ही ग्रहों पर बिना गुरुत्वाकर्षण के हवा में असहाय उड़ते रहना कुछ दिनों के लिए तो रोमांचक लग सकता है, लेकिन ऐसा जीवन देर तक रास नहीं आने वाला. मान लीजिए कि विज्ञान देर-सबेर इनमें से कुछ मसलों का हल खोज भी ले, लेकिन पृथ्वी के अरबों मनुष्यों को ढोकर चांद या मंगल पर कैसे ले जायेंगे आप ? हमारे विस्थापन की इस प्रक्रिया में ही हजारों साल लगेंगे. तबतक क्या यह पृथ्वी बची रहेगी ? अब यह तो नहीं हो सकता कि दुनिया के मुट्ठी भर साधनसंपन्न लोग चांद या मंगल पर जाकर अपनी बस्तियाँ बसा लें और पृथ्वी के बाकी लोगों को धूमकेतु, सूरज की आग और जलप्रलय के रहमोकरम पर छोड़ दिया जाय ?

वैसे भी चांद और मंगल जैसे पथरीले, उजाड़ और वीरान ग्रहों पर बसने की संभावना कहीं से भी आपको रोमांचित करती है ? एक-दो दिनों के लिए वहां घूम-फिर आना अलग बात है. हमारी पृथ्वी से सुंदर कोई ग्रह इस पूरे ब्रह्माण्ड में होगा, इसकी कोई संभावना दूर-दूरतक नहीं दिखती. हमारी पृथ्वी पर प्रकृति का अथाह सौंदर्य भी है, विविधताओं से भरा जीवन भी और जीवन के पैदा तथा विकसित होने की सर्वाधिक अनुकूल परिस्थितियां  भी. ब्रह्माण्ड के किस ग्रह-उपग्रह पर होगी ऐसी सोंधी मिट्टी, ऐसी ताजा हवा, ऐसी मनोहारी हरियाली, ऐसी उछलती-कूदती नदियां, ऐसी हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं, ऐसे रंग-बिरंगे फूल, इतने खूबसूरत, रहस्यमय वन और पशु-पक्षियों का इतना विविध संसार ? इन्हें छोड़कर क्या जी पायेंगे हम ? वैसे भी मां की तरह जिस पृथ्वी ने लाखों सालों तक हमें पाला-पोसा, उसे बेसहारा छोड़कर कैसे चला जाये कोई ? मरना है तो अपनी इसी मां के साथ मरेंगे.

अपनी इस ममतामयी पृथ्वी के साथ पिछली कुछ सदियों में हमने बहुत अनाचार किये हैं. अब शायद यह अपने जीवन के आखिरी दौर में. उसके तमाम अहसानों के बदले हम और कुछ नहीं तो इसकी उम्र थोड़ी और बढ़ाने का जतन तो कर ही सकते हैं. इसके उजड़ते दामन में कुछ और फूल खिलाकर. इसके जंगल और वृक्ष इसे वापस लौटाकर. इसकी हवा में थोड़ा प्राण फूंककर. इसकी नदियों को अविरल और निर्मल बना कर. इसे बंजर और जीवनविहीन बनाने की तमाम साजिशों के खिलाफ एक निर्णायक युद्ध छेड़कर. जितने दिनों तक यह पृथ्वी बचेगी, इसका पर्यावरण बचेगा, इसकी नदियां बचेंगी, उतने दिनों तक हम बचेंगे और हमारी आने वाली पीढियां बचेंगी. समय रहते अगर हम और आप हम नहीं जगें तो चुप बैठकर प्रलय की प्रतीक्षा करने के सिवा कुछ नहीं बचेगा हमारे पास !

हमारी इन तमाम कोशिशों के बाद भी अगर किसी धूमकेतु को आकर पृथ्वी से टकराना ही है तो उसे टकराने दीजिए ! गुस्से में सूरज की इसे निगल ही जाना चाहता है तो निगल जाए। हमारे पास अभी जितना भी वक्त है, उसे पृथ्वी और उसकी सभी संतानों के बीच अपना प्यार और संवेदना बांटकर सार्थक और मूल्यवान बनाने का विकल्प तो हमारे पास अब भी बचा हुआ है !

 


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One thought on “अब कहां जायें हम तू बता ऐ ज़मीं

  • June 2, 2018 at 06:14
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    Badiya tha bahut badiya! Sir!

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