पुस्तक समीक्षा‘ Half Lion’ : नरसिम्हा राव भारतीय राजनीति के ‘ट्रेंड सेटर’ नेता, जो उपेक्षित रहे

लेखक- विनय सीतापति

-बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति-

नरसिम्हा राव भारतीय राजनीति के एक ट्रैजिक फिगर रहे हैं, एक नेता जो जीवन भर एक पार्टी में रहा और इतनी लंबी राजनीतिक पारी खेली. वे सर्वोच्च पद पर बैठे और देश की अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक सोच पर दीर्घकालीन और स्थायी प्रभाव छोड़ा, लेकिन उनकी पार्टी ने ही उन्हें किनारे कर दिया. कांग्रेस ने सोनिया गांधी के नेतृत्व में नरसिम्हा राव के प्रति एक बदले की भावना से काम किया. राव को खानदान के सिंहासन को हड़पने वाले की तरह देखा गया, बाबरी मस्जिद को ढहाने में मौन समर्थन और को बेल्ट से कांग्रेस का बेस ख़त्म करने में भूमिका निभाने वाले के रूप में देखा गया.

दरअसल राव भारतीय राजनीति के एक ध्रुव पर खड़े हैं, जिसके दूसरे सुदूर ध्रुव पर नेहरु खड़े हैं, नेहरू यानी मिक्स्ड इकॉनोमी, सरकारी क्षेत्र का लार्ज इंडस्ट्रीज में दबदबा, गुटनिरपेक्षता की विदेश नीति, इजराइल से दूरी और अरब राष्ट्रों से बनिस्पत ज्यादा नजदीकी, तो दूसरी ओर नरसिम्हा राव नेहरू के आदर्शवाद के विपरीत व्यवहारिक पॉलिटिशियन. अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण, विनिवेशीकरण, अमेरिका और इजराइल के साथ संबंधों के पक्षधर. कुल मिलाकर राव भारतीय राजनीति में एक ‘ट्रेंड सेटर’ बन कर उभरते हैं,  पर कांग्रेस ने राव को कोई क्रेडिट नहीं दिया, न इकॉनोमी के क्षेत्र में, और न ही विदेश नीति के क्षेत्र में. इकॉनोमी में परिवर्तन के लिए कांग्रेस राजीव गांधी के आइडियाज और मनमोहन सिंह के इम्प्लीमेंटेशन को क्रेडिट देती है.

पर ‘प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी के स्कॉलर विनय सीतापति की किताब “Half Lion” ने इस रिकॉर्ड को ठीक करने की कोशिश की है. 391 पेज में पब्लिश इस किताब के माध्यम से सीतापति ने विस्तार से राव के बचपन, कम उम्र में विवाह से लेकर हैदराबाद में निजाम के खिलाफ संघर्ष में राव की भूमिका, राजनीति में कांग्रेस के टिकट पर पहले विधायक, मंत्री, फिर मुख्यमंत्री बनना और फिर लैंड रिफॉर्म्स के मुद्दे पर मुख्यमंत्री पद से हटाया जाना, सबके बारे में विस्तार से जिक्र किया है. राव के जीवन में आयी महिलाएं लक्ष्मी कन्तम्मा और कल्याणी शंकर और उनके राजनीतिक करियर पर प्रभाव को भी सीतापति ने विस्तार से बिना सनसनीखेज रूप दिये लिखा है.

1991 का जिक्र करते हुए किताब बताती है कि राव राजनीति से रिटायर हो चुके थे, पर राजीव गांधी की मौत और सोनिया गांधी की हिचक के कारण राव को प्रधान मंत्री पद की जिम्मेवारी दी गयी. पर राव जिनसे उम्मीद की जा रही थी कि नेहररू गांधी खानदान के अगले वारिस के लिए कुर्सी पर खड़ाऊ डालकर काम करेंगे ने सोनिया गांधी और उनके समर्थकों को हाशिये पर लाने की प्रक्रिया शुरू की.

किताब में राव के द्वारा इकॉनोमी के प्रति व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाए जाने, अपनी टीम खड़ी करने जिसमें मनमोहन सिंह, जय राम रमेश, मोंटेक सिंह अहलुवालिया, चिदंबरम थे, का बेहद रोचक और गहराई के साथ जिक्र है. मनमोहन सिंह गांधी परिवार से बाहर पहले कांग्रेसी प्रधान मंत्री थे, जिन्होंने एक माइनॉरिटी गवर्नमेंट के साथ पांच साल शासन चलाया. इसके लिए नरसिम्हा राव ने कई सही गलत तरीकों का इस्तेमाल किया, जिसमें IB की रिपोर्ट्स का बेजा इस्तेमाल सोनिया गांधी के खिलाफ करना भी शामिल है. दूसरे दलों के नेताओं जैसे सुब्रमण्यम स्वामी, अटल बिहारी वाजपयी आदि के साथ व्यक्तिगत संबंध आदि उनके काम आये.

अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए उन्होंने मनमोहन सिंह को पूरा फ्रीडम दिया. एक रोचक घटना का जिक्र किताब में है, जब राव ने 1991 के बजट का फर्स्ट ड्राफ्ट देखा, तो उन्होंने मनमोहन सिंह को कहा- ‘अगर यही बनाना था, तो मैंने तुम्हे क्यों चुना?’ किताब तमाम उदाहरणों के साथ इस बात की वकालत करती है कि भारत की आर्थिक दुर्दशा को पलटने का श्रेय मुख्य रूप से राव को जाता है ना कि मनमोहन सिंह को, क्योंकि अगर मनमोहन सिंह की जगह आई जी पटेल वित्त मंत्री होते, तो फिर आर्थिक सुधारों का कार्यक्रम उसी तरह चलता, लेकिन अगर राव प्रधानमंत्री नहीं होते, तो फिर ये सुधारों का कार्यक्रम उस विजन के साथ नहीं चल सकता था.

साथ ही सीतापति ने राव को विदेश नीति को नयी दिशा देने का भरपूर क्रेडिट दिया है. सोवियत संघ के पतन के बाद शीत युद्ध का दौर समाप्त हो चला था, ऐसे में भारत का सबसे भरोसेमंद साथी कमजोर हो चला था और यूएस विश्व पटल पर पूरी धमक के साथ जमा था. बदलते वक्त को राव ने पहचाना. उन्होंने न केवल यूएस से नजदीकियां बढायीं, बल्कि इजराइल को नयी दिल्ली में दूतावास भी स्थापित करने की इजाजत दी. साथ ही उन्होंने चीन और इरान के साथ संबंधों को मज़बूत करने पर जोर दिया.

किताब के दावों के अनुसार, राव ही वो व्यक्ति थे, जिन्होंने साउथ ईस्ट एशिया के साथ संबंधों की बेहतरी के लिए लुक ईस्ट पालिसी की शुरुआत की. किताब में ये भी दावा किया गया है कि राव ने परमाणु परीक्षण की तैयारी कर ली थी, पर 1996 में चुनाव में हार जाने के कारण वाजपेयी के टेन्योर में परमाणु परीक्षण हुआ.

राव ने गृह मंत्री रहते हुए पंजाब में आतंकवाद की समस्या पर नियंत्रण स्थापित किया और जम्मू कश्मीर में भी शांति व्यवस्था बहाल करने के सुदृढ़ प्रयास किये. उन्होंने किताब में 1984 के सिख दंगे के समय राव के कमजोर हो जाने का आरोप लगाया है और बताया है कि उस वक़्त नियंत्रण सीधे- सीधे प्रधान मंत्री कार्यालय ने ले लिया था.

इसके अलावा बाबरी मस्जिद के ढहने में राव की भूमिका पर कांग्रेस के दुष्प्रचार से सीतापति सहमत नहीं हैं, उन्होंने इसका दोषी राव के ओवर कॉंफिडेंट एप्रोच और कट्टर हिंदुत्व संगठनों को हैंडल कर सकने के सोच को बताया है. किताब में राव के वेलफेयर स्टेट को कैसे प्रभावी बनाया जाए, इस पर विस्तार से चर्चा है. कल्याणकारी योजनाओं के लिए रिसोर्स बेस को विस्तार देना व ज्यादा रिसोर्स जेनरेट करके पैसे जुटाए जाने पर जोर दिया गया है.

राव के जीवन काल में उन पर कई आरोप लगे, जिनमें हर्षद मेहता द्वारा 1 करोड़ घूस देना, सदन में विश्वास मत के दौरान झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सदस्यों को वोट के लिए पैसे का ऑफर, सेंत किट्ट्स फर्जरी का केस, लक्खूभाई पाठक केस आदि हैं. हालांकि अंततः राव इन सारे आरोपों से मुक्त हो गए. पर अदालती कार्यवाहियों से निपटने के लिए राव को अपना बनजारा हिल्स का बंगला बेचना पड़ा और साथ ही आर्थिक संकटों का सामना करना पडा. 2004 में हार्ट अटैक से राव का निधन हो गया और किस तरह से सोनिया गाँधी के जिद के चलते उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में न होकर हैदराबाद में करना पड़ा, किताब की शुरुआत में इसका मार्मिक चित्रण है. किताब में राव की नयी- नयी भाषाओँ को सीखने की ललक ( कुल 17 भाषाओं के ज्ञाता), किताबों के अनुवादक, कंप्यूटर प्रेम ( उन्होंने स्वाध्याय से कंप्यूटर लैंग्वेज भी सीखा) आदि तमाम पहलुओं का विस्तृत विवरण है.

विनय सीतापति ने अपनी किताब में इतिहास में राव के प्लेस को सिक्योर करने का प्रयास किया है. मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल में राव को भारत रत्न देने का प्रयास किया था. ये किताब विद्वानों के साथ साथ आम जनों के लिए भी काफी कारगर है. भाषा सरल, विषय के ट्रीटमेंट में गहराई और साथ ही एक फ्लो है. ये किताब 100 से ज्यादा इंटरव्यूज और राव के प्राइवेट पेपर्स के गहन अध्ययन पर आधारित है. ये राव के समय भारतीय राजनीति पर नये रिसर्च के लिए भी रिफरेन्स मटेरियल साबित हो सकती है.  कुल मिलाकर एक बेहद शानदार किताब. एक प्रधान मंत्री जिसे अपनी पार्टी से ही दुत्कार मिली, उसकी आत्मा को शांति मिली होगी.


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