‘जोकीहाट’ के बाद भी नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के धुरी बने रहेंगे

जोकीहाट उपचुनाव परिणाम आने के बाद बिहार में विपक्ष ने सत्ताधारी जदयू पर हमला तेज कर दिया है. 31 मई को फैसला आने के बाद तेजस्वी यादव ने एक रोचक ट्वीट किया है:
का नीतीश चच्चा जी..! अंतरात्मा अभिओ जागी की ना….कि अभिओ मोदीजी के डर से अंतरात्मा सुतले रही?

चुप काहे बाड़ऽ चच्चा..? ई बचवा तऽ सभे चुनऊवे जीतऽता, कहँवा गईल तोहार चमक??

अब समझ मे आ गइल की 2015 में केकरा नाम प वोट मिलल रहे?

इ तs ट्रेलर हईं..शुरूआत हईं, फ़िल्म बाक़ी बा..

जोकीहाट विधान सभा उपचुनाव के पहले अररिया लोकसभा, जहानाबाद विधानसभा उपचुनावों में राजद के हाथों जदयू को मात खानी पड़ी है. इससे राजद के हौसले बढ़े हुए हैं. पर सवाल यह है कि क्या सिर्फ इन उपचुनावों के बल पर बिहार की जनता का मूड भांपा जा सकता है? क्या यह माना जा सकता है कि नीतीश कुमार की ‘अपील’ ख़त्म हो रही है?

1969 में गठित जोकीहाट विधान सभा क्षेत्र का इतिहास देखें तो हम पाते हैं कि तब से अब तक यहां कुल मिलाकर 15 बार चुनाव हुए हैं, जिसमे 10 बार तस्लीमुद्दीन परिवार जीता है. 5 बार खुद मोहम्मद तस्लीमुद्दीन, 4 बार उनके बड़े बेटे और इस बार उनके छोटे बेटे शाहनवाज़ आलम ने जीत हासिल की है. तो इस प्रकार जोकीहाट क्षेत्र को किसी दल के बजाय एक परिवार के वर्चस्व क्षेत्र के रूप में देखना उचित होगा.
जोकीहाट विधान सभा सीट अररिया लोकसभा उपचुनाव के ठीक पहले सरफराज के इस्तीफे के कारण रिक्त हुई थी. 2015 में सरफराज जोकीहाट विधानसभा सीट से जदयू के टिकट पर चुने गये थे. 2005 से इस सीट पर जदयू का कब्जा था.

आधिकारिक घोषणा के अनुसार शाहनवाज आलम को कुल 81,240 मत मिले, जबकि जदयू के मुर्शीद आलम को 40,015 मत मिले. .निर्दलीय प्रत्याशियों को लगभग 21 हजार मत मिले. इसमें शब्बीर आलम को 11,176, जाप प्रत्याशी गौशुल आजम को 5314, मो इरफान को 2229, जावेद आलम को 1298, मो मसरूर आलम को 737, प्रसेनजीत कृष्ण को 458, मो मोबिनुल हक को 584 मत मिले. इसके अलावा 2673 वोट नोटा को मिले. कुल मिलाकर 1,45,744 वोट पड़े.
जदयू के शीर्ष नेतृत्व ने जोकीहाट विधान सभा उपचुनाव का विश्लेषण करते हुए इसे परिवारवाद की जीत बताया जो सत्य के ज्यादा करीब जान पड़ती है.

राजद का यूएसपी इसका माय ( मुस्लिम + यादव) समीकरण है, पर इस समीकरण के चलते इसका वोट बैंक जहां एक तरह कोर वोट बैंक की तरह काम करता है, वहीं दूसरी ओर यही समीकरण इसके वोट बैंक को बढ़ने से रोकता है. और अन्य पिछड़ी जातियों और दलित जातियों को इसकी तरफ मुड़ने से रोकता है. दूसरी तरफ राजद का सहयोगी दल कांग्रेस, जो खुद इसके पूर्व अध्यक्ष अशोक चौधरी के जदयू में मिलने के बाद सवर्ण चेहरा ओढ़ बैठा है. बिहार का सवर्ण आज भाजपा के ज्यादा करीब है, बजाय कांग्रेस के. तो कांग्रेस को कुछ विधान सभा क्षेत्रों में जीत हासिल होगी, वो उम्मीदवारों के व्यक्तिगत अपील के चलते, न कि किसी ठोस वोट बैंक के चलते.

हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन में सहज नहीं हैं और कांग्रेस के अध्यक्ष कौकब कादरी ने नीतीश कुमार को भाजपा विरोधी गठबंधन में पुनः आने का न्योता दिया है. तो ऐसे में फिलहाल गेंद नीतीश कुमार के पाले में है. कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी चाहेगा कि आगामी विधान सभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जदयू भाजपा विरोधी महागठबंधन का हिस्सा बने. राजद के कोर वोटर्स को छोड़ दें तो बिहार की जनता राजद के गवर्नेंस फ्रंट के ख़राब रिकॉर्ड को देखते हुए उसपर यकीन करेगी कहना मुश्किल है.

तो ऐसे में राजद तमाम आत्मविश्वास और तेजस्वी यादव के गर्व भरे ट्वीट के बावजूद जदयू से गठबंधन का मोह नहीं त्याग सकता है. खासकर पिछले कुछ महीनों में सत्ता से बाहर रहने पर राजद सुप्रीमों का परिवार सीबीआई और इनकम टैक्स के रेड्स का शिकार हुआ है, सत्ता से एक और बार बाहर रहना इनके अस्तित्व के लिए संकट बन सकता है, तो ऐसे में नीतीश कुमार की स्थिति फिलहाल अगले चुनाव में सुरक्षित है और वे बिहार की राजनीति के धुरी बने हुए हैं.

जोकीहाट चुनाव परिणाम आने के बाद जदयू नेता के सी त्यागी ने भाजपा को स्पष्ट इशारे करते हुए कहा कि भाजपा को ‘एकजुटता’ पर बल देना चाहिए तथा किसानों, दलितों और पेट्रोलियम उत्पादों के बढ़ते दामों जैसे मुद्दों पर ‘चिंताओं’ का समाधान करना चाहिए.  इसके अलावा नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा है. नीतीश कुमार के राजनीतिक एजेंडे का एक महत्वपूर्ण प्रोग्राम है विशेष राज्य और उम्मीद की जा रही है कि चुनावी वर्ष में वे इसे फिर से उठाएंगे. इस मुद्दे के साथ बिहारवासियों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं.


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