डिजास्टर को मैनेज करने की जरूरत है !!

डिजास्टर मैनेजमेंट एक ऐसा विषय है, जिसके बारे में सारी जानकारी सरकारी पदाधिकारियों के पास ही है, Monopoly of information ! आम आदमी अभी भी इस विषय के बारे में लगभग कुछ नहीं जानता. हालांकि वो साल दर डिजास्टर की चपेट में आता है. प्राकृतिक आपदाओं के कारण प्रतिवर्ष हमारे देश में जान और माल की भारी क्षति होती है. यह सही है कि प्राकृतिक आपदाओं पर मनुष्य का बस नहीं, लेकिन उचित जानकारी के साथ इसके खतरे को कम किया जा सकता है. Marginalised.in डिजास्टर मैनेजमेंट पर 50 आर्टिकल्स का सीरीज लेकर आ रहा है, ताकि डिजास्टर मैनेजमेंट की पेचीदगियों को आम आदमी आम भाषा में समझ सके. प्रस्तुत है इस कड़ी का पहला आर्टिकल:

-नकुल तरूण*

Centre for Research on the Epidemiology of Disasters (CRED, 2008) के अनुसार प्रति वर्ष 230 मिलियन लोग प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होते हैं. इन प्राकृतिक आपदाओं के कारण औसतन 75, 000 हजार लोगों की मौत होती है. रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में प्रतिवर्ष 450 शहर भूकंप के शिकार होते हैं. भूकंप चक्रवात, टायफून और हरिकेन सबसे खतरनाक आपदाओं में गिने जाते हैं, जिनके कारण जानमाल की सबसे ज्यादा हानि होती है.

UNESCO, 2007 की रिपोर्ट के अनुसार सूखे और बंजर होती जमीनों से 250 मिलियन लोग प्रभावित होते हैं और 110 देशों में 1.2 बिलियन लोग इस खतरे की चपेट में हैं. प्रतिवर्ष बाढ़ के कारण कई जगहों पर बच्चे पूरे साल स्कूल नहीं जाते हैं.शिक्षा किसी भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, जो उसे मिलना ही चाहिए. मनुष्य अपने अन्य अधिकारों को समझें और बेहतर जीवन यापन के लिए उनका उपयोग करे, इसके लिए उसे शिक्षा मिलनी ही चाहिए. इस अधिकार की जरुरत किसी आपदा या आपातकाल में कम नहीं होती. अगर शिक्षा बाधित होती है और उसकी निर्बाध उपलब्धता में बाधा पड़ती है, तो उसका स्थायी नकारात्मक असर छात्रों के सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर पड़ता है. इतना ही नहीं उसका परिवार और समुदाय तक इससे प्रभावित होता है.

शिक्षा की योजनाओं पर प्राकृतिक आपदाओं का असर होता है. फिर चाहे वह हर वर्ष आने वाला बाढ़ हो, या पांच पीढ़ियों में एक बार आने वाला भयंकर भूकंप हो, तूफान और सायक्लोन की बढती विभीषिका हो, पेयजल का लगातार होने वाला अभाव या समुद्र के जलस्तर का लगातार बढ़ना है.

लेकिन इन प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को शिक्षा, समझदारी और व्यवहारिक ज्ञान की मदद से कम किया जा सकता है. जानकारी की मदद से आप खुद की और अपने आसपास के लोगों की मदद कर सकते हैं. आपदाओं के वक्त क्या करें और क्या ना करें यह जानकारी की मदद से तय किया जा सकता है, किसी को मदद करने की प्रक्रिया में समय लगता है. लेकिन आपदाएं समय नहीं देती हैं. हम यह तय नहीं कर सकते हैं कि कब धरती हिलेगी, कब हवा बहेगी या कब बारिश होगी. लेकिन सही मूल्याकंन और योजना के द्वारा हम इन प्राकृतिक घटनाओं को प्राकृतिक आपदा में बदलने से रोक सकते हैं.

चूंकि स्कूल ज्ञान और स्किल शेयर करने की प्राथमिक संस्था है, इसलिए आपदाओं को रोकने में स्कूल रोल मॉडल साबित हो सकते हैं. प्राकृतिक आपदाओं पर रोक हमारे अर्जित ज्ञान की परीक्षा है, जिसमें सफल होकर हम आने वाली पीढ़ी को समृद्ध कर सकते हैं.
क्या है प्राकृतिक आपदा?

प्राकृतिक आपदाएं वह गंभीर व्यवधान हैं, जो सीमित समय के लिए होती हैं और समुदाय और समाज को लम्बे समय तक प्रभावित करतीं हैं, मानव जीवन और उसकी संपत्ति पर इसका असर होता है, ये पर्यावरण को भी बुरी तरह से प्रभावित करते हैं और जिनसे निबटने में मनुष्य के संसाधन समर्थ नहीं होते हैं. समकालीन शिक्षाविदों का मानना है कि आपदाएं सही तरीके से प्रबंधन ना होने का परिणाम हैं. सही प्रबंधन के जरिये इन खतरों को आपदा बनने से रोका जा सकता है.

डिजास्टर मैनेजमेंट साइकिल:

आपदा का शमन (Mitigation) : आपदाओं को रोकने के प्रयास कितने सफल रहे उनका अध्ययन.

योजनाबद्ध तैयारी (Preparedness) : आपदाओं से निटपने के लिए योजना, प्रशिक्षण और शैक्षणिक गतिविधियों की जरूरत है.

प्रतिक्रिया (Response) : आपदा के तत्काल बाद जब स्थितियां सामान्य नहीं होता हैं उनका निर्धारण करना.

रिकवरी (Recovery) : आपदा के कुछ समय बाद नियमित सेवाओं की बहाली के प्रयास.

इस सीरीज का उद्देश्य आम आदमी को आपदाओं के बारे में जागरूक करना और उन्हें इनसे निपटने के लिए जानकारी के हथियारों से लैस करना है. मानसून आने वाला है,यह निश्चित रूप से एक अच्छी खबर है लेकिन मॉनसून बिहार के आधे हिस्से में बाढ़ और भारी विनाश लाता है, ऐसे में यह जानकारियां उपयोगी साबित हो सकती है.

सीरीज जारी रहेगी. अपना फीडबैक दें.
*नकुल तरुण डिजास्टर एक्सपर्ट हैं. वे पिछले डेढ़ दशक से डिजास्टर के मुद्दे पर काम कर रहे हैं.


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