नीरा:  रोजगार, स्वास्थ्य और सम्मान का बेजोड़ संगम 

-सागरिका चौधरी*

बिहार सरकार ने एक अप्रैल 2016 को बिहार में पूर्ण शराबबंदी की घोषणा की थी, अब दो साल से ज्यादा हो गये हैं और प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी लागू है. सरकार के निर्णय की अगर समीक्षा की जाये तो कहना ना होगा कि इसके कई सकारात्मक परिणाम सोसाइटी पर नजर आ रहे हैं. शराबबंदी का सबसे ‘पोजिटिव इपैक्ट’ यह रहा कि प्रदेश में अपराध की घटनाएं 27 प्रतिशत तक कम हुई हैं. कत्ल में 22 प्रतिशत, डकैती में 23 प्रतिशत एवं दंगा के मामलों में 33 प्रतिशत की कमी आयी है, ऐसा पिछले साल के आंकड़ों से पता चलता है. वहीं महिलाओं के खिलाफ अपराध में भी काफी गिरावट आयी है. खासकर ग्रामीण महिलाएं इस शराबबंदी से काफी खुश हैं. वहीं इस शराबबंदी की घोषणा के बीच सरकार ने एक शानदार पहल की है वह है प्राकृतिक पेय ‘नीरा’ की बिक्री को बढ़ाने की.

नीरा की बिक्री को बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने कई ठोस कदम उठाये हैं और सरकार इसे ‘राज्य का पेय’ बनाने के प्रति बहुत गंभीर है. सरकार ने इसके लिए प्रदेश में ताड़ के पेड़ का सर्वेक्षण करवाया है और वह नीरा उत्पादन के लिए फैक्टरी भी लगा रही है. खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नीरा की वकालत की है, जो नीरा की बिक्री के प्रति उनकी गंभीरता को दर्शाता है. एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा था-हमने जितने ताड़ के पेड़ हैं सबका सर्वेक्षण करा लिया है और अब हमलोग नीरा का उत्पादन करने का इंतजाम कर रहे हैं. लवनी के अंदर चुना का लेप लगता है और अगर सुबह होने के पहले तार का रस उतार लिया जाये, तो वो बहुत ही पोषक है, गांधी जी भी नीरा के पक्ष में थे. इसलिए हम नीरा को प्रचारित करवायेंगे. यहां तक कि सड़क के किनारे भी ‘नीरा’बेचा जायेगा. जो पीने के लिए उत्सुक रहते हैं वो पीयें, नीरा उपलब्ध है. सबसे बड़ी बात यह है कि यह स्वास्थ्य को बिगाड़ता नहीं है, बल्कि उसकी रक्षा करता है. अपने संकल्प पर दृढ़ राज्य सरकार ने बिहार में चार जगह फैक्टरी स्थापित कर ‘नीरा’ का उत्पादन शुरू कर दिया है, जिसमें हाजीपुर, खिज्र सराय, बिहार शरीफ और भागलपुर जिले का बरारी शामिल है.

क्या है सरकार की योजना
1. सरकार नीरा का उत्पादन ज्यादा से ज्यादा करवाकर लोगों को पौष्टिक पेय उपलब्ध कराना चाहती है.
2. सरकार नीरा उत्पादन के जरिये लोगों  को रोजगार उपलब्ध कराना चाहती है, खासकर वैसे लोगों के लिए जो परंपरागत रूप से इस कार्य से जुड़े थे.
3. नीरा के बाई प्रोडक्ट मसलन गुड़ उत्पादन का लक्ष्य भी निर्धारित कर चुकी है. इस गुड़ का इस्तेमाल डायबिटीज के मरीज भी कर सकते हैं.
4. सरकार ने ताड़ी की बिक्री पर भी रोक लगाया है क्योंकि ताड़ी नशीला होता है, लेकिन इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है. सरकार का दावा है कि जितनी कमाई ताड़ी बेचने से होती थी, उससे अधिक की कमाई नीरा से हो सकती है. सरकार किसी का रोजगार छीन नहीं रही, बल्कि उन्हें बेहतरीन अवसर उपलब्ध करा रही है.
5. नीरा से बनने वाले अन्य प्रोडक्ड मसलन मिठाई, सूरन पेड़ा, लड्‌डू एवं आइसक्रीम को प्रमोट करना ताकि नीरा उत्पादन से जुड़े लोगों का जीवनस्तर बेहतर हो सके.
6. चूंकि ताड़ के पत्तों से प्लेट, खिलौना और अन्य उपयोगी चीजें भी बन सकती हैं, इसलिए सरकार इस कोशिश में है कि इन कुटीर उद्योगों को भी बढ़ावा दिया जाये.

लाइसेंस के लिए शर्त 
नीरा उत्पादन के लिए ताड़-खजूर से रस (ताड़ी) निकालकर सीधे उत्पादन केंद्र को भेजना होगा. रास्ते में अन्यत्र बेचने पर मद्य निषेध की सुसंगत धारा के तहत कार्रवाई होगी. ताड़-खजूर का पेड़ यदि किसी निजी बगान मालिक का है तो उससे करार के बाद ताड़ी निकालने के लिए लाइसेंस दिया जा सकेगा. पेड़ मालिक को भी लिखित देना होगा कि वह ताड़ी को खमीरमुक्त नीरा अथवा गुड़ निर्माण कार्य के लिए देना चाहता है.

 

जीविकोपार्जन का माध्यम 
बिहार में जीविका के सदस्यों को ताड़ी संग्रह से लेकर नीरा और गुड़ बिक्री के लिए बूथ आवंटित किया जाएगा. मिल्क कोऑपरेटिव सोसाइटी की तरह जीविका के स्वयं सहायता समूह सदस्य ताड़ी को नीरा फैक्ट्री तक भेजने की जिम्मेदारी निभायेंगे. ताड़ी से बने उत्पाद की बिक्री में भी जीविका के सदस्यों को अवसर मिलेगा.

कृषि विभाग के सर्वे के अनुसार, बिहार में 92 लाख के आसपास ताड़ के पेड़ हैं, 40 लाख खजूर के पेड़ हैं और चार लाख नारियल के पेड़ हैं. सबसे अधिक ताड़ वाले जिलों में गया में 1457410, बांका में 647886, भागलपुर में 508245, मुजफ्फरपुर में 399877 और नवादा में 865097 ताड़ के पेड़ हैं. वहीं सबसे अधिक खजूर के पेड़ वाले जिलों में मुजफ्फरपुर में 551370, बांका में 592130, समस्तीपुर में 405662, गया में 353037 और दरभंगा में 209000 पेड़ हैं. नारियल की सबसे अधिक पेड़ वाले जिलों में मधुबनी में 20020, भागलपुर में 18652, सुपौल में 49047, मधेपुरा में 34353 और पूर्णिया में 32671 पेड़ हैं.  उद्योग विभाग के सूत्रों के अनुसार, गैर नीरा सीजन में चारो प्लांट फ्रूट जूस का उत्पादन और प्रोसेसिंग करेंगे.

गौरतलब है कि तमिलनाडु कृषि विश्विद्यालय के वैज्ञानिकों ने प्लांट स्थापित करने में बिहार सरकार की मदद की है. तमिलनाडु ने नीरा के उत्पादन और बिक्री के क्षेत्र में काफी सराहनीय कार्य किया है. बिहार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से कृषि वैज्ञानिकों का दल ट्रेनिंग के लिए तमिलनाडु गया था.

पटना में शुरू हो चुकी है बिक्री 
पटना में नीरा की बिक्री कुछ चुनिंदा सेल पॉइंट्स पर शुरू हो गयी है. 200 मिलीलीटर नीरा की कीमत 10 रूपये है और कई लोग नीरा का सेवन कर रहे हैं. जीविका के प्रोजेक्ट मेनेजर अनिल यादव बताते हैं, प्रत्येक दिन  वितरकों को 40 से 45 लीटर नीरा उपलब्ध करवाया जा रहा है. लोगों का अब तक का रेस्पोंस शानदार है.

उद्योग विभाग के डिप्टी डायरेक्टर उमेश कुमार सिंह ने बताया कि अबतक   26,343 लोगों को लाइसेंस दिया जा चुका है. 12 प्रायोरिटी डिस्ट्रिक्स हैं और इसके अलावा 26 अन्य जिलों के ताड़ी उतारने वालों को बिहार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के द्वारा ट्रेनिंग दिया जा रहा है. सरकार के इन प्रयासों के सफल होते ही नीरा बिहार का पेय बन जायेगा साथ ही इसके उत्पादन से जुड़े महादलित तबके के लोगों का जीवनस्तर भी सुधरेगा, जो सरकार का टारगेट है.

नोट: लेखिका जनता दल यूनाइटेड की नेत्री हैं, पासी समुदाय से आती हैं और महादलित प्रकोष्ठ में प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य हैं. वे पटना विश्विद्यालय में सिंडिकेट मेंबर भी हैं.  आलेख में व्यक्त विचार लेखिका के हैं. 


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