क्यों सुलग रहा है शिलांग ?

-विद्या भूषण रावत*

भारत के उत्तर पूर्व के राज्य न केवल सामरिक दृष्टि से अपितु सांस्कृतिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण हैं. ये राज्य भारत की जातिवादी सामाजिक व्यवस्था के अनुसार नहीं चलते, यहां जनजातीय समाज, बौद्ध और ईसाई धर्मों का असर है. पूर्वोत्तर भारत के दो राज्य त्रिपुरा और असम में हिंदुओं खासकर बंगालियों का अच्छा खासा दबदबा है और उनके प्रभाव ने क्षेत्र में आदिवासियों और मूलनिवासियों को सत्ता के तंत्र से पूरी तरह से बाहर कर दिया है. आपने त्रिपुरा को देख ही लिया होगा कि कैसे आदिवासी बहुल राज्य में आज भी बंगाली भद्रलोक मुख्यमंत्री हैं.
मेघालय की स्थिति भिन्न है. यह पूर्णतः आज़ाद ख्याल राज्य है. ऐसा नहीं है कि इन राज्यों में कोई सामाजिक समस्याएं नहीं है लेकिन हमें याद रखना होगा कि इन राज्यों की विशेष स्थिति को देखते हुए इन्हें संविधान की छठी सूची में रखा गया था जिसका मतलब था कि राज्य में राज्यपाल और राज्य सरकारों की कानून बनाने के, विशेषकर भूमि और वन से संबंधित मामलो में, सीमित अधिकार होंगे और ज्यादा स्वायत्तता जिला और क्षेत्रीय समितियों को है जो जनता द्वारा चुन कर आती है.

शिलांग अविभाजित असम की राजधानी था. ब्रिटिश साम्राज्य का उत्तर पूर्व के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र और एक बेहद खूबसूरत क्षेत्र जिसे प्रकृति ने बड़े प्यार से संवारा. सांस्कृतिक तौर पर ‘खासी’ जनजाति के लोगों की जीवनशैली इसी प्रकृति प्रेम पर केंद्रित है. उस समय जब भी ब्रिटिश इधर- उधर मूव करते थे तो उन्हें अपने साथ अपना तामझाम लेकर चलना पड़ता था. दूसरे देश के विभिन्न इलाको में सफाई का कार्य करने के लिए वे अपने साथ पंजाब और उत्तर प्रदेश आदि से सफाई कर्मियों को ले गए जो मुख्यतः वाल्मीकि, मजहबी या ईसाई थे . इसका कारण यह था के कई स्थानों में खासकर जो पहाड़ी इलाके थे, जहां लोगों की जीवन शैली बहुत अधिक यांत्रिक नहीं थी और शहरीकरण का असर नहीं था और सामाजिक तौर पर भी मनुवादी वर्णवादी व्यवस्था नहीं थी तो जातिविशेष का कार्यकरने वाली संस्था भी नहीं थी. दूसरे, ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध करते हुए लोग उनके साथ काम करने को तैयार नहीं थे इसलिए उन्हें स्वयं ही अपने साथ अपने द्वारा प्रशासित राज्यों के कर्मचारियों को ही साथ लाना पड़ता था. बताया जाता है के 1850 के आस पास ब्रिटिश पंजाब से इन सफाईकर्मियों को वहां लाये थे जो मुख्यतः मजहबी कहे जाते हैं. शिलांग में इन्हें पंजाबी या सिख कहा जाता है जो स्वयं पंजाब के सांस्कृतिक माहौल से बेहतरीन है जहां आज भी मजहबी और चूड़ा के नामों से अपमानित होता है. शायद ये मेघालय की सांस्कृतिक विरासत ही होगी जिसमें इन्हें सम्मानित शब्दों से नवाजा गया है.

जैसे कि सभी महत्वपूर्ण स्थानों की कहानी है वैसे ही यहां की भी कि ये पंजाबी शहर के सबसे महत्वपूर्ण इलाको में रहते थे लेकिन आज जब शहरों के हालात बदल गए है और सफाई के पुराने तरीके बदल गए हैं तो सफाई पेशे वाले समुदाय भी अवांछित हो गए है. अब समाज को पहले की तरह उनकी आवश्यकता नहीं रही और उनका दूसरे कार्य करना भी लोगों को मंजूर नहीं होता. कई बार ये भी होता है कि कोई बड़ा नेता वहां कोई बिज़नस या मॉल खोलना चाहता है और इसके लिए उन्हें हटाने के तरीके अपनाये जाते है.

पाकिस्तान से लेकर जहां उन्हें ईसाई बोला जाता है और ईशनिंदा कानून आसानी से लगता है भारत के गांवों तक, हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाइयों सभी ने वाल्मीकियों के साथ बेहद अपमानजनक व्यवहार किया है. और तो और, खुद दलित आंदोलन ने भी साथ नहीं दिया है. अब आदिवासी इलाको में वे अलग- थलग ही रहते है लेकिन ये भी हो सकता है कि उत्तर पूर्व के सांस्कृतिक ढांचे में वे नहीं फिट हो पा रहे. एक और क्रूर सच्चाई के समस्या शासक वर्ग द्वारा पैदा की गयी है. ब्रिटिश शासकों ने ये काम किया और उनका स्थाई बंदोबस्त करना चाहिए था लेकिन कहीं पर भी ये व्यवस्था नहीं है. इसका मतलब ये है कि ब्रिटिश शासन ने उनका पूरा इस्तेमाल किया लेकिन उन्हें सिर ढंकने के लिए छत की व्यवस्था नहीं की और ये पूरे भारत की कहानी है. जहां भी वे रहे है लोगो की ‘कृपा’ पे रहे और इस कारण उनका कोई मज़बूत आत्मस्वाभिमान वाला आंदोलन नहीं चल पाया.

उत्तर पूर्व की परिस्थितिया बिलकुल भिन्न है क्योंकि सफाई कर्मी समाज को अंग्रेज वहां लाये न कि शिलांग के लोग; इसलिए सांस्कृतिक तौर पर मामला बिलकुल अलग है क्योंकि मामला भूमि के स्वामित्व का है. स्वीपर लेन में रहने वाले लोगो का कहना है के उनको 10 दिसंबर 1853 को वहां के राजा और ब्रिटिश शासन के मध्य हुए समझौते में ये जमीन प्रदान की गयी थी लेकिन सरकार और खासी जिला प्रशासकीय कौंसिल अभी इस बात से इनकार कर रहे हैं. ये समझना भी महत्वपूर्ण है कि भूमि का पूरा प्रशासनिक नियंत्रण इस क्षेत्र में अनुच्छेद 6 के अंतर्गत खासी जिला प्रशासकीय कौंसिल के अंतर्गत आता है.

शिलांग टाइम्स के मुताबिक कल सरकार द्वारा बनायी गयी समिति की पहली बैठक हुई है और जल्दी ही वे इस संदर्भ में किसी नतीजे पर पहुंचेंगे लेकिन कुछ सवाल महत्वपूर्ण है जिन पर हमें गंभीरता से सोचना होगा. पहला ये कि जो भी सफाई कर्मी वहां गए और म्यूनिसिपल कारपोरेशन में कार्य कर रहे है या रिटायर हो गए है उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाए. बाकि सभी लोगों के भी सम्मानजनक पुनर्वास की व्यवस्था की जाए.

एक दो दिन पूर्व एक मित्र ने एक वीडियो भेजा और कहा के इसे खूब फॉरवर्ड करो. अमूमन मै इन्हें देखता भी नहीं हूं लेकिन उस दिन मैंने देखा तो एक नौजवान इस घटनाक्रम को बिलकुल 1984 के स्वर्ण मंदिर में सेना के हस्तक्षेप से जोड़कर देख रहा था. वो कह रहा के सिखों ने देश के लिए इतनी कुर्बानिया दी है और इसलिए हमें देखना पड़ेगा कि देश विरोधी शक्तियां तो ऐसा नहीं कर रही और इनका मुकाबला करना पड़ेगा. बहुत से लोग कह रहे है कि मुस्लिम, सिख और अन्य सभी को साथ मिलकर ऐसी शक्तियों का मुकाबला करना पड़ेगा. ये बहुत खतरनाक है और इस घटनाक्रम का अति साधारणीकरण है. हमें उत्तरपूर्व के पूरे ऐतिहासिक परिदृश्य को समझना होगा और आर्यावर्त के नजरिये से उनको देखने के नतीजे बेहद खतरनाक हो सकते हैं. भारतीय राष्ट्र-राज्य की सवर्णवादी उत्तर-भारतीय अवधारणा जो हमने कश्मीर में लगाने की कोशिश की और अब वही कोशिश हम उत्तर पूर्व में कर रहे है तो इसके परिणाम घातक होंगे.

उत्तर पूर्व में बहुत से राज्य भारत के आजाद होने के पहले तक अलग राज्य थे. उत्तर पूर्व में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में आदिवासियों की सांस्कृतिक विरासत छिपी है इसलिए उसको यदि हम उत्तर भारतीय हिंदी नज़रिए से देखेंगे तो कभी भी नहीं समझ पाएंगे. स्वीपर लेन का मसला सिखों और खासी समुदाय की लड़ाई नहीं अपितु भूमि के स्वामित्व का है. जैसे कि मैंने कहा वहां की सरकार को सफाई कर्मचारियों की समस्यायों को निपटाने के प्रयास करने चाहिए लेकिन वैसे ही प्रयास देश की हर जगह की नगर पालिकाओं को करने होंगे. मैंने तो कई गांवों में देखा कि जब वाल्मीकि समाज के लोग काम करने से इनकार करते है तो उन्हें गांव से बेदखल करने की धमकी मिलती है. पंजाब के अकाली और कांग्रेस दोनों जाटों की पार्टिया हैं जो मजहबी लोगों को आज भी इज्जत के साथ नहीं रख पाते और पंजाब के गांवों में उनके जातीय वर्चस्व को सब जानते है. इसलिए शिलांग में हुई घटना चिंतनीय जरूर है लेकिन ये कोई ‘एथनिक क्लींजिंग’ नहीं है क्योंकि न इसमें कोई मारा गया है, न ही किसी को कोई चोट आयी है और न कुछ घटा है. हां जब ऐसी घटनाएं होती हैं तो लोग अपनी रक्षा करने के लिए खड़े होते है लेकिन उसका वीडियो बनाकर मसाला लगाकर टीवी चैनल न प्रस्तुत करे तो अच्छा है.

उत्तर पूर्व की राजनैतिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक स्थितियों को बिना समझे किसी भी बात पर उसे उत्तर भारतीय हम और उन के बीच में लड़ाने और समझने की कोशिशें किसी काम की नहीं होंगी. मेघालय की आबादी का 85% हिस्सा जनजातीय है और इसलिए यह क्षेत्र उनकी सुरक्षा के लिए संविधान में प्रदत्त विशेष अधिकार कानून के दायरे में आता है. वहां पर आज़ादी के बाद से ही भारतीय सेना का दबदबा है. सामरिक दृष्टि से यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए इनके सांस्कृतिक वैभव को समझे बिना हम कभी उनकी भावनाओं को नहीं समझ पाएंगे. वहा पर समाज हमारे सड़े गले वर्णवादी समाज की तरह जातिवादी महिला विरोधी नहीं है. वे सभी सामूहिकता में रहने के आदि है.

भारत में बहुत से ऐसे राज्य है जिनकी सांस्कृतिक विरासत, सामरिक स्थिति की महत्ता को देखते हुए अन्य राज्यों के लोग वहा पर आसानी से जमीन आदि की खरीदारी नहीं कर सकते और ये इसलिए जरुरी था ताकि उनकी सांस्कृतिक विरासत बच सके और व्यवसाय के नाम पर उनका शोषण न हो सके. हमने उत्तराखंड और हिमाचल में दुकानदारी करने वालों को देख लिया है जो हमारे प्राकृतिक संसाधनों, नदी, नालों, गदेरो और पहाड़ों को चूस -चूस कर, उसकी बोटी बोटी तक नोच लेना चाहते है. उत्तरखंड में धर्म के धंधेबाजों ने दुकानदारों के साथ मिलकर पर्यावरण का जो नाश पीटा है वो देश के लिए किसी दिन एक भयानक चुनौती पेश करेगा. एक पर्यावरण प्रेमी और उत्तर पूर्व के सांस्कृतिक विरासत का समर्थक होने के नाते मैं चाहूंगा के उन क्षेत्रो के साथ ऐसा दोहन न हो लेकिन एक ही उम्मीद कि जो लोग इतने वर्षो पूर्व वहां पर लाये गए उनके साथ न्याय हो और उन्हें सम्मान सहित पुनर्वासित किया जाए. उत्तर पूर्व से बाहर के लोगों और साथ ही मीडिया से अनुरोध है के इसे सांप्रदायिक या जातीय रूप न दे तो देश के लिए अच्छा होगा.

* आलेख के विचार लेखक के हैं, जो एक विचारक और चिंतक हैं.


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