नौकरशाही को फ्रेश आइडियाज की जरुरत है.

मोदी सरकार ने एक बेहद शानदार और बहुप्रतीक्षित निर्णय लेते हुए नौकरशाही के शीर्ष पोजीशन को lateral रिक्रूटमेंट के लिए खोलने का फैसला किया है. अमूमन नौकरशाही के शीर्ष पोजीशन में नियुक्ति आईएस, आईपीएस, आईआरएस  कैडर  के अधिकारियों की होती है, और इन पोजीशन में टाइम बाउंड प्रमोशन के तहत होती है.

पर रविवार को मोदी सरकार ने लीक से हटकर कदम उठाते हुए विज्ञापन जारी किया जिसमे 10 क्षेत्र के लिए 10 जॉइंट सेक्रेटरी के लिए अद्वेर्तिसेमेंट निकाला गया है. ये क्षेत्र  हैं: revenue, फाइनेंसियल सर्विसेज, इकनोमिक सर्विसेज, एग्रीकल्चर कोऑपरेशन एंड फार्मर्स वेलफेयर, रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाईवे, शिपिंग, एनवायरनमेंट, फारेस्ट एंड क्लाइमेट चंगे, न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी, सिविल एविएशन एंड कॉमर्स.

आवश्यक शर्तों में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता ग्रेजुएशन, उम्र कम से कम 40 वर्ष की और कम से कम 15 वर्ष का कार्य अनुभव हो. सिलेक्शन कमिटी इंटरव्यू लेगी इसके बाद इन पदों पर नियुक्ति की जायेगी. शुरुआत में 3 सालों का कॉन्ट्रैक्ट होगा, और फिर इसे बढ़ाकर 5 साल तक किया जा सकता है. हालाँकि टर्मिनेशन दोनों में से किसी भी पक्ष द्वारा 3 महीने के एडवांस नोटिस पर किया जा सकता है.

विरोधी दलों ने सरकार के इस निर्णय की कड़ी आलोचना की है. कांग्रेस के पी एल पुनिया ने इसे सरकार के द्वारा संघियों को सरकार से जोड़ने के एक और प्रयास के रूप में देखा है.

वही राजद के नेता तेजस्वी यादव ने अपने ट्वीट में इसे संविधान और आरक्षण के उल्लंघन के रूप में देखा है. कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी ने भी उम्मीद के अनुसार इसकी आलोचना की है.

हालाँकि पिछले कई दशकों से आईएस के कार्य प्रणाली पर लगातार सवाल उठ रहे थे. इसकी छवि एक जेनेरलिस्ट कैडर के रूप में बनी रही है, जो बदलते दौर में जनता की बढती उम्मीदों पर खड़ा नहीं उतर पा रहा था. वैश्वीकरण के दौर में specialization प्रशासन और पालिसी मेकिंग की मांग बनती जा रही है, पर लगातार अलग अलग विभागों में ट्रान्सफर, किसी ख़ास विषय में विशेषज्ञता की कमी नौकरशाही को सरकारी खजाने पर बोझ बनाती जा रही थी.

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में वीरप्पा मोइली के नेतृत्व में गठित प्रशासनिक सुधार समिति ने भी आईएस के स्ट्रक्चर में व्यापक परिवर्तन लाने की वकालत की थी, जिसमे सेक्रेटरी लेवल पर आईएस की नियुक्ति के बजाय बाहर से स्पेशलिस्ट लोगों की नियुक्ति की वकालत की गयी थी, लेकिन मनमोहन सरकार ने दृढ राजनीतिक इच्छा शक्ति का परिचय नहीं दिया और सिर्फ कॉस्मेटिक चेंज तक खुद को सीमित रखा.

ऐसे में बदलती परिस्थितियों में नौकरशाही में मोदी सरकार के कदम को फ्रेश और इनोवेटिव आईडिया introduce करने के रूप में देखा जाना चाहिए. और साथ ही ये उम्मीद भी करें कि मोदी सरकार मोइली कमीशन की अनुशंसाओं को गंभीरता से लागू करेगी और प्रशासनिक सुधार को पूर्ववर्ती सरकार की तरह कॉस्मेटिक चेंज तक नहीं रोकेगी.


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