क्या है प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदा?

डिजास्टर मैनेजमेंट एक ऐसा विषय है, जिसके बारे में सारी जानकारी सरकारी पदाधिकारियों के पास ही है, Monopoly of information ! आम आदमी अभी भी इस विषय के बारे में लगभग कुछ नहीं जानता. हालांकि वो साल दर डिजास्टर की चपेट में आता है. प्राकृतिक आपदाओं के कारण प्रतिवर्ष हमारे देश में जान और माल की भारी क्षति होती है. यह सही है कि प्राकृतिक आपदाओं पर मनुष्य का बस नहीं, लेकिन उचित जानकारी के साथ इसके खतरे को कम किया जा सकता है. Marginalised.in डिजास्टर मैनेजमेंट पर 50 आर्टिकल्स का सीरीज लेकर आ रहा है, ताकि डिजास्टर मैनेजमेंट की पेचीदगियों को आम आदमी आम भाषा में समझ सके. प्रस्तुत है इस कड़ी का दूसरा आर्टिकल:


-नकुल तरुण-

अपनी प्राकृतिक भौगोलिक परिस्थितियों और जलवायु के चलते भारत दुनिया में प्राकृतिक आपदाओं से सबसे अधिक ग्रस्त देशों में एक है. साथ ही साथ रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (सीबीआरएन) आपदाओं का संकट भी यहां मौजूद है. आपदाओं से बढ़ते जोखिमों की वजह कहीं न कहीं बढ़ती आबादी, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, उच्च जोखिम वाले इलाकों में विकास जैसे कारकों से भी जुड़े हुए हैं.

आम तौर पर आपदाओं को दो वर्गों में बांटा जा सकता है-
1.  प्राकृतिक आपदाएं: मसलन भूकंप, बाढ़, साइक्लोन, सूनामी इत्यादि

2. मानव निर्मित आपदा: जैसे कि बम विस्फोट, रेडिएशन, युद्ध इत्यादि

यहां साथ में ये भी बताता चलूँ कि आग को डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 में बतौर डिजास्टर शामिल नहीं किया गया है. इसके पीछे तर्क यह है कि आग को काबू में करने के लिए हमारे पास पहले से ही एक सिस्टम बना हुआ है, यही वजह है कि हमारे देश के नीति निर्धारकों ने आग को डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 में शामिल नहीं किया है.

संभवत: ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि आपदाओं से निपटने की तैयारी करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जा सके. मानव निर्मित आपदाओं में CBRN disasters आते हैं, जिसमें कैमिकल, बायोलाजिकल, रेडियोलाजिकल और न्यूक्लियर डिजास्टर को रखा गया है. पहले जिक्र किये गए प्राकृतिक आपदाएं तो हैं ही, पर मानव गतिविधियां इन आपदाओं की विभीषिका और इनके असर को और खतरनाक बनाने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं.


वर्ष 2005 से पहले जब हमारे पास डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट नहीं था, हमारा ध्यान आपदा के बाद राहत पहुचाने पर रहता था. किसी भी आपदा के बाद हम राहत सामग्री बांटने पर अपनी एनेर्जी लगाते थे और आपदा से हुए नुकसान का आंकलन करने के बाद उसकी भरपाई के लिए मुआवजे का प्रबंध करते थे, लेकिन जबसे डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट आया है, इस सोच में निश्चित तौर पर बदलाव आया है, अब हमने अपना फोकस राहत सामग्री बांटने के सीमित लक्ष्य से बढ़ा कर विस्तृत बनाया है और अब हमने आपदाओं से निपटने की तैयारी, उसे रोकने के उपाय और इमरजेंसी सर्विस को मजबूत करने पर फोकस किया है. निःसंदेह ये दृष्टिकोण व्यापक होने के साथ साथ एकीकृत भी है. इसके बेहतर परिणाम सामने आये हैं.

अब हम आपदा के प्रभाव को कम करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और देखा गया है कि इन प्रयासों से आपदा के प्रभाव कम हुए हैं. आपदा प्रबंधन और इसकी योजना को लागू करते वक्त हमें प्रभावित क्षेत्र की स्थिति और साथ ही आपदा प्रबंधन में लगे अधिकारियों की क्षमता को भी ध्यान रखना चाहिए. इस नजरिये को ध्यान में रखते हुए डिजास्टर मैनेजमेंट की हाई पावर कमेटी ने 2001 की अपनी रिपोर्ट में आपदा परिस्थितियों को तीन श्रेणी में रखा है. L1, L2, और L3. सामान्य परिस्थिति को L0 में रखा गया है. L0 परिस्थिति में भी हमारा रिस्पोंस रुकना नहीं चाहिए, बल्कि ऐसे समय में हमें आपदा के खतरे को कम करने पर काम करना चाहिए.

आपदा के तीन स्तर :
लेबल L1 : आपदा का यह स्तर वह है जिसमें जिला स्तर पर उपलब्ध क्षमताओं और संसाधनों के जरिये उसे मैनेज किया जा सके. यद्यपि इसमें आवश्यक होने पर राज्य की मशीनरी सहायता प्रदान करने के लिए तत्परता के साथ उपस्थित रहेगी.
लेबल L2 : लेबल 2 के आपदा  में राज्य स्तरीय एजेंसियों की तैनाती की आवश्यकता होती है. यदि राज्य चाहे तो केंद्रीय एजेंसियों से तत्काल तैनाती के लिए सहायता मांग सकता है.
लेबल-L3 : आपदा का यह  स्तर विनाशकारी होता है. यह एक बहुत बड़े पैमाने पर आये आपदा की ओर इशारा करता है. इसमें राज्य और  जिला अधिकारियों को पूरी तरह जुट जाना पड़ता है.

हालांकि आपदा परिस्थितियों का इस तरह के वर्गीकरण का जिक्र डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 में कही नहीं मिलता है और ना ही इस एक्ट में किसी भी डिजास्टर या आपदा को “राष्ट्रीय आपदा” के रूप में चिह्नित करने का का कोई प्रावधान है.

जागरूकता की अहम भूमिका
आपदाओं से निपटने में जागरूकता की अहम भूमिका होती है. जागरूकता को लेकर कई सक्सेस स्टोरीज भी उभरकर सामने आये हैं. जागरूकता की एक चर्चित कहानी का जिक्र यहां जरूरी है. 1984 के भोपाल गैस कांड से हम सभी परिचित हैं. इस कांड में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 3000 से ज्यादा लोग मारे गये थे, जबकि फैक्टरी के अंदर के लोग बच गये, ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मचारियों को पता था कि जब गैस का रिसाव हो तो क्या करना चाहिए. अगर किसी जहरीली गैस का रिसाव हो तो, चेहरे को एक गीले कपड़े से ढंककर जमीन पर कुछ घंटों के लिए लेट जाना चाहिए.

कुछ घंटों में जहरीली गैस वातावरण में घुलकर फ़ैल जायेगी और लोग बच जायेंगे. फैक्ट्री के कर्मचारियों ने ऐसा ही किया और इस कारण वे साफ़ बच गये लेकिन बाहर के लोगों में जानकारी के अभाव में अफरा-तफरी मच गयी और वे बदहवास होकर इधर उधर दौड़ने -भागने लगे थे, जिसके चलते उन्होंने जहरीली गैसों को और अधिक अपने फेफड़ों में भर लिया, जिसके कारण मौत के आंकड़े बहुत बढ़ गए और आज भी इस भयंकर मानव निर्मित आपदा को हम याद करते हैं.

दिल्ली में रहने वाले नकुल तरुण डिजास्टर एक्सपर्ट हैं. और पिछले पंद्रह सालों से इस सेक्टर में काम कर रहे हैं.

पहली कड़ी : डिजास्टर को मैनेज करने की जरूरत है !!


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