जल संकट की चपेट में कराह रहा शिमला उत्तराखंड के शहरों पर भी साया

शिमला : इन गर्मियों में अगर आप शिमला जाने का प्लान कर रहे हैं, तो आपके लिए चिंता की बात है, हिमाचल प्रदेश की राजधानी इन गर्मियों में सबसे भीषण जल संकट से जूझ रही है. एक वाटर टैंकर की कीमत बढ़ कर 4000 तक हो गयी है और सप्लाई घट कर तीन से चार दिनों में एक बार हो गया है. कुछ इलाकों में पानी के लिए झड़प की खबरें भी आ रही हैं. लोगों द्वारा पडोसी के टैंक से पानी की चोरी की ख़बरें भी छन- छन कर आ रही हैं.

उत्तराखंड के जल संसाधन मंत्री के शब्दों में, “ उत्तराखंड के सारे टूरिस्ट स्थल चाहे वे नैनीताल हों, मसूरी या फिर रानीखेत हों, वे भीषण जल संकट की चपेट में आ सकते हैं अगर जल्द ही वर्षा के जल के संचयन और वर्षा के जल को बहने से रोकने के उपाय न किये गये.”

एक्सपर्ट्स के अनुसार जल संकट की वर्तमान स्थिति जल संरक्षण के उपायों पर अमल नहीं करने के कारण उत्पन्न हुई है. बारिश के पानी का संरक्षण नहीं करने के कारण अधिकांश जल पहाड़ियों की ढलान से होते हुए बह जाता है और इसका नतीजा जमीन के अन्दर जल का seepage नहीं हो पाता. नतीजतन भूजल के श्रोत रिचार्ज नहीं हो पाते और ऐसे में जल के प्राकृतिक सोते सूखे जा रहे हैं और इन सोतों से पोषित नदियों में पानी घटता जा रहा है.

 

उनियाल ने कहा कि हालाँकि ग्लेशियर से निकली नदियों की स्थिति ठीक ठाक है, पर किसी नॉन ग्लेशियर नदी का नाम ले लीजिये- अग्लाद, बंदल, कोसी, या नायर सब नदियां सूख रही हैं.

पेयजल का पीने से बढ़कर अन्य कार्यों में दुरूपयोग राज्य में बढ़ते जल संकट के पीछे बहुत बड़ी वजह है. भारत सरकार के नॉर्म के अनुसार, शहरी क्षेत्र में प्रति व्यक्ति 135 लीटर जल प्रतिदिन उपलब्ध करवाना चाहिए. लेकिन उनियाल के मुताबिक़, उत्तराखंड में कुल पेयजल की उपलब्धता का 80% हिस्सा टॉयलेट के फ्लश, वाशिंग और बागवानी में दुरूपयोग कर दिया जाता है.

उनियाल ने हाल फिलहाल राज्य सरकार को वर्षा के जल का संग्रहण छत पर करने और फिर पाइप के माध्यम से ग्राउंड वाटर को रिचार्ज करने का आईडिया दिया है.

जल संसाधन मंत्री प्रकाश पन्त कहते हैं कि राज्य में विश्व बैंक की मदद से राज्य के शहरी क्षेत्र में 859 हैबिटेशन और ग्रामीण इलाकों के 660 हैबिटेशन में बारिश के पानी के संरक्षण और साथ ही जल के प्राकृतिक सोतों को बढाने के लिए प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है.
नैनीताल में आसन्न जल संकट की आहट सुनी जा सकती है. हिल स्टेशन में जल का एकमात्र श्रोत नैनी झील धीरे -धीरे सूख रही है. ब्रिटिश काल में इस झील की गहराई

93 फीट हुआ करती थी, वही 70 के दशक के मध्य में ये घटकर 74 फीट हो गयी. इसके रिचार्ज का श्रोत बगल में एक झील है, जो सिकुड़ कर आधी हो गयी है, इसके अलावा नैनी झील के चारो ओर होटल, घर आदि बन जाने के कारण बारिश का पानी नहीं पहुँच पा रहा है. प्रशासन ने नैनी झील से प्रतिदिन पानी निकालने की सीमा प्रतिदिन 18 मिलियन लीटर से घटाकर ८ मिलियन लीटर कर दिया है.
शिमला में अभूतपूर्व जल संकट की बात करते हुए विशेषज्ञ कहते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों का बेरोकटोक दोहन, पेड़ों का बड़े पैमाने पर काटना, गैर कानूनी और अबाध रूप से मकानों, होटलों का बनना आदि कारणों के चलते जल श्रोत सूख गए हैं. नतीजा आज शिमला जल संकट की चपेट में कराह रहा है.


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