बंगलादेश के शरणार्थी कैम्पों में मुश्किल हालातों में जीते रोहिंग्या शरणार्थी

 

म्यांमार से भाग कर बंगलादेश में शरण पाने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों में कई बांग्लादेश के फिशिंग इंडस्ट्री में काम पा रहे हैं और रोजाना छोटी कमाई  कर रहे हैं.

समुद्र तट पर स्थित फिशिंग कॉलोनी के पास स्थित शाम्लापुर शरणार्थी कैंप में लगभग 10,000 रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं. म्यांमार के रखीन प्रान्त से सांप्रदायिक हिंसा से जान बचा कर यहाँ आये हुए हैं.

20 वर्षीय मुहम्मद युसूफ कहते हैं: वहां से भाग कर हमलोगों ने जान बचाई है. इसलिए हमलोग यहाँ पर खुश हैं. युसूफ एक मछुआरे के रूप में काम करते हैं और समुद्र में हर पांच दिनी ट्रिप के लिए 200 से 300 टका कमा लेते हैं.

युसुफ जब म्यांमार से भाग रहे थे, तो उस समय उनकी पत्नी सोबोरा खातून 9 महीने की गर्भवती थीं. दो महीने मौत के साए में रहने के बाद वे म्यांमार छोड़ पाने में सफल हो रहे थे, पर नदी पार करते समय उनका तीन साल का बेटा डूब कर मर गया, बेटी रुकिया का जन्म सुरक्षित तरीके से हो पाया.

लगभग 7,00,000 रोहिंग्या मुस्लिम military क्रैकडाउन शुरू होने के बाद म्यांमार से पलायन किया और लगभग सभी ने बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार के शरणार्थी कैम्पों में शरण पाया.  हालाँकि शरणार्थी कानूनी तौर पर काम नहीं कर सकते, पर कुछ मछली पकड़ने वाली नौकाओं पर काम पा लेते हैं, और कई नावों को समुद्र में धकेलने का काम करते हैं. ये बंगाल्देशी नावें अपने ढाँचे में उन्ही नावों की तरह हैं, जिनमे बैठ कर हज़ारों रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश के तट आ लगे.

 

कई अन्य रोजगार पाने  के लिए मछली को संरक्षित रखने के लिए बर्फ की सिल्लियाँ तोड़ने के काम में लगे हुए हैं, कई फिशिंग नेट्स के मरम्मत के काम में लगे हैं तो कई नावों की मरम्मत में लगे हुए हैं.
शामलापुर शरणार्थी कैंप में लगभग 40 फीसदी रोहिंग्या शरणार्थी अपने किसी एक पारिवारिक सदस्य की कमाई पर निर्भर हैं, जो इस तरह से अवैध तरीके से जीविकोपार्जन में लगा हुआ है. वही लगभग 5 फीसदी रोहिंग्या शरणार्थी विदेश में बसे अपने रिश्तेदार द्वारा समय समय पर भेजे गए आर्थिक मदद पर निर्भर है.


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