गायब होती बच्चियां, जानें क्या कैसे परिणाम भुगतने होंगे?

भारत में सरकार चाहे कितने भी दावे कर लें और ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ का अभियान चलाये, पर सच्चाई यही है कि आज भी हमारे समाज में लिंग आधारित भेदभाव किया जाता है और लड़कियों को लड़कों से कमतर माना जाता है. यहां तक कि उनसे जीने का अधिकार भी छीन लिया जाता है.

एक इंटरनेशल संस्थान ‘लेंसेट ग्लोबल हेल्थ’ द्वारा प्रकाशित एक रिसर्च में बताया गया है कि 0-6 साल तक की बच्चियों में से प्रतिवर्ष 239,000 बच्चियां अपने लिंग के कारण मारी जाती हैं. इन मौतों का कारण परिवार और डॉक्टरों की लापरवाही और उनके साथ किया जाने वाला भेदभाव जिम्मेदार है. भारत में बच्चियों को भोजन देने में भी भेदभाव किया जाता है.

रिसर्च में बताया गया है कि भारत में बच्चियों को शिक्षा देने में भी भेदभाव किया जाता है और उन्हें लड़कों की तरह गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा नहीं दी जाती है. देश में ना तो बच्चियों के पोषण का ध्यान रखा जाता है और ना ही उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं ही उपलब्ध करायीं जाती हैं. महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि हमारे देश में प्रतिदिन दो हजार बच्चियां गर्भ में मार दी जाती हैं. यही कारण है कि हमारे देश में 2011 की जनगणना के अनुसार 0-6 साल के बच्चों में लिंगानुपात घटकर प्रति हजार पुरुष पर 919 महिला का हो गया है, जबकि 2001 में यह 927 था.

child sex ratio 2011

हालांकि कुल आंकड़ा प्रति हजार पुरुष पर 940 है. राज्यवार आंकड़े पर गौर करें तो सबसे अरुणाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रति एक हजार पुरुष पर 972 ल ड़कियां हैं 2001 की जनगणना में यह आंकड़ा 893 था जिसमें अब काफी सुधार हुआ है और सबसे खराब स्थिति पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में है, जहां प्रति एक हजार पर 846 और 830 लड़कियां हैं, जबकि झारखंड में यह आंकड़ा प्रति एक हजार पर 948 और बिहार में 935 है, बिहार में आंकड़ा गिरा है क्योंकि वहां 2001 की जनगणना में 948 बच्चियां थीं.

वर्ष 2011 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लेसेंट ने पाया कि 1981 से 2011 तक भारत में 12 मिलियन मादा भ्रूण का गर्भपात किया जा चुका था.
हालांकि हमारे देश में भ्रूण परीक्षण गैरकानूनी है और इसके लिए सजा का भी प्रावधान है, बावजूद इसके खुलेआम धड़ल्ले से मादा भ्रूण का गर्भपात हो रहा है. यह स्थिति चौंकाने वाली तो नहीं है लेकिन इसके कई गंभीर परिणाम हमारे देश के सामने उभर रहे हैं, जिसे दरकिनार कर कोई भी सभ्य समाज आगे नहीं बढ़ सकता है, क्योंकि इससे महिलाओं का आत्मसम्मान भी जुड़ा है.

 

यह स्थिति समाज के लिए अलार्मिंग है, क्योंकि समाज के सुचारुरूप से संचालन के लिए दुनिया में लड़कियों का होना भी जरूरी है. गायब होती बच्चियों ने ‘फेक मैरिज’ के चलन को बहुत तेजी से बढ़ावा दिया है, जिसके कारण झारखंड, बंगाल और बिहार जैसे राज्यों से लड़कियां लेजाकर हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में बेची जाती हैं जहां एक ही परिवार में वो कई पुरुष सदस्यों की पत्नी या यूं कहें कि शारीरिक जरूरत पूरा करने और परिवार के लिए बच्चे पैदा करने की मशीन होती हैं , जिन्हें जरूरत पूरा हो जाने पर परिवार से निकाल फेंका जाता है. उत्तर भारत में लड़कियों का गिरता प्रतिशत चाइल्ड ट्रैफिकिंग या ह्यूमन ट्रैफिकिंग का एक बड़ा कारण है. यह समाज में स्त्रियों के खिलाफ अपराध को बहुत ज्यादा बढ़ा रहा है, इसलिए जरूरी यह यह है कि हम समय रहते सतर्क हो जायें मामले को बदतर होने से बचा लें, अन्यथा गायब होती बच्चियां हमारे समाज को भी गायब कर सकती हैं.


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