मेरी दार्जीलिंग यात्रा

मेरी दार्जीलिंग यात्रा:

सुजीत शर्मा बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर प्रखंड के एक प्रतिभाशाली युवा हैं. निरंतर पढ़ते लिखते रहना, यात्रा करने के अवसर ढूंढते रहना, सुजीत के शौक हैं. सुजीत बहुत बेहतरीन स्केच बनाते हैं. वे ताजपुर में अपनी कोचिंग संस्था चलाते हैं और साथ ही दो प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते भी हैं. इस यात्रा संस्मरण में सुजीत दार्जीलिंग में बिताएं पांच दिनों को याद कर रहे हैं. पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है, मानो आप भी सुजीत के साथ दार्जीलिंग की खुबसूरत वादियों, पहाड़ियों में घूम रहे हों.

दार्जीलिंग एक बेहद ख़ूबसूरत हिल स्टेशन है. आज मेरा यहां पाँचवां दिन है. पांच दिनों से प्रकृति के सानिंध्य में समय बिताना एक शानदार अनुभव रहा है.
पहला दिन:

दार्जीलिंग पश्चिम बंगाल का एक नगर है. यह नगर शिवालिक पर्वतमाला में लघु हिमालय में अवस्थित है. यहां की औसत ऊंचाई 2134 मीटर (विकिपीडिया के अनुसार ) है. ताजपुर से दार्जीलिंग आने के लिए पहले ताजपुर से सिलीगुड़ी बस से आना पड़ता है. बस ac और non-ac दोनों उपलब्ध है. सिलीगुड़ी से दार्जीलिंग करीब-क़रीब 60 km दूर है. पहाड़ी रास्ता होने के कारण इस दूरी को तय करने में क़रीब-क़रीब 3 घंटे लग जाते है.

सिलीगुड़ी में जब हमारी बस आकर लगी, तब तक सुबह के 8 बज चुके थे. बस से उतरते ही टैक्सी वाले का शोर सुनाई पड़ा..दार्जीलिंग- दार्जीलिंग. दार्जीलिंग के अलावा कोई और बात समझ में नही आई. वो नेपाली बोल रहे थे. खैर इतना तो समझ में आ ही गया कि अब टैक्सी खुलने वाली है. 4 सीट खाली है, मतलब उन्हें चार पैसेंजर और चाहिए. बहरहाल मैं टैक्सी के पीछे वाले सीट पर बैठ गया. मेरे साथ वाली सीट पर एक बेहद ख़ूबसूरत कपल्स बैठे थे जो अपनी छुट्टियां बिताने दार्जीलिंग जा रहे थे. टैक्सी चल पड़ी. टैक्सी जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, वैसे- वैसे प्राकृतिक सुंदरता बढ़ती जा रही थी. मैं प्राकृतिक सुंदरता को निहारता अपनी ही सोच में डूबता- उतराता जा रहा था. टैक्सी जब जलेबीनुमा रास्ते पर बार-बार मुड़ती थी तो रोमांच और भी बढ़ जाता था. चाय के बड़े- बड़े बागानों में औरतें चाय को तोड़ते हुए बहुत सुन्दर लग रही थी. खास कर अपने पीठ पर बड़े-बड़े बैगों को टांगे हुए सड़क पर एक कतार में चलती हुई झुंड बरबस हिंदी फिल्मों के तमाम दृश्यों की याद दिला रहा था. रास्तें भर में कलरफुल लकड़ियों के बने घर कितने ख़ूबसूरत लग रहे थे ! यक़ीनन पृथ्वी कितनी सुंदर है जिसे प्रकृति ने बेहद ख़ूबसूरत तरीक़े से सजाया है. ख़ूबसूरत वादियों से गुजरते हुए जब स्टीम इंजन वाली टॉय ट्रेन दिखी तो बरबस ही परिणीता फ़िल्म का एक गाना मस्तिष्क में गूंजने लगा…कस्तो मज़्ज़ा हे  रेलेमा.. और हाँ आराधना फिल्म का वो गाना, “मेरे सपनों की रानी, कब आएगी तू”. रास्ते में टैक्सी कुछ देर रुकी तो कुछ सेल्फीज़ यादों के लिए ले लिया. रास्ते में कुछ जाम ने परेशान किया. पर अंततः अपने गंतव्य पर 11:30 बजे पहुँचा. मैं यहाँ आभा आर्ट गैलरी के पास ही रुका अर्थात लगभग दार्जलिंग के केंद्र में.

दार्जीलिंग का मौसम सामान्यतः एकदम ठंडा रहता रहता है. जून के मौसम में प्रायः यहां बारिश होती रहती है. बीच-बीच में हल्की धूप भी निकल आती है. अपने कमरे से बाहर आकर साफ मौसम में देखने पर यहां ( मेरे रुकने की जगह से ) कंचनजंघा का अच्छा व्यू मिल जाता है. वैसे इसे दार्जीलिंग के क़रीब-क़रीब सभी जगह से साफ मौसम में देखा जा सकता है. यहाँ लोग मुख्यतः नेपाली और बंगाली बोलते है. फ़िलहाल तो मैंने अब तक जितने लोगों को सुना, वो नेपाली बोल रहे थे जो मेरे पल्ले बिल्कुल नहीं पड़ रहा था. यहाँ का जीवन विषमताओं से भरा है. पानी की कमी है. यहाँ लोग डब्बों में पानी इकट्ठा करके रखते है. चूँकि  अभी टूरिस्ट यहां बहुत आते है, इसलिए ज्यादातर पानी का सप्लाई होटल्स में की जाती है. यहां के लोग बेहद मेहनती है. यहां महिलाएं भी अच्छा हिस्सेदारी निभाती है. यहां महिलाएं आपकों दुकानों, पेट्रोल पंप, टूरिस्ट प्लेस आदि सभी जगहों पर कार्य करती मिल जाएगी. मैंने एकबात गौर किया है जहां महिलाओं की हिस्सेदारी सभी कार्यों में अच्छा है, वहां की जिंदगी ज्यादा खुशहाल और उन्नत है. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण महिलाओं की हिस्सेदारी का बेहद कम होना है.

पहले दिन मैंने नजदीक के टूरिस्ट प्लेस और यहां के मार्केट घूमने का प्लान रखा. नजदीक में चौरास्ता, महाकाल मंदिर, दार्जीलिंग स्टेशन क़रीब 5 km की दूरी पर है. सबसे पहले मैं नजदीक के ही आभा आर्ट गैलरी में गया. ख़ूबसूरत पेंटिंग से सजी गैलरी बेहद ख़ूबसूरत है. सिल्क कपड़ों और पेंट से बनी कलाकृति को देखकर मेरे अंदर का कलाकार हिलेरों मारने लगा कि अभी मुझे और स्केचिंग और पेंटिंग पर कार्य करना होगा. फिर वहाँ से पैदल चौरास्ता निकल लिया. लोकल मार्केट और लोगों को रास्ते भर अवलोकन करता रहा. स्टेशन के पास पहुँचते ही मौसम एकदम साफ हो गया और कंचनजंघा का मनोहारी दृश्य फिर से देखने को मिला. चौरास्ता एक टूरिस्ट प्लेस है. वहां अच्छे ख़ासे संख्या में टूरिस्ट देखने को मिल जाते है. आप वहाँ घोड़े की सवारी कर सकते है, शॉपिंग कर सकते हैं. हालांकि यह जेब पर भारी पड़ेगा. यहां पर एक बेहतरीन बुक्स स्टोर भी है. बेहद भव्य ! यहां हर किस्म की किताबें उपलब्ध हैं. हम जैसे पुस्तक प्रेमियों के लिए इससे बढियां क्या हो सकता है !  5 किताबों की खरीदारी कर डाली. इसे अब आराम से रूम और सफ़र में पढूंगा. बहरहाल चौरास्ता पर भी कुछ तस्वीरे ले ली. फिर वहां से महाकाल मंदिर की ओर चल दिया. यहां दार्जलिंग में आपकी अच्छी खासी कसरत हो जाती है. खूब चढ़ाई करनी पड़ती है. भारत देव भूमि कहलाती है. इसके कण-कण में एक आध्यात्मिक चेतना है. एक spritual ग्लो है. यह बात हर यात्रा के साथ पुख्ता होती जाती है. आप भारत में यात्रा करते हुए यहां के मंदिरों का दर्शन किये बिना भारत को नही समझ सकते है. हर मंदिर के साथ कुछ कहानियां जुड़ी होती है. कहानियों में भारत दर्शन होता है.

दूसरा दिन:
टाइगर हिल, दार्जीलिंग की सबसे प्रसिद्ध जगहों में से एक है. आज के दिन का शुरूआत यही से करनी थी. टाइगर हिल की ठंड अमूमन मुख्य शहर से 6 गुना ज्यादा रहती है. उसपर से वहां 4 बजे सुबह में पहुँचना था.

खैर मेरे लिए सुबह 2 बजे ही हो गयी. फ़टाफ़ट तैयार हुआ. मेरे साथ जाने वाले बच्चें यानी कि नेहा, रश्मि, बिट्टू और अभिनव ख़ासा उत्साहित थे. वे लोग भी तैयार हो चुके थे. माँ और मौसी भी साथ हो ली. 2:30 बजे हमारी गाड़ी आभा आर्ट गैलरी के बाहर लग चुकी थी. हमलोग मस्ती करते हुए 4 बजे टाइगर हिल पहुँच गए. अगर बहुत भीड़-भाड़ ना होती तो और जल्दी पहुँच सकते थे. टूरिस्ट की इतनी भीड़ थी कि गाड़ी काफी पहले ही लगानी पड़ गयी. हमलोग वही से पैदल टाइगर हिल पर पहुँचे. वहाँ लोग ख़ासा उत्साहित नजर आ रहे थे. हर किसी के हाथों में मोबाइल फ़ोन्स और कैमरे दिख रहा था. सब लोग जो होने वाला था उसे अपने कमरे में कैद करने के लिए बेताब दिख रहे थे. मैं तो उस दृश्य को अपनी नजरों और अपने सैमसंग गैलेक्सी एस 7 में कैद करने के लिए अधीरता से प्रतीक्षा कर रहा था. बच्चों की भी आंखें आसमान की ओर टंगी हुई थी. बीच-बीच मे कुछ औरतें चाय और कॉफी के बार-बार पूछ रही थी.

आख़िरकार 5:15 am (लगभग ) में ख़ूबसूरत सूर्य का उदय होना शुरू हुआ. एकदम लाल-लाल फ़ल के जैसे धीरे-धीरे वो बादलों की ओट से ऊपर आता जा रहा था. जैसे-जैसे वो ऊपर आ रहा था वैसे-वैसे उसका आकार बढ़ता जा रहा था. सच कहूं तो उस सुंदरता और गजब की आभा का वर्णन करने के लिए मुझे शब्द नही मिल रहे. अगर मैं कवि होता तो एक दो कविता लिख ही डालता. कुछ लोग हाथ जोड़कर सूर्य नमस्कार कर रहे थे जबकि ज्यादातर लोग अपने कैमरे को ताने उसकी तस्वीर लिए जा रहे थे. मैं अपनी आंखों से सूर्य को ऐसे निहारे जा रहा था जैसे एक प्रेमी अपने प्रेमिका को निहारता है. वो पल कितना ख़ूबसूरत था ! कितना सुहावना !!  अद्भुत है हमारी पृथ्वी और अद्भुत है हमारी प्रकृति !

टाइगर हिल से पैदल हम नज़दीक ही सिंचल देवी मंदिर की ओर बढ़े. यह मंदिर भी अपनी भव्यता से टूरिस्ट का ध्यान अपनी ओर खींचता है. जैसा कि मैंने अपने पिछले पोस्ट में जिक्र किया था कि भारत में सभी मंदिर का दर्शन किये बिना भारत दर्शन संभव नही है. एक बात और, अगर दार्जीलिंग में घूमना है तो आपको अच्छी ख़ासी पद यात्रा करनी पड़ेगी. सभी जगह गाड़ी से जाना संभव नही. सिंचल मंदिर के अंदर जूते उतारकर नंगे पैर जब जाना हुआ तो पैर की हालत मैं बयां नही कर सकता. फर्श बेहद ही ठंडा था बिल्कुल बर्फ़ के मानिंद ! लेकिन माता के दर्शन करना था, तो करना था. हमलोग अंदर पूरी मंदिर घूमे भी और खूब सारे तस्वीरों के जरिये यादे भी कैद की. पास में एक और मंदिर था और एक तालाब भी. तालाब के बारे में मान्यता है कि उसमें सिक्कें फेंक कर जो मांगो वो मिल जाता है. खैर इसपर मैं क्या कहूँ ? सब आस्था की बात है.

सिंचल मंदिर से पैदल ही हमलोग अपने गाड़ी की ओर बढ़े. रास्ते भर के ख़ूबसूरत दृश्य को अपनी कैमरे में कैद किया. रास्ते भर कंचनजंघा के अद्भुत दर्शन भी हो रहे थे. गाड़ी में पहुँच कर अब हम लोगों को अगले टूरिस्ट प्लेस तक पहुँचना था. वहां से निकल कर हमलोग बताशी पार्क पहुँचे. पार्क के अंदर जाने का हर व्यकि पर 20 रुपए टिकट है. इसके चारों ओर से टॉय ट्रेन की ट्रैक है. बीच मे एक लंबा से टावर है. पास में पत्थरों से बना टेबुलनुमा संरचना है जिसपर उन सभी फिल्मों का जिक्र है चाहे वो हॉलीवुड की हो या बॉलीवुड की. उसके बगल में ही लगभग बहुत सारे दूरबीनों को एक कतार में लगाया गया है जहां से आप कंचनजंघा और दार्जीलिंग नगर का विहंगम दृश्य देख सकते है. हालांकि इसके लिए आपको 30 रुपए ख़र्च करने पड़ेंगे. हमलोगों ने कुछ समय पार्क में बिताया और पास के ही रेस्टुरेंट में नास्ता भी किया. उस समय तक करीब सुबह के 8 बज गए थे. वहां की ख़ूबसूरत यादों को कैमरे में कैद करते हुए अगले पड़ाव यानी कि रॉक गार्डन के ओर बढ़ गए.

रॉक गार्डन की काफी तारीफ बहन लोगों से सुन रखे थे. वास्तव में रॉक गार्डन बेहद ख़ूबसूरत है भी. यह मुख्य नगर से काफी नीचे है. नीचे से ऊपर की ओर चढ़ाई करते हुए आप पूल से होकर गुजरते जाते है और झरना मिलता जाता है. हालांकि सोर्स एक ही है पर बेहतरीन तरीके से चार या पांच भागों में बटा है. छोटे छोटे पार्क और गुफाएं है. चटान को काट कर आकर्षक कलाकृतियां बनी है. पास में ही गंगा की धारा अविरल बहती है. इस जगह के बारे में ज्यादा जानने का मौका नही मिला. एक तो सब अच्छे ख़ासे थक चुके थे और उपर से सुबह में बिना खायें पिये ही निकले थे. इसलिये वही से वापस रूम पर लौट आये. आख़िर फ़ास्ट फ़ूड खा कर कब तक रहा जा सकता था ? रास्तें में सिर्फ मोमो, मैगी आदि ही मिल रहे थे जो कि काफी महंगे थे. साथ में लाये पीनट्स, किसमिश, केले और सेब भी ख़त्म हो गए थे. अब आगे का कार्यक्रम तीसरे दिन पर डाल दिया गया.

तीसरा दिन:

आज टॉय ट्रेन से पूरे दार्जीलिंग को देखना था. मैंने इसका टिकट घर से आते वक्त ही बुक कर लिया था जिसकी टिकट दर प्रति व्यक्ति 30 रुपये है. पर यहां आकर पता चला कि टिकट कैंसल हो गयी है. मुझे लगा कि टॉय ट्रेन की यात्रा तो गयी. भला हो मौसा जी का, जिनका यहाँ अच्छी जान पहचान है. उन्होंने यहां दार्जीलिंग स्टेशन से ही टिकट बुक करवा दिया. वो दरअसल यहाँ इस समय टूरिस्ट का जबरदस्त जमावड़ा रहता है. इसलिए टिकट का रेट बहुत ज्यादा हाई रहता है.

एक-एक टिकट 2500 से 5000 रुपये तक का मिलता है. खैर मुझे वही टिकट 825 रुपये में मिल गए. सुबह 10 बजे टॉय ट्रैन पर बैठा जिसे ‘घूम स्टेशन’तक जाकर फिर वापस ‘दार्जीलिंग स्टेशन’ तक आना था. एक डब्बे में कुल 30 लोग बैठते है. ऐसे कुल 5 या 6 डब्बे होते है. टॉय ट्रेन की बनावट इस प्रकार है कि आप इसमें बैठे-बैठे बाहर के नजारे का भरपूर लुत्फ़ उठा सकते है. यह मुख्य शहर से गुजरते हुए आपको घूम स्टेशन तक ले जाती है. जैसे ही ट्रेन धुआँ और स्टीम को छोड़ते आगे बढ़ा, सब अपने-अपने फ़ोन लेकर बाहर के नजारे को कैद करने में मश्गूल हो गए. मैं खिड़की से बाहर देखता हुआ दार्जीलिंग के अद्भुत नजारे को आँखों मे कैद करने लगा. डब्बे में मौजूद लड़के-लड़कियाँ जोर-जोर से गाना गा रही थी…ये हवाएं..गुनगुनाएँ…ट्रैन बताशी पार्क में करीब 15 मिनट तक रुकी. तब तक सब लोग पार्क में घूमे और तस्वीरों को अपने-अपने कैमरे में कैद किया. ट्रैन फिर घूम स्टेशन तक पहुँची जहां वह आधे घंटे तक रुकी. आधे घंटे बाद फिर दार्जलिंग स्टेशन में करीब 1 बजे वापस आ गयी. मैं समझता हूँ कि अगर आप दार्जीलिंग आये और बिना टॉय ट्रेन का लुत्फ़ उठाये चले गए तो आपकी यात्रा अधूरी रह गयी. अगर आप दार्जीलिंग आते है तो आपको टॉय ट्रेन का लुत्फ़ लेना चाहिए.

तीसरे दिन ही यहां के मार्केट में भी घुमा. हालांकि कुछ खरीदा नही. एक तो बहुत सस्ते चीजों का दाम भी यहाँ बहुत महंगा है और दूसरे यात्रा में बहुत सारा सामान लेकर घूमना मुझे बिल्कुल पसंद नही है. एक जापानी टेम्पल घूमने के अलावा आज के दिन का कुछ और उल्लेखनीय नही है. अब देखते है कि कल क्या घुमा जा सकता है ?

चौथा दिन:
दार्जीलिंग में आज चौथा दिन था. आज के दिन यहां के ज़ू को घूमने का प्लान बनाया. दार्जीलिंग की ख़ूबसूरत वादियों में ही घूमना आंखों को सकून देता है. उसपर से ज़ू में एक दिन बिताना एक शानदार प्लान था. मुझें दार्जीलिंग को ज्यादा से ज्यादा समझना था. इसलिए मैं रूम से ज़ू तक पैदल ही गया. रास्ते भर में दार्जीलिंग बाजार, चौरास्ता, महाकाल मंदिर और दार्जीलिंग के कॉलेजों को ऑब्जर्व करता हुआ ज़ू पहुँचा. यहां के ज़ू का टिकट प्रति व्यक्ति 60 रुपये है. ख़ैर अंदर गया. सामने में भालू स्वतंत्र रूप से घूम रहा था. उसके इर्द गिर्द गहरा गड्डा बना था ताकि वह बाहर लोगों पर हमला ना कर दे. उसके आगे पिंजरे में बहुत प्रकार के पक्षियों का रखा गया है. मुझे पता नही क्यों किसी भी ज़ू में जाकर खुशी नही मिलती. जानवरों को इस तरह पिंजरे में बंद होकर कातर निगाहों से बाहर देखना बेहद चुभता है. इस ज़ू की ख़ासियत है कि यह भारत में सबसे ऊँचाई पर अवस्थित ज़ू है. उसके अलावा स्नो लेपर्ड, रेड पांडा, हिमालय वोल्फ आदि जानवर इस ज़ू के मुख्य आकर्षण है. यहाँ अंदर में ही एक शानदार म्यूजियम है जिसमे अनेक जानवरों और पक्षियों की जानकारियां उपलब्ध है.

पांचवा दिन

आज का दिन एक ख़ूबसूरत याद बनकर रहेगी. आज सुबह-सुबह अमन जो कि सिर्फ 8th क्लास में है, ने कहा कि ,”भैया, आज गंगा मैया चलते है. आज मैंने आपके साथ घूमने के लिए स्कूल से छुट्टी ले ली है. मुझे वहाँ का रास्ता मालूम है. आपको बहुत मज़ा आएगा.” मैंने हामी भरी और हम दोनों पैदल ही वहां के लिए सवेरे 10 बजे निकल लिए. वहां से रास्ता अनेक चढ़ाई और उतार के साथ था. रास्ते भर ख़ूबसूरत प्राकृतिक दृश्य थे जिसका वर्णन करना आसान नही है. कभी जंगलों के बीच से पतली सी बनाई सड़क पर चल रहा था तो कभी बहते पानी के ऊपर बनाये गए पूल से गुजर रहा था. पहाड़ी जगहों पर बहता पानी बेहद खूबसूरत लगता है. लगता है कि प्रकृति ने जगह-जगह छोटे-छोटे झरनें बना दिये हो. बीच-बीच में अमन मेरी तस्वीर निकलता चल रहा था. मैं भी प्राकृतिक नजारों को अपने कैमरे में कैद करने में कोई कोर कसर नही छोड़ रहा था. दूर-दूर तक कोई दिखाई नही दे रहा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हमलोग किसी घनघोर जंगल से गुजर रहे थे. मैं के बार उससे पूछ बैठता था,” हमलोग सही दिशा में जा रहे है ना.” वो कहता,”फिकर नॉट ब्रदर..मैं हूँ ना !” आखिरकार हमलोग जंगलों से निकलकर मुख्य सड़क पर पहुँच गए.

मुख्य सड़क तक पहुँचतें ही तेज बारिश शुरू हो गयी. हमलोग जल्दी से किनारे बने एक छत के नीचे खड़े हो गए. वहां पर काफी टूरिस्ट खड़े थे. बहुत सारी लड़कियां वहां के परंपरागत ड्रेस और चायपत्ती को जमा करने के लिए टोकरी अपनी पीठ पर लटकाएँ खड़ी थी. वो दरअसल फोटोशूट करवाने के लिए तैयार थी कि बारिश आ गयी. आप भी पैसे देकर वो ड्रेस पहन सकते है और फ़ोटो खिंचवा सकते है. हम दो भाई उस छत जो कि तिरपाल का बनाया हुआ था, के अंदर ख़ुद को किसी तरह से भींगने से खुद को बचाए हुए थे. तब तक करीब साढ़ें 11 बज चुके थे. जब बारिश रुकी तो हमलोग वहां से निकले और रोड पर चल दिये, जो लगातार नीचे की ओर जा रही थी. कुछ दूर आगे बढ़े नही की फिर तेज बारिश शुरू हो गयी. अब तो बचने की कोई जगह नही थी. थोड़ी ही देर में अच्छी तरह से भींग गया. हालांकि हमारे कदम रुके नही और हम बढ़ते गए. मुझे बारिश में भीगना बेहद पसंद है. दूर-दूर सड़क पर कोई नही दिखाई नही दे रहा था. हमलोग बारिश का आनंद उठाते हुए चलते रहे. बीच-बीच में तस्वीर भी लेते रहे. थैंक्स टु माई सैमसंग गैलेक्सी एस7 ! इसकी वाटर रेजिस्टेंस की सुविधा बहुत काम आयी. चारों ओर के ख़ूबसूरत प्राकृतिक दृश्य मन को एक अजीब ताजगी दे रहा था. आख़िरकार हमलोग क़रीब 1 बजे गंगा मैया तक पहुँच गए. बेहद ख़ूबसूरत गंगा की धारा को चट्टानों के बीच से बहते देखना आंखों को बेहद अच्छा लगा. उसकी ठंडी धारा में पैर डाले बैठे रहने में एक सुखद दे अहसास रहा था. वहां हमलोग क़रीब घंटे भर बैठे रहे. फिर इन ख़ूबसूरत यादों को दिल में बसाये वापस लौट गए. दार्जीलिंग का यह आख़िरी दिन सबसे रोमांचक और ढेर सारी सुखद यादों को देने वाला साबित हुआ.


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