कर्पूरी जननायक कहलाते थे, तो लालू जननेता हैं

बिहार की राजनीति का इतिहास लालू के जिक्र के बगैर अधूरा है. जिस तेज गति से लालू का बिहार की राजनीतिक क्षितिज पर उदय हुआ, वो चमत्कृत कर देने वाला था. साधारणतः मेनस्ट्रीम की मीडिया ने लालू के साथ न्याय नहीं किया है, जातिगत चश्मे से देखा, समाज के विशाल तबके के नेता के रुप में कम, और बिहार की तमाम बदहाली का ठीकरा लालू के सर पर फोड़ा, जो कि सही नहीं. ये तस्वीर एकांगी है. बिहार की बदहाली की जिम्मेवारी कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों को भी लेना होगा. लालू कहा करते थे कि वे 20 साल तक सत्ता में रहेंगे, और वे 15 साल तक सत्ता में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रहे. उनका जीवन एक स्वप्निल सफ़र की तरह रहा है, जिसमे उन्होंने बहुत कुछ पाया, कई सफलताएँ और कुछ असफलताएं भी उनके हिस्से आयीं. हम इस सीरीज में उनके बारे में, उनके व्यक्तित्व के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे.

आज हम चर्चा की शुरुआत करेंगे किन चीजों ने लालू को एक फेनोमेना बनाया.

1988 में कर्पूरी ठाकुर के आकस्मिक निधन के बाद वे 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बने, रामसुंदर दास और अनूप लाल यादव जैसे धाकड़ नेताओं को पछाड़ कर. इसमें उन्हें शरद यादव ने बहुत महत्वपूर्ण सहयोग दिया. इसकी चर्चा फिर कभी होगी. फिलहाल चर्चा लालू के उन कार्यों की, जिसने उन्हें उनके फर्स्ट टर्म में जननेता की छवि दी और बिहार का शीर्ष नेता बना दिया.

“माई हम मुख्यमंत्री बन गैनी

ई का होला?

ई जे हथुआ महाराज बाडन उनको से बर

अच्छा ठीक बा जाए दे, लेकिन तुहरा सरकारी नोकरी ना नु मिलल”

लालू जब मुख्यमंत्री बनकर अपनी माँ मरछिया देवी से आशीर्वाद लेने पहुंचे, तो ये बात हो रही थी. लालू कई सालों तक इस घटना का जिक्र करते रहे. 1991 में उनकी माँ का देहांत हो गया, सीएम् आवास में उनके ड्राइंग रूम में उनकी माँ की तस्वीर लगी हुई थी, वे मेहमानों से जिक्र किया करते थे कि कैसे बचपन में इतनी गरीबी थी कि माँ उन्हें आटा और पानी का घोल बना कर पिला दिया करती थी.

जब जिक्र आता है, जनता दरबार का तो वैसे तो सबसे पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह ( अगस्त 1983- मार्च 1985) ने जनता दरबार शुरू किया, लेकिन उस समय स्थिति ये थी कि पूरी तरह नौकरशाह हावी थे, आम आदमी अपने मुख्यमंत्री से बात नहीं कर सकता था, बस अपना आवेदन पत्र देना था और निकल लेना था, लेकिन लालू ने इस सिस्टम को ध्वस्त किया और जनता दरबार को सही मायने में जनता दरबार बनाया. एक बार 1993 में नौबतपुर से एक महिला लालू के जनता दरबार में शिकायत लेकर आई कि उसका शराबी पति उसे बहुत मारता पीटता है, लालू ने तुरंत नौबतपुर थाने के इंस्पेक्टर को फ़ोन लगाया और आदेश दिया कि तुरंत इस आदमी को पकड़ कर लाओ. दो घंटे में इंस्पेक्टर ने उस शराबी आदमी को दरबार में हाज़िर कर दिया. लालू ने उसे एकदम स्पष्ट शब्दों में खबरदार किया कि आगे से वो अपनी पत्नी को प्रतारित न करे.

 

एक दुसरे उदाहरण में, लालू एक बार देहरी ऑन सोन से पटना लौट रहे थे. वे एम्बेसडर कार में बैठे हुए थे. अचानक उन्होंने अपने ड्राइवर को गाडी रोकने का आदेश दिया. सारे लोग घबरा गए और सोच में पड़ गए कि बिना उचित सुरक्षा का उचित इंतजाम किये कैसे मुख्यमंत्री यूं ही कहीं जा सकते हैं. पर लालू तो लालू थे. वे गाडी से उतर कर बगल की दलित डोम बस्ती में चले गए और उन्होंने एक झोपडी के दरवाजे को खटखटाया. अन्दर से आवाज आई: के है? ललुआ ! अन्दर से एक वृद्ध आदमी तुरंत झट से दरवाजा खोल कर आया और सीधे लालू के सीने से लिपट गया.

पहली बार बिहार की जनता देख रही थी कि बिहार का मुख्यमंत्री हमारा आदमी है. लालू की लोकप्रियता बढ़ रही थी. दबी कुचली जनता जयकारे लगा रही थी.

दबे पिछड़े लोगों को शिक्षित करने के लिए उन्होंने नारा दिया: आधी रोटी खायेंगे, फिर भी स्कूल जायेंगे.

इसकी चर्चा अगले आलेख में.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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