और लालू बिहार में सेकुलरिज्म के सबसे बड़े चैंपियन बनकर उभरे

बिहार की राजनीति का इतिहास लालू के जिक्र के बगैर अधूरा है. जिस तेज गति से लालू का बिहार की राजनीतिक क्षितिज पर उदय हुआ, वो चमत्कृत कर देने वाला था. साधारणतः मेनस्ट्रीम की मीडिया ने लालू के साथ न्याय नहीं किया है, जातिगत चश्मे से देखा, समाज के विशाल तबके के नेता के रुप में कम, और बिहार की तमाम बदहाली का ठीकरा लालू के सर पर फोड़ा, जो कि सही नहीं. ये तस्वीर एकांगी है. बिहार की बदहाली की जिम्मेवारी कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों को भी लेना होगा. लालू कहा करते थे कि वे 20 साल तक सत्ता में रहेंगे, और वे 15 साल तक सत्ता में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रहे. उनका जीवन एक स्वप्निल सफ़र की तरह रहा है, जिसमे उन्होंने बहुत कुछ पाया, कई सफलताएँ और कुछ असफलताएं भी उनके हिस्से आयीं. हम इस सीरीज में उनके बारे में, उनके व्यक्तित्व के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे.

आज इस सीरीज के दुसरे आर्टिकल में लालू के सेकुलरिज्म के चैंपियन बन कर उभरने की कहानी:

1989 से 1991 का दो वर्ष का समय लालू के राजनीतिक जीवन में व्यापक परिवर्तन लेकर आया. पहले, वे 1989 में कर्पूरी ठाकुर के देहांत के बाद विपक्ष के नेता बने, हालाँकि उस समय वे रेस में नहीं थे. 1990 में वे दिग्गज नेता राम सुन्दर दास को पछाड़ कर बिहार के मुख्यमंत्री बने, इसमें शरद यादव की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी. तीसरे, वी पी सिंह ने अगस्त 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशों को अपना अनुमोदन दे दिए, चौथे उन्होंने अक्टूबर 1990 में आडवाणी का रथ रोका और 1991 के लोक सभा इलेक्शन में 54 में से 48 सीट जीतकर अपनी स्थिति मज़बूत कर ली. अब लालू को चैलेंज करने वाला कोई नहीं था.

केंद्र में वी पी सिंह की सरकार भाजपा के सहारे चल रही थी, जिसने प्रधान मंत्री वी पी सिंह को पहले ही सचेत कर दिया था कि अगर आडवाणी के रथ को रोकने की कोशिश की गयी तो सरकार से समर्थन ले लिया जाएगा. केंद्र में सरकार बचाने के लिए तमाम प्रयास किये जा रहे थे. उस समय उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने आडवाणी को अयोध्या आने की चुनौती दी. अडवानी का रथ सोमनाथ से अयोध्या जा रहा था. इधर बिहार में लालू अडवानी को किसी भी कीमत पर रोकना चाहते थे. प्रदेश में मुस्लिम वोटर कांग्रेस से भागलपुर दंगे के बाद नाराज चल रहे थे, 1989 के इस दंगे में 1000 लोग से अधिक मारे गए थे.

इधर जैसे ही आडवाणी के  रथ ने उस समय के अविभाजित बिहार में प्रवेश किया, लालू आडवाणी को धनबाद में गिरफ्तार करना चाहते थे, पर धार्मिक और राजनीतिक उलझने थीं. धनबाद के डिप्टी कमिश्नर अफज़ल अमानुल्लाह, जो फायरब्रांड मुस्लिम नेता सय्यद शहाबुद्दीन के दामाद थे और एक मुस्लिम ऑफिसर के हाथों आडवाणी की गिरफ्तारी सांप्रदायिक आग को हवा दे सकती थी. इसके अलावा धनबाद में बीजेपी का अच्छा ख़ासा प्रभाव था. ऐसे में अफज़ल अमानुल्लाह ने मुख्यमंत्री को आडवाणी की गिरफ्तारी को आगे के लिए टालने की सलाह दी.

आडवाणी का रथ गया होते हुए पटना के गांधी मैदान में पहुंचा, जहाँ आडवाणी का जबरदस्त स्वागत किया गया. लालू अभी भी अनिश्चय की स्थिति में थे, गया में वे आडवाणी को गिरफ्तार करना चाहते थे, पर गया में भाजपा का अच्छा खासा प्रभाव था. पटना में भी व्यवसायियों की बड़ी संख्या के चलते फैसला नहीं हो पा रहा था. इस बीच लालू सीनियर लीडर देवी लाल, शरद यादव, बिहार में मुस्लिम नेताओं, जाबिर हुसैन, गुलाम सरवर से चर्चा में लगे हुए थे. अंतिम फैसला दिल्ली में वी पी सिंह से चर्चा करने के बाद लिया गया. वी पी सिंह सरकार गिरने के रिस्क के लिए तैयार थे.

लालू ने आडवाणी के पटना से गंगा पार करने का इन्तजार किया. अब पहली बार लालू ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को आडवाणी की रथ यात्रा का विरोध करने का आदेश जारी कर दिया. पटकथा तैयार की जा रही थी. दुमका के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को मसानजोर में गेस्ट हाउस तैयार रखने का आदेश दे दिया गया. पर दुमका के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को इसकी भनक नहीं लगने दी गयी कि किसे वहां रखा जाना है. दक्षिण बिहार से आडवाणी का रथ गाँधी सेतु होते हुए उत्तर बिहार की ओर बढ़ रहा था. राजद कार्यकर्ता पुल पर आडवाणी के रथ के आगे लेट गए. CRPF के जवान लाठी चार्ज के लिए आगे बढे. इसी लाठी चार्ज में वैशाली की डीएम को भी लाठी लग गयी.

आडवाणी हाजीपुर होते हुए समस्तीपुर की ओर बढे. आडवाणी के साथ प्रमोद महाजन भी थे. देर रात आडवाणी समस्तीपुर सर्किट हाउस पहुंचे. आडवाणी को वी पी सिंह के साथ भाजपा की असफल हो गयी बातचीत के बारे में जानकारी मिल चुकी थी.

मुख्यमंत्री लालू यादव पूरी प्लानिंग के साथ अपनी रणनीति पर काम कर रहे थे. किसी तरह का प्रेस स्टेटमेंट जारी नहीं किया गया. उन्होंने 22 अक्टूबर की शाम  कोआपरेटिव रजिस्ट्रार आर के सिंह और सीनियर आईपीएस ऑफिसर रामेश्वर ओरांव को आडवाणी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया. दरभंगा रेंज के आईजी आर आर प्रसाद को उसी रात समस्तीपुर पहुँचने कहा गया. समस्तीपुर जिला प्रशासन को सुरक्षा सम्बन्धी तमाम व्यवस्था पर ध्यान देने को कहा गया. शाम 6 बजे आर के सिंह और रामेश्वर ओरांव सर्किट हाउस पहुंचे और आडवाणी को जगाया.

अडवाणी ने खुद दरवाजा खोला. मुझे इसका इन्तजार था, अडवानी ने कहा. कहाँ ले जायेंगे मुझे? दोनों अधिकारियों ने इस पर कुछ नहीं कहा. आडवाणी ने साथ चलने से पहले कुछ समय की मोहलत मांगी. उन्होंने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी कि भाजपा नेशनल फ्रंट सरकार से समर्थन वापस ले रही है और चिट्ठी को पार्टी सेक्रेटरी कैलाशपति मिश्र को सौंप दिया. फिर एक हेलीकाप्टर आडवाणी को लेकर दुमका की ओर उड़ चला. वहां से बिहार- पश्चिम बंगाल बॉर्डर पर स्थित मसानजोर के गेस्ट हाउस में अडवाणी को गाड़ी से ले जाया गया.

राज्य सरकार ने आडवाणी की गिरफ़्तारी के बाद समस्तीपुर, वैशाली, पटना और कुछ अन्य जिलों में भाजपा कार्यकर्ताओं के हंगामे से सख्ती से निपटी.

बिहार की जनता में स्पष्ट सन्देश जा चुका था. मुस्लिम वोटर को अपना मसीहा मिल गया था. माय समीकरण ( मुस्लिम और यादव) जम चूका था और अगले 15 सालों तक लालू को बिहार की गद्दी से कोई नहीं हिला सकता था. लालू और फिर राबड़ी देवी के शासनकाल में प्रशासन को स्पष्ट निर्देश था कि सांप्रदायिक दंगे भड़कने न दिए जाए.

लालू की एक खासियत रही कि वे सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एकनिष्ठता से खड़े रहे. और बिहार की राजनीती में सेकुलरिज्म के चैंपियन रहे. उनका वोट बैंक सॉलिड रहा. यहाँ तक कि 2010 के विधान सभा चुनाव में ( राजद का सबसे ख़राब परफॉरमेंस) भी 18.84 प्रतिशत वोट मिले.

सांप्रदायिक दंगों से लालू कैसे निपटे? इस पर अगले आलेख में चर्चा होगी.

क्लिक करें और पढ़ें सीरीज का पहला भाग-

कर्पूरी जननायक कहलाते थे, तो लालू जननेता हैं


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.