रेलवे मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के हितों का ख्याल रखे: रणबीर नंदन

जदयू विधान पार्षद प्रोफ़ेसर रणबीर नंदन अपने सामजिक सरोकारों के लिए जाने जाते हैं. इस बार उन्होंने रेलयात्रियों के लिए बेहतर सेवा सुनिश्चित करने के लिए विचार मंथन किया है. उनकी स्पष्ट राय है कि रेलवे सिर्फ प्रॉफिट मेकिंग एंटरप्राइज बनकर न रह जाए. पढ़िए उनका आलेख marginalised.in पर  

 रेलवे का नया फरमान बेटिकट यात्रियों को लेकर है, जिसमें 1000 रुपए का जुर्माना वसूलने की योजना है. अब ये तो सामाजिक समस्या है और यात्रियों के  प्रति ऐसी आर्थिक दंडनीति लागू करने से पहले पंचायत स्तर तक जागरूकता अभियान चलाना होगा. यह भी समझना होगा कि अमूमन बेटिकट यात्री गरीब ही होते हैं.

एक तो रेलवे ने टिकट बुकिंग की बहुत कमजोर व्यवस्था कर रखी है, आप स्टेशन जाईये, तो आप पायेंगे कि ट्रेन आने वाली है, अनाउंसमेंट हो रहा है, और दूसरी तरफ टिकट काउंटर पर एक मील लम्बी लाइन लगी है, यात्रियों में अफरा तफरी मच जाती है, अब ऐसे में यात्री अपना सामान, गठरी लेकर ट्रेन पकड़ने भागे कि टिकट की चिंता करे. तो एक बात तो ये हुई, जिस पर रेलवे को बहुत गंभीरता से सोचना होगा. तो हम देख सकते हैं कि एक तो भारतीय रेल के अधिकाँश पैसेंजर के पास जीने के साधन जुटाना मुश्किल है उस पर से रेल की कुव्यवस्था के चलते बेटिकट पकड़े जाने पर 1000 रुपए का फाइन लगाना बिलकुल करेले पर नीम चढा जैसा होना ही तो है. सामाजिक तौर पर भी ये अन्यायपूर्ण  होगा. एक तो रेलवे को फाइन थोपने से अच्छा चलती ट्रेन में टिकट बनाने की व्यवस्था करनी चाहिए, और ऐसे फाइन थोप देने से पहले रेल मंत्रालय को जागरूकता पर विशेष ध्यान देना होगा. पुरे तंत्र को सोचना होगा कि आखिर इस समस्या का क्या इलाज है? कमी कहाँ है? क्या मजबूरी का फायदा उठाना ही रेलवे की पहचान बन रही है?

रेलवे की भूमिका सिर्फ प्रॉफिट मेकिंग एंटरप्राइज की न हो:

 

रेलवे जैसे सार्वजनिक क्षेत्र में प्रॉफिट- लॉस की बैलेंस शीट लागू करना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. दुर्भाग्य से रेल मंत्रालय इन दिनों ऐसी ही बैलेंस शीट लेकर योजनाएं बना रहा है. टिकट मिलने में तमाम मुश्किलें हैं, एकदम मारामारी, उस पर से अगर जल्दबाजी में यात्रा की प्लानिंग करनी पड़े, तो तत्काल कोटा में टिकट लेना पड़ता है और इससे भी अधिक उगाही के लिए प्रीमियम तत्काल कोटा शुरू हो गया है. मतलब ये कि टिकट तो मिल जाएगी लेकिन अपनी सीट पर बैठकर जाने के लिए मोटी रकम खर्च करनी होगी. कई योजनाओं से बैलेंस शीट में रेलवे का मुनाफा तो बढ़ सकता है लेकिन दुखद पहलू है कि यात्रियों के सुविधाओं पर इस बैलेंस शीट में खास तवज्जो नहीं दिखती. अगर रेल में चलने वाले यात्रियों का सामाजिक वर्गीय विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि आबादी का 30 प्रतिशत मध्यम वर्ग है, 50 फीसदी से अधिक निम्न मध्यम वर्ग है, और बमुश्किल 20 प्रतिशत अभिजात्य वर्ग के लोग ट्रेन में सफ़र कर रहे हैं. उस पर से अभिजात्य वर्ग दिन प्रतिदिन रेल यात्रा से प्लेन यात्रा की ओर शिफ्ट हो रहा है. तो मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग की इस पूरी आबादी के लिए ट्रेन ही सफर का माध्यम है. लेकिन रेलवे सारे प्रयोग इसी आबादी को दबा कर अपनी तिजोरी भरने का प्रयास करने में लगी है, जो अन्याय है. फ्लाइट तो इस वर्ग के लोगों से दूर है ही राजधानी जैसी ट्रेनें भी डायनामिक प्राइसिंग सिस्टम के चलते पहुंच से बाहर हो गयी है. उदाहरण के लिए देखिये, AC 3 टायर का जो किराया 1700 के आसपास होना चाहिए, राजधानी उस पर डायनामिक प्राइसिंग सिस्टम के तहत 500 रूपये एक्स्ट्रा चार्ज करने लगी है, नतीजा 1700 का टिकट 2200 में मिल रहा है, और सुविधा में कोई परिवर्तन नहीं. कई बार हम देखते हैं कि पटना दिल्ली राजधानी अपने schedule से 8-8 घंटे देरी से चल रही है. और राजधानी, शताब्दी, दुरंतो की पूरी सीरीज जोड़ लें, तो फिर प्रीमियम ट्रेनों की संख्या काफी ज्यादा बढ़ जाती है. इसके अलावा यात्रियों से सुपर फ़ास्ट ट्रेन का सरचार्ज लिया जाता है. क्योंकि भारतीय रेल ने ये नियम बनाया है कि अगर ट्रेन की औसत स्पीड 55 किमी/घंटे से ज्यादा है, तो फिर यात्रियों पर सुपर फ़ास्ट सरचार्ज लगेगा. पर अगर रेलवे की रिपोर्ट्स को पढ़ा जाए, तो हम पाते हैं कि लगभग 30 फीसदी ट्रेनें समय से नहीं चल रही हैं. गरीब रथ जैसे ट्रेने तो एक एक दिन पीछे चल रही हैं. जबकि अभी न तो प्रतिकूल मौसम है, न रेल दुर्घटना की पटरी पर आवाजाही बाधित हो. ऐसे में काम के करोड़ों घंटे बर्बाद होते हैं, यह चिंताजनक है, इसकी कैसे भरपाई होगी? रेलवे कब अपनी जिम्मेवारी समझेगा?

रेलवे को अपनी जिम्मेवारियों को समझना होगा और सिर्फ प्रॉफिट मेकिंग एंटरप्राइज की भूमिका तक खुद को  सीमित नहीं रखना होगा.


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