राजद: लालू- राबड़ी से तेजस्वी तक

राजद के 22वे स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर एक नज़र राजद की अब तक की यात्रा पर

भारतीय राजनीति के इतिहास में राष्ट्रीय जनता दल या राजद की स्थापना 1997 में लालू प्रसाद यादव ने की थी, उस लिहाज से देखा जाये तो इस पार्टी का गठन हुए अभी मात्र 21 साल हुए हैं और 22वें साल में पार्टी कदम रखने जा रही है. लेकिन पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति और लोगों के बीच जैसी पैठ बनायी है वह उल्लेखनीय है. कल पार्टी का स्थापना दिवस समारोह पटना में आयोजित किया जा रहा है, जिसकी तैयारी जोर-शोर से चल रही है.

क्या है राजद का इतिहास

5 जुलाई 1997 को लालू यादव, रघुवंश प्रसाद सिंह, कांति सिंह और लोकसभा के 17 और राज्यसभा के 8 सांसद दिल्ली में जुटे और एक नयी पार्टी का गठन किया जिसे आज राजद या राष्ट्रीय जनता दल  के रूप में जाना जाता है. उस वक्त यह जनता दल के एक धड़े के रूप में सामने आया था. लालू प्रसाद यादव पार्टी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे. चूंकि पार्टी का गठन ही इसलिए हुआ था कि लालू यादव ने १९९५ का बिहार विधान सभा चुनाव अपने बलबूते जीता था और नीतीश कुमार की समता पार्टी  और भाजपा के गठबंधन की चुनौती  को सिर्फ अपने बलबूते ध्वस्त किया था, लेकिन चारा घोटाला के आरोप के बाद उन पर मुख्यमंत्री पद छोड़ने का दबाब लगातार बनाया जा रहा था, तो ऐसे में  उन्होंने अपना शक्ति प्रदर्शन करके के लिए अलग पार्टी बनायी, इसलिए इस पार्टी पर पूरी तरह लालू यादव की झलक देखने को मिलती है. हालाँकि  चारा घोटाला मामले में chargesheet दाखिल हो जाने के बाद और सीबीआई कोर्ट में मुकदमा शुरू हो जाने के बाद लालू यादव को सीएम की कुर्सी छोड़ी पड़ी लेकिन वे पार्टी प्रमुख बन रहे.

चारा घोटाला का पार्टी पर प्रभाव दिखा

पार्टी गठन के अगले ही साल यानी 1998 में लोकसभा चुनाव हुआ, उस वक्त पार्टी ने 17लोकसभा की सीट जीती लेकिन बिहार से बाहर पार्टी का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा. इसलिए 1999 में के लोकसभा चुनाव में राजद ने कांग्रेस के साथ गंठबंधन किया लेकिन पार्टी कुछ खास नहीं कर पायी और अपनी 10 लोकसभा सीट को गंवा दिया, जिसमें लालू प्रसाद यादव की सीट भी थी. इसे राजद की इमेज पर चारा घोटाला का प्रभाव माना जा रहा था.

बिहार से निकल कर राज्यसभा पहुंचे लालू

1998 के लोकसभा चुनाव में लालू यादव मधेपुरा से चुनाव जीते थे, लेकिन 1999 के चुनाव में वे चुनाव हार गये. लेकिन राजद के लिए सुखद यह रहा कि 2000 में बिहार की सत्ता फिर उसके हाथों में आ गयी. उस वक्त नीतीश कुमार मात्र सात दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे, फिर राबड़ी ने ही सत्ता संभाली. इधर लालू यादव वर्ष 2002 में राज्यसभा पहुंच गये और राजद का आभा मंडल  भी बढ़ गया. 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू कांग्रेस के साथ हो लिये और छपरा और मधेपुरा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की, यूपीए में उस वक्त राजद की हैसियत बहुत बड़ी थी परिणाम स्वरूप लालू यादव रेलवे मिनिस्टर हो गये, हालांकि राज्य में राजद के हाथों से सत्ता फिसल गयी थी और बिहार में नीतीश युग की शुरुआत हो चुकी थी.

2009 में राजद की स्थिति बिगड़ी

2009 में राजद की स्थिति राज्य और केंद्र दोनों की जगह खराब हुई और सत्ता का सुख उससे छिन गया, बावजूद इसके लालू यादव कांग्रेस के साथ जुड़े रहे और उनका एमवाई समीकरण भी काफी हद तक उनके साथ ही रहा. इस एमवाई समीकरण में मुसलमान और यादव शामिल थे. नतीजा २०१० के विधान सभा चुनाव में अपने सबसे ख़राब परफॉरमेंस के दौर में भी राजद को 18% से कुछ अधिक वोट मिले. ये दिखाता है कि राजद के दुर्दिन में भी पार्टी का वोट बैंक एक जुट रहा.

2015 में बिहार में फिर साथ आये नीतीश और लालू

2015 के विधानसभा चुनाव में राजद, जदयू और कांग्रेस ने महागठबंधन बनाया और भाजपा को पटखनी दी. राजद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और प्रदेश में 81 सीट पर जीत हासिल की. चूंकि लालू यादव को चारा घोटाला मामले में सजा हो चुकी थी, इसलिए सीएम तो नीतीश कुमार ही हुए लेकिन तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया गया. पार्टी में एक नए सितारे का उदय हुआ. तेजस्वी के साथ साथ लालू के दुसरे पुत्र तेजप्रताप भी मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री की हैसियत से आये.  दुर्भाग्य से  महागठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चला और नीतीश फिर भाजपा के साथ आ गये.

बिहार के 30 प्रतिशत वोटर्स राजद के साथ

पिछले दस सालों में बिहार की जनता ने छह चुनाव के लिए वोट किया, जिसमें 2004 का लोकसभा चुनाव, 2005 का विधानसभा, 2009 का लोकसभा, 2010 विधानसभा,2014 लोकसभा और 2015 का विधानसभा चुनाव शामिल है, जिनमें 30 प्रतिशत वोटर्स राजद के साथ रहे, जबकि भाजपा के साथ 37 और जदयू के साथ 17 प्रतिशत थे.  सीएसडीएस के अनुसार 2005 के चुनाव में बिहार में यादवों का 83 प्रतिशत वोट राजद को मिला जबकि मुसलमानों का 58 प्रतिशत. यादव बिहार की जनसंख्या का 15 प्रतिशत हैं. वहीं 2010 में यादवों का 69 प्रतिशत वोट राजद के हिस्से आया जबकि मुसलमानों का 32 प्रतिशत.

तमाम आरोपों के बावजूद बिहार की राजनीति में राजद अहम

कहना ना होगा कि तमाम आरोपों के बावजूद भी बिहार की राजनीति में राजद अहम है और एक शक्तिशाली पार्टी है. राजद एक ऐसी पार्टी है जिसका जन्म बिहार से हुआ, लेकिन इसकी दखल राष्ट्रीय राजनीति में है.  राजद का वोट बैंक खिसकता नहीं है और इसकी वोटर्स पर अनूठी पकड़ है. लालू ने पिछड़े तबके के लोगों में स्वाभिमान जगाया और उनके नेता बने, आज भी वे कई लोगों के मसीहा हैं. वोट बैंक पर उनकी पकड़ की कॉपी यूपी जैसे राज्यों में कई पार्टियों ने करना चाहा, लेकिन उनके पास लालू यादव का देशज अंदाज नहीं था, जो उन्हें एक अलग पहचान देता है.


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.