मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति/ जनजाति उद्यमी योजना का वेब पोर्टल सिर्फ 15 दिनों के लिए क्यों खुला?

Balendushekhar Mangalmurty is Editor-in-chief of news web portal, marginalised.in

बहुत उत्साह के साथ बिहार में मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति/जनजाति उद्यमी योजना की शुरुआत जून के अंतिम सप्ताह में की गयी. इसका उद्देश्य ये था कि बिहार में समाज के सबसे कमजोर तबके दलितों और आदिवासियों के बीच उद्यमिता का विकास किया जाय. जो युवक/युवती स्वरोजगार करना चाहते हैं, वे उद्योग विभाग के पोर्टल पर अपना प्रपोजल सबमिट करें, फिर डिपार्टमेंट उन प्रोपोसल्स को स्क्रूटिनी करेगा और अगर डिपार्टमेंट के आला अधिकारी प्रपोजल से संतुष्ट हुए, तो फिर एक छोटी अवधि की ट्रेनिंग, जो ट्रेनिंग कम और काउंसलिंग ज्यादा होती, के बाद इन उद्यमियों को स्टार्ट अप के तहत लोन उपलब्ध करवाया जाता, जिससे वे अपने बिज़नस को शुरू करते, और फिर आसान शर्तों पर किश्तों में लोन चुकाते.

योजना अच्छी थी, पर पता नहीं किस नौकरशाह के सड़े दिमाग में ये आईडिया आ गया और जाने कैसे कि पोर्टल को सिर्फ 15 दिनों तक खुला रखना है, फिर उसे 7 जुलाई को बंद कर देना है. पोर्टल सिर्फ ऑफिस टाइम में खुला रहता था, और फिर 6 बजे बंद हो जाता था, ये अजीब सी बात है, आज के इन्टरनेट के दौर में कि आप ऑफिस टाइम में ही अप्लाई करें. फिर ऑनलाइन अप्लाई करने का क्या तुक है?

और ये टाइम लिमिट से क्या हासिल होने वाला है? क्या इस पंद्रह दिनों में डिपार्टमेंट और बिहार सरकार ने बिहार में दलित उद्यमिता को प्रमोट कर दिया? क्या डिपार्टमेंट ने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया? क्या बेहतर ये नहीं होता कि रोलिंग पैटर्न पर पोर्टल खुला रहता? क्या ये कोई बैच था प्रशासनिक पदाधिकारियों का कि उन्हें ट्रेनिंग देना है? उद्यमिता क्या सरकार एकाएक विकसित करने का दावा कर सकती है? युवा लोन लेकर तमाम खतरे मोल कर अपने उद्योग धंधे शुरू करने में तमाम जोखिम लेने वाले थे, सरकार उनके लिए सिर्फ लोन उपलब्ध करवा रही थी, बाकी रिस्क को इन युवा या नए उद्यमियों का होना था. सरकार उनके प्रोडक्ट के लिए मार्किट उपलब्ध करवाने के बारे में सोच नहीं रही थी, तो फिर ऐसे में सिर्फ पंद्रह दिनों के लिए पोर्टल को खोलना एक भद्दा मजाक नहीं तो और क्या है?

इन पंद्रह दिनों में भी इस पोर्टल ने ढंग से काम नहीं किया. आज दिन भर पोर्टल डिस्टर्ब रहा. कई युवा उद्यमियों ने marginalised.in से बात करके अपनी निराशा व्यक्त की कि वे दिन भर अपने प्रोपोजल को अपलोड करने में लगे रहे, और बार बार साईट डाउन दिखा रहा था. ऐसे में वे दिन भर लगे रहने के बाद भी अपने प्रपोजल को सबमिट नहीं कर सके.

कईयों ने बताया कि वेब पोर्टल को प्रचारित करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हुए, जिसके चलते कईयों को काफी दिन के बाद इस योजना के बारे में पता चला. कईयों ने बताया कि जब पता चला तो वे अपने प्रोडक्ट के लिए मार्किट सर्वे करने में जुट गए, और उन्हें इस बात का तनिक भी अंदेशा नहीं था कि सरकार की इतनी महत्वपूर्ण योजना महज़ पंद्रह दिनों के लिए लागू रहेगी. इससे अच्छा तो वे नहीं करते.

तमाम बातें उन युवा दलित उद्यमियों की निराशा की ओर इशारा कर रही थीं. ऐसे में बेहतर होगा कि माननीय उद्योग मंत्री टाइम लिमिट को हटाएं और ये सुनिश्चित करें कि उद्यमिता का विकास एक वन टाइम ऑफर की तरह न होकर सतत प्रक्रिया हो, ताकि सही अर्थों में बिहार जैसे राज्य में, ( जहाँ स्थापित, बड़े उद्योगपति भी निवेश करने में हिचकते हैं), वहाँ के युवा उद्यमी पुरे उत्साह के साथ अपने प्रयासों से बिहार के विकास में योगदान दें. साथ ही इस विभाग के विद्वान् अधिकारियों को भी समझना होगा कि उद्यमिता सिर्फ उत्साह से नहीं टिकती है, इसके लिए पर्याप्त योजना भी बेहद जरुरी है.


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