बिहार : खगड़िया के रिटायर्ड जज ने इकलौती बेटी को किया पहले नजरबंद फिर संपत्ति से बेदखल

खगड़िया : पहले नजरबंद और फिर बेदखल, जी हां कुछ ऐसा ही हुआ है बिहार के खगड़िया जिले से हाल में सेवानिवृत्त हुए जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुभाष चंद्र चौरसिया की इकलौती बेटी के साथ. उसके पिता ने उसे अपनी सभी चल और अचल संपत्ति से बेदखल कर दिया है. उसका दोष मात्र इतना है कि वह अपने माता-पिता की इच्छा के विपरीत शादी करना चाहती है.

रिटायर्ड जज सुभाष चंद्र चौरसिया ने कल मीडिया को एक पत्र भेजकर सूचित किया कि आप लोगों को मैं एक पिता के रूप में सूचित करना चाहता हूं कि विगत दिनों मेरी पुत्री यशस्विनी ने जो कुछ भी किया उससे मेरी सामाजिक प्रतिष्ठा काफी धूमिल हुई है. अपने पिता को बदनाम करने में मेरी पुत्री ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.

उत्तर प्रदेश के बांदा जिला के कोतवाली थाना क्षेत्र निवासी चौरसिया ने आगे लिखा है, मैंने हमेशा अपनी एकमात्र संतान (पुत्री) के बेहतर जीवन शिक्षा और भविष्य की चिंता की है, लेकिन मेरी पुत्री सिद्धार्थ बंसल के बहकावे में आकर तथा ब्लैकमेलिंग का शिकार होकर अभी अपने हित की बात सुनने और समझने के लिये तैयार नहीं है और वह मेरे तथा मेरे परिवार की प्रतिष्ठा को समाप्त करने पर तुली हुई है.

इसलिए मैंने अपनी पुत्री यशस्विनी को अपनी सभी चल और अचल संपत्ति से बेदखल करने का निर्णय लिया है. उल्लेखनीय है कि गत 26 जून को पटना उच्च न्यायालय ने खगड़िया जिला के तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा अपनी पुत्री को कथित तौर पर नजरबंद करने के मामले में आदेश दिया था कि 25 वर्षीय उक्त युवती को अगले 15 दिनों के लिए गेस्ट हाउस में रखे जाने के साथ पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध करायी जाये. पटना उच्च न्यायालय के समाचार ऐप ‘बार एंड बेंच’ पर अपलोड किये गये एक समाचार पर स्वत: संज्ञान लिए जाने के बाद मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन और न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद की एक खंडपीठ ने गत 25 जून को उक्त युवती को अदालत में पेश किये जाने का निर्देश दिया था.

युवती ने गत 26 जून को खंडपीठ के समक्ष बताया था कि वह अपने माता-पिता के साथ सहज नहीं है और अलग रहना चाहती है. अदालत में युवती के माता-पिता भी उपस्थित थे और खंडपीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख आगामी 12 जुलाई निर्धारित की थी. युवती सुप्रीम कोर्ट के एक वकील से शादी करना चाहती है, जबकि उसके माता-पिता उसके इस फैसले से खुश नहीं थे.


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