बाढ़ आने की स्थिति में क्या करें और क्या न करें?

डिजास्टर मैनेजमेंट एक ऐसा विषय है, जिसके बारे में सारी जानकारी सरकारी पदाधिकारियों के पास ही है, Monopoly of information ! आम आदमी अभी भी इस विषय के बारे में लगभग कुछ नहीं जानता. हालांकि वो साल दर डिजास्टर की चपेट में आता है. प्राकृतिक आपदाओं के कारण प्रतिवर्ष हमारे देश में जान और माल की भारी क्षति होती है. यह सही है कि प्राकृतिक आपदाओं पर मनुष्य का बस नहीं, लेकिन उचित जानकारी के साथ इसके खतरे को कम किया जा सकता है. Marginalised.in डिजास्टर मैनेजमेंट पर 50 आर्टिकल्स का सीरीज लेकर आ रहा है, ताकि डिजास्टर मैनेजमेंट की पेचीदगियों को आम आदमी आम भाषा में समझ सके. प्रस्तुत है इस कड़ी का पांचवां आर्टिकल:

-नकुल तरुण-

आपदा की स्थिति में हमें पता होना चाहिए कि हमें क्या करना है और क्या नहीं करना है. मैं यहां आपसे बाड़मेर में आयी बाढ़ के बारे में बात करना चाहता हूं. 2006 के अगस्त महीने में बाड़मेर का सूखाग्रस्त जिला अचानक आयी बाढ़ से घिर गया, जिसमें मुख्य रूप से कवास और मालवा के गांवों में 104 लोगों की जान चली गयी. साथ ही बड़े पैमाने पर खरीफ की फसल तबाह हो गयी, जिसका मूल्य लगभग 1300 करोड़ रूपये आंका गया. इतना ही नहीं, बाढ़ की विभीषिका ऐसी थी कि लगभग 75,194 पशु भी इसकी भेंट चढ़ गए. यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि बाड़मेर में न कोई ब्रह्मपुत्र था, न कोसी, गंगा या कोई अन्य बड़ी नदी.

बाड़मेर एक ऐसी जगह थी जहां पीने का पानी भी एक बड़ी समस्या थी, स्वाभाविक है ऐसे में वहां के लोगों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यहां इस तरह की बाढ़ आ सकती है. बाड़मेर मरुभूमि क्षेत्र में बसा हुआ है और पूरे साल यहां वर्षा नहीं के बराबर होती है. बाड़मेर का औसत तापमान 27.1 डिग्री सेंटीग्रेड है, जो गर्मी के दिनों में तापमान 48 डिग्री के करीब पहुंच जाता है. यहां औसत वार्षिक वर्षा 295 मिमी है. 2006 में लेकिन सब कुछ बदल गया, जब महज़ सात दिनों में 723 मिलीमीटर पानी बरस गया और इस बेहद कम समय में इतनी बारिश ने बाड़मेर में अचानक बाढ़ जिसे ‘फ्लैश फ्लड’ भी कहते हैं कि स्थिति पैदा कर दी. जब पानी बाड़मेर के निचले इलाकों में घुसा, तो गांव वाले अपने घरों की ओर भागे और खुद को बाढ़ से बचाने के लिए अंदर से बंद कर लिया. वो खुद को इसी तरह जंगली जानवरों से सुरक्षित करने के आदी थे. ग्रामीणों के घर निचले इलाकों में बने थे, ताकि रेगिस्तान में उठने वाली धूल भरी आंधी से बचाव हो सके.

अधिकांश लोगों ने अपने जीवन में कभी बाढ़ नहीं देखा था, तो ऐसे में ग्रामीणों के पास इस बात की जानकारी नहीं थी कि बाढ़ की आपदा से खुद का बचाव कैसे करें? इसका नतीजा यह हुआ कि जान माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा. यहां ये जिक्र करना जरुरी है कि जान माल की क्षति का सबसे बड़ा कारण अचानक आयी बाढ़ नहीं थी, बल्कि अचानक आयी बाढ़ से कैसे निपटे, इस बात की जानकारी का अभाव इस हिलाकर रख देने वाली क्षति के पीछे था. तो ऐसे में मेरी राय ये है कि आम जन को इस बात की जानकारी होना चाहिए कि बाढ़ आने की स्थिति में क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?

 

 

क्या करें?
• आप और आपके परिवार को नजदीक के पक्के मकान, ऊंचे स्थानों या किसी सुरक्षित स्थान तक पहुंचने के मार्ग की जानकारी होनी चाहिए.
• जैसे ही पानी निचले इलाकों में प्रवेश करना शुरू करे, तत्काल प्रभाव से निचले इलाकों को खाली कर दें और सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर जाएं.
• इस बात को सुनिश्चित कर लें कि अपनी जगह को खाली करते समय हर आदमी के पास लालटेन, टाॅर्च, कुछ खाने की सामग्री, पीने का पानी, सूखे कपडे और जरुरी दस्तावेज हों.
• ये सुनिश्चित करें कि परिवार के हर सदस्य के पास अपना पहचान पत्र जरुर हो.
• अपनी बेशकीमती चीजें ( जिन्हें आप साथ ले जाने में असमर्थ हों, घर में किसी ऊंचे स्थान पर रख दें, ताकि पानी से यथासंभव उनका बचाव हो सके.
• बिजली की आपूर्ति को रोक दें और नंगे तारों को न छुएं.
• अफवाहों पर ध्यान न दें. और न अफवाहों को फैलाएं. यथासंभव शांति बनाए रखें.
• बाढ़ के पानी के संपर्क में आने से जितना संभव हो सके, बचें क्योंकि बाढ़ के पानी में मानव मल, तेल, केमिकल या अन्य हानिकारक पदार्थों का समावेश हो सकता है.
• अगर आपको बाढ़ के पानी में चलना है, तो फिर लकड़ी या पोल का इस्तेमाल करें और सुनिश्चित करें कि आप गहरे पानी या खुले मैनहोल या गड्ढे में नहीं उतर जाएं.
• बिजली के खंबों और तारों से दूर रहें क्योंकि पानी में बिजली का करंट दूर दूर तक फ़ैल जाता है. अगर कहीं बिजली का खंबा गिरा हुआ देखें या बिजली का तार टूटा देखें तो बिजली कंपनी को तुरंत सूचना दें.
• बाढ़ आने के बाद अगर आप बाहर निकल रहे हैं, तो सावधानी बरतें क्योंकि जमीन पर कांच के टूटे बोतल, नुकीली धारदार चीजें, जंग लगी कांटी आदि हो सकते हैं. जमीन काई से भरी हो सकती है और नतीजतन फिसलन भरी हो सकती है. ऐसे में सावधानी बेहद जरुरी है.
• अद्यतन जानकारी ( अपडेट) के लिए रेडियो या टेलीविज़न से संपर्क में रहें. बाढ़ के दौरान टेलीविज़न के संपर्क में रहना सम्भव नहीं हो पायेगा तो ऐसे में रेडियो भरोसेमंद रहेगा.
• अगर सीलिंग गीली है, तो तुरंत बिजली की सप्लाई काट दें.
• प्रभावित कमरे में बाल्टी, मोटे तौलिये और पोछे का इस्तेमाल करके यथासंभव पानी को हटायें

 

क्या न करें?
• तेज बहती धार के बीच न चलें. तेज बहती धार कम गहराई होने के बाद भी आपके पाँव उखाड़ सकती है.
• बाढ़ के तेज धार में तैरने की कोशिश न करें. तेज धार आपको बहाकर दूर ले जा सकती है.
• बाढ़ ग्रस्त इलाके में डूबी सड़क पर गाडी चलाने की कोशिश न करें. ये ध्यान में रहे कि केवल आधा मीटर गहरा बाढ़ का पानी आपकी गाडी को बहाकर ले जाने की क्षमता रखता है.
• बाढ़ के पानी के संपर्क में आ गए भोज्य पदार्थ को खाने से बचें.
• बाढ़ के पानी के उतर जाने के बाद भी पॉवर सप्लाई को बिना इंजीनियर को दिखलाए बगैर बहाल न करें. गैस लीक पर भी ध्यान रखें और सिगरेट पीने, लालटेन, माचिस, खुले में आग जलाने से बचें.
• अगर सीलिंग पानी से फूल गया हो, और झूल रहा हो, तो उससे दूर रहें.
• कभी भी गीली जमीन पर खड़े होकर टीवी, वीसीआर या कोई और बिजली के उपकरण को न चलायें.
• कभी भी वैक्यूम क्लीनर से ठहरे हुए पानी को हटाने की कोशिश न करें.
• कभी भी बेसमेंट में जमे बाढ़ के पानी को बहुत तेजी से निकालने की कोशिश न करें. अगर पानी का दवाब बहुत तेजी से घटता है, तो ये चारों ओर की दीवार पर बहुत ज्यादा और खतरनाक स्ट्रेस डाल सकता है.
बाढ़ अपने आप में आपदा नहीं है, बाढ़ आपदा तब बन जाती है जब आदमी के पास जानकारी नहीं होती कि इस परिस्थिति से कैसे निपटें, जैसा कि बाड़मेर के उदाहरण से आप समझ सकते हैं.
तो ऐसे में जानकारी ही बचाव है. जानकारी रखें और जान माल की अपूरणीय क्षति से बचें.
चर्चा जारी रहेगी…

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