महान समाजवादी नेता बसावन सिंह जिन्होंने साढ़े 18 साल जेल में काटे

आजादी के बाद से कांग्रेस दलित, मुसलमान और उच्च जातियों के वोट बैंक के सहारे लम्बे समय तक सत्ता में रही, पर इस समीकरण में ओबीसी जातियों की भूमिका नगण्य थी. वे समाज का एक बड़ा हिस्सा थे, पर उनकी भागेदारी नगण्य थी. ऐसे में लोहिया ने सौ में साठ का नारा लगाते हुए उस समय की चली आ रही राजनीतिक व्यवस्था पर चोट की. समाजवादी राजनीति ने पिछड़ी जातियों को न केवल प्रतिनिधित्व दिया बल्कि नेतृत्व भी दिया. यह लोहिया के विजनरी परिकल्पना का परिणाम था कि राजनीति में अधिक से अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व हुआ और सही अर्थों में राजनीति प्रगतिशील हुई.  

आज समाजवादी राजनीति के एक चमकते सितारे बसावन सिंह की चर्चा करेंगे, जो एक अनूठे शख्स थे, उन्होंने आज़ादी की लड़ाई के दौरान अपने जीवन के बहुमूल्य साढ़े अठारह साल जेल में बिताए.

सागरिका चौधरी जदयू नेत्री हैं और पटना यूनिवर्सिटी में सिंडिकेट मेम्बर हैं. 

 

बसावन सिंह का जन्म 23 मार्च 1909 को वैशाली मे हुआ था. उनकी औपचारिक शिक्शा दसवीं के बाद समाप्त हो गयी क्योंकि उन्होने 1920-21 के असहयोग आन्दोलन मे भाग लिया. उसके बाद मे वे क्रान्तिकारी आन्दोलन से जुड़ गए. 1925 मे योगेन्द्र शुक्ल के नेतृत्व वाली हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी से जुड़ गये. ब्रिटिश कालीन भारत में उन्होंने अपने जीवन के कुल साढ़े 18 साल जेल में बिताए.

बसावन सिंह का जन्म बिहार के हाजीपुर में 23 मार्च 1909 को एक गरीब किसान परिवार में हुआ था. वे अपने माता पिता की एकमात्र संतान थे. दुर्भाग्य से उन्होंने महज़ आठ साल की अवस्था में अपने पिता को खो दिया. दस साल की उम्र में वे घर से भाग कर हाजीपुर गए और महात्मा गाँधी को पहली बार देखा और उन्हें सुना. वे पढने में काफी तेज थे और उन्होंने प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूल में दोनों जगह स्कालरशिप पाया. दिघी हाई स्कूल, हाजीपुर में वे भोजन और रहने के लिए दुसरे बच्चो को ट्यूशन दिया करते थे. उनके अन्य खर्चों को पूरा करने के लिए उनकी माँ हर महीने दो रूपये की दर से एक बांस बेचा करती थी. 1926 में बसावन सिंह ने प्रथम श्रेणी में मेट्रिक की परीक्षा पास की और फिर जी बी बी कॉलेज में आगे की शिक्षा प्रारंभ की. स्कूली शिक्षा के अंतिम दो सालों में बसावन सिंह क्रांतिकारियों के संपर्क में आये, और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के योगेन्द्र शुक्ल उनके मेंटर बन गए.1925 में उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी ज्वाइन कर ली. इसके तुरंत बाद कॉलेज के प्रिंसिपल ने उन्हें जी बी बी कॉलेज से निष्काषित कर दिया. इसके चलते उनकी औपचारिक शिक्षा पर विराम लग गया. इसके बाद पटना के सदाकत आश्रम स्थित बिहार विद्यापीठ से जुड़ कर अध्ययन करने लगे. यहाँ पर उन्होंने सैन्य शिक्षा भी ली.

आजादी के आन्दोलन से जुड़ गए:

बसावन सिंह लाहौर षड्यंत्र केस के बाद 1929 में गायब हो गए. वे भुसवाल, काकोरी, तिरहुत और देलुहा षड्यंत्र केस में आरोपी थे. चंद्रशेखर आजाद और केशव चक्रवर्ती के साथ मिलकर उन्होंने क्रांतिकारी आन्दोलन को आगे बढ़ाया. पकडे जाने के बाद उन्हें सात सालों की कैद की सजा सुनाई गयी लेकिन तीन दिन के बाद ही जून 1930 में बांकीपुर जेल से निकल भागे. उन्हें फिर से गिरफ्तार किया गया और इस बार भागलपुर सेंट्रल जेल में कैद करके रखा गया.  भागलपुर जेल में कैदियों के साथ जेल प्रशासन के अमानवीय व्यवहार के खिलाफ आमरण अनशन शुरू किया. अनशन के 12वे दिन  उन्हें गया सेंट्रल जेल शिफ्ट कर दिया गया और उन्हें एकदम अकेले में रखा गया. जल्द उन्हें जेल के अस्पताल में डाल दिया गया. उन्हें जबरदस्ती भोजन देने के जेल प्रशासन के हर प्रयास असफल हो गए. अंत में उस समय बिहार के मंत्री, सर गणेश दत्त ने बसावन सिंह की माँ को बसावन सिंह को मनाने के लिए कहा. जब उनकी माँ दौलत खेर बसावन सिंह से जेल में मिलने आयीं, तो अंत में उन्होंने 58वे दिन अपना आमरण अनशन समाप्त किया.

आमरण अनशन के दिनों में लोग हर दिन बसावन सिंह के निधन की आशंका में जेल के बाहर इंतजार करते रहते थे. आखिरकार उन्होंने 58वे दिन आमरण अनशन ख़त्म किया जब गांधी जी ने उन्हें सूचित किया कि उनकी मांगे मान ली गयी हैं. ख़राब स्वास्थ्य के आधार पर उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया पर शहर से बाहर जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. उन्होंने प्रतिबंधों की परवाह नहीं की नतीजतन उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया.

अपने कारावास के दिनों में उन्होंने इतिहास, भूगोल, राजनीती शास्त्र, दर्शन, समाज शास्त्र, और प्राकृतिक विज्ञान का जमकर अध्ययन किया. उनकी यादाश्त बेहद तेज थी.

ट्रेड यूनियन मूवमेंट को संगठित करने में अपनी पूरी ऊर्जा लगाई:

बसावन सिंह 1936 से 1989 तक अपनी मौत तक ट्रेड यूनियन आन्दोलन में व्यस्त रहे. उन्होंने दिसंबर 1936 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और इसके लेबर सेक्रेट्री चुने गए. उन्होंने बिहार के कोयला खदानों में, चीनी मीलों में, अबरख के खदानों में, और रेलवे में ट्रेड यूनियन खडा किया. 1937 में उन्होंने जपला में जपला लेबर यूनियन की स्थापना की, 1937 में ही बौलिया लेबर यूनियन का भी गठन किया, शिवनाथ बनर्जी के साथ मिलकर जमालपुर वर्कशॉप के कामगारों को संगठित किया. उन्होंने गया कॉटन एंड जूट मिल लेबर यूनियन का गठन किया. सुभाष चन्द्र बोस के साथ मिलकर टाटा कोयला खदान लेबर एसोसिएशन की स्थापना की और जब 1941 में सुभाष चन्द्र बोस देश से बाहर निकल आये, तो इसके अध्यक्ष बने. दुख्बंधू मिश्र के साथ मिलकर उन्होंने ओडिशा में तालचेर के कोयला खदान के मजदूरों को जुटाया. इसके अलावा उन्होंने राजगांगपुर और गोमिया में मजदूर संगठन खडा किया और बाद में ये स्थानीय मजदूर संगठन हिंदुस्तान मजदूर संगठन के साथ जुट गए.

1936 से बसावन सिंह ने शिवनाथ बनर्जी के साथ मिलकर रेलवे कर्मचारियों का यूनियन बनाने के लिए काफी मेहनत किया. उन्होंने जपला, बौलिया, और डालमियानगर के कामगारों को, गया, जमशेदपुर और कांदा, झरिया, हज़ारीबाग, कुमार डूबी के कोयला खदानों के मजदूरों को, पटना सिटी और जमालपुर के कामगारों को, हरिनगर और मर्हवरा के चीनी मिलों के कामगारों को, ओडिशा में तालचेर और राजगांगपुर के कामगारों को, और सेंट्रल प्रोविंस में सतना के कामगारों को एक जुट किया और उनका यूनियन बनाया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ट्रेड यूनियन मूवमेंट ने और जोर पकड़ा. जब महंगाई बढती जा रही थी, अधिक से अधिक प्रॉफिट के लालच में मजदूरों की मजदूरी नहीं बढाई जा रही थी. बढती मुद्रा स्फीति और अनाज के कम उपलब्धता ने मजदूरों को उग्र बनने पर मजबूर कर दिया. ऐसे में  बसावन सिंह के अथक प्रयासों से ट्रेड यूनियन आन्दोलन और मज़बूत हुआ. उन्होंने विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों जैसे चीनी, कोयला, सीमेंट, अव्रख, बारूद, एल्युमीनियम, आयरन और स्टील, रेलवे, पोस्ट ऑफिस, बैंक आदि क्षेत्रों में कार्यरत मजदूरों को एक जुट किया और उन्हें संगठन का पाठ पढ़ाया. वे हिन्द मजदूर सभा के संस्थापक सदस्यों में एक थे और साथ ही इसके राज्य स्तर पर अध्यक्ष थे और साथ ही इसके राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों में एक महत्वपूर्ण सदस्य थे.

1936 से ही बसावन सिंह आल इंडिया रेलवे फेडरेशन में सक्रिय रूप से शामिल थे. वे अवध रेलवे यूनियन के अध्यक्ष थे और नार्थ ईस्ट रेलवे मजदूर यूनियन के आने वाले कई वर्षों तक अध्यक्ष रहे  और 1946 से आल इंडिया रेलवे मेन फेडरेशन के उपाध्यक्ष रहे, क्योंकि इसके कार्यकारी अध्यक्ष सुभाष चन्द्र बोस थे और उस समय तक वे भारत से निकल चुके थे.

डालमियानगर और 30 दिनों का आमरण अनशन:

अक्टूबर 1938 में उन्हें डालमियानगर में छह अन्य समाजवादी नेताओं के साथ लगातार मीटिंग करने, मजदूरों को हड़ताल के लिए उकसाने और 2400 मजदूरों की हड़ताल आयोजित करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया. बसावन सिंह अक्सरहां गांधीवादी तरीके से भूख हड़ताल करके मजदूरों के साथ गलत व्यवहार करने के विरोध में अपनी आवाज उठाया करते थे. 12 जनवरी 1949 को बिहार मेंटेनेंस ऑफ़ पब्लिक आर्डर एक्ट के तहत डालमियानगर में गिरफ्तार कर लिया गया और मार्च के अंत में उन्हें छोड़ा गया. इसके बाद उन्होंने डालमियानगर में मजदूरों के हितों के मुद्दे को लेकर 30 दिन का आमरण अनशन किया. प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु और उनके मित्र और समाजवादी साथी जयप्रकाश नारायण ने हस्तक्षेप किया और राजेंद्र प्रसाद आर्बिट्रेटर बने. तब जाकर बसावन सिंह ने 31वे दिन अपना आमरण अनशन समाप्त किया.

जब ब्रिटिश सरकार ने बिना देशवासियों की राय जाने भारत को भी द्वितीय विश्व युद्ध में भागीदार बना दिया तो इसके विरोध में 31 अक्टूबर 1939 को कृष्ण सिंह के मंत्री मंडल ने इस्तीफा दे दिया. बसावन सिंह पहले बिहारी थे जिन्होंने 26 जनवरी 1940 को जपला में विश्व युद्ध के विरोध में भाषण दिया और मोर्चा निकाला. इसके बाद पलामू के डिप्टी कमिश्नर ने उनकी गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी कर दिया. जपला में युद्ध विरोधी आपत्ति जनक भाषण के लिए उनके खिलाफ डिफेन्स ऑफ़ इंडिया रूल के तहत केस दर्ज किया गया. डाल्टेनगंज में उनके खिलाफ केस चला और उन्हें 18 महीने की सख्त सजा हुई. उन्हें हजारीबाग सेंट्रल जेल के टी सेल में बंद रखा गया. जब जय प्रकाश नारायण को 18 फरबरी 1940 को गिरफ्तार किया गया. तो नारायण और अन्य समाजवादी नेता जैसे गंगा शरण सिंह आदि को अलग अलग सेल में बंद रखा गया. बसावन सिंह को जुलाई 1941 में जेल से आजाद किया गया.

1942 के ऐतिहासिक भारत छोडो आन्दोलन में बसावन सिंह ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. 12 अप्रैल 1942 को पलामू जिले में आयोजित राजनीतिक कांफ्रेंस में उन्होंने हजारों लोगों को संबोधित किया, जिसमे बहुत बड़ी संख्या में खेरवार और अन्य आदिवासी जाति के लोग उपस्थित थे. इसके बाद अगले सप्ताह 18 और 19 अप्रैल 1942 को देहरी और फिर मुजफ्फरपुर में किसान सभा को संबोधित किया. अगस्त क्रांति के समय बसावन सिंह को बिहार सरकार ने दीप नारायण सिंह, राम वृक्ष बेनीपुरी, नारायण प्रसाद वर्मा, बीरचंद पटेल और मुज़फ्फरपुर जिले के दुसरे नेताओं के साथ ब्लैक लिस्टेड कर दिया. वे अंडरग्राउंड हो गए और फिर पलामू जिले में एक गुरिल्ला फ़ौज तैयार की. हजारीबाग सेंट्रल जेल से दिवाली की रात 9 नवम्बर 1942 को जब छह समाजवादी नेता यथा शुक्ल नारायण पंडित, गुलाब चंद गुप्ता, राम नंदन मिश्र, सूरज नारायण सिंह, शालिग्राम सिंह और गुलाली सोनार निकल भागे, तो इस महत्वपूर्ण घटना में भी परदे के पीछे बसावन सिंह लगे हुए थे.

जेल से भागने के बाद जय प्रकाश नारायण बसावन सिंह से मिलना चाहते थे और अगस्त क्रांति की लौ जलाए रखने के लिए आगे के कार्यक्रम की दशोदिशा तय करने के लिए मिलना चाहते थे.

7 जनवरी 1943 को बसावन सिंह को दिल्ली में ब्रिटिश पुलिस ने पकड़ लिया. उसके बाद उन्हें भारत के अलग अलग जेलों- लाल किला, दिल्ली जेल, बांकीपुर जेल, गया जेल, भागलपुर जेल और हजारीबाग सेंट्रल जेल में हथकड़ियों में जकड कर रखा गया.

उन्हें जेल से अप्रैल 1947 में छोड़ा गया जब 2 अप्रैल 1946 को बिहार में श्री कृष्ण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी.

आजाद भारत में वे सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बनाए गए. वे हिन्द मजदूर सभा के संस्थापक सदस्यों में एक थे. मजदूरों के अधिकारों को लेकर 1965 में गोमिया में हड़ताल के सिलसिले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

समाजवादी नेतृत्व:

फरबरी 1948 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने अपने आप को कांग्रेस से अलग कर लिया. जब 1977 में विपक्षी दल एक प्लेटफार्म पर आये और जनता पार्टी का गठन किया और फिर बिहार और साथ ही केंद्र में भी जनता पार्टी की सरकार बनी, उस समय बसावन सिंह समाजवाद की एक महत्वपूर्ण आवाज थे. 1939 से 1977 तक बसावन सिंह सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने रहे और साथ ही काफी वर्षों तक स्टेट प्रेसिडेंट के पद पर भी रहे.  1952 में उन्होंने पहले आम चुनाव में देहरी ऑन सोन से जीत हासिल की और 1952 से 1962 तक वे महत्वपूर्ण विपक्षी नेता के रूप में बने रहे. 1962 से 1968 तक वे बिहार विधान परिषद् के सदस्य के रूप में कार्यरत रहे. और जब 1967 में पहली बार गठबंधन की सरकार बनी तो उसमे एव लेबर, प्लानिंग और इंडस्ट्री मिनिस्टर बने. 1975 में आपातकाल के दौरान वे 20 महीने तक अंडरग्राउंड रहे और आन्दोलन का नेतृत्व करते रहे. इस दौरान उनकी पत्नी को सरकार को खतरे के रूप में देखते हुए जेल में मिसा कानून के तहत बंद कर दिया गया.

1977 में वे फिर देहरी ऑन सोन से चुने गए और फिर बिहार में जनता पार्टी की सरकार में लेबर, प्लानिंग और इंडस्ट्री मिनिस्टर बने. उनका देहांत 7 अप्रैल 1989 को हो गया.

उनकी पत्नी कमला सिन्हा जन संघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की भतीजी थीं. वे भी एक राजनेता थीं. 1990 से 2000 के बीच वे राज्य सभा के लिए दो बार चुनी गयीं और बड़ा में सूरीनाम और बारबाडोस में भारतीय राजदूत के रूप में कार्यरत रहीं. इन्दर कुमार गुजराल के मंत्रिमंडल में वे विदेश मामलों की राज्य मंत्री भी रहीं.

बसावन सिंह बहुत ज्ञानी राजनेता थे. और आजादी के संग्राम के दिनों के भारतीय राजनेताओं के बीच अपने अध्ययन के लिए जाने जाते थे. समाजवाद पर उन्ही समझ बेहद गहरी थी जो किताबी होने के साथ साथ जमीनी भी थी. उन्होंने कई मौकों पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया. पहली बार 1950 में वे रंगून गए. 1951 में रंगून में आयोजित पहले एशियाई सोशलिस्ट कांफ्रेंस में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में गए. 1954 में वे चीन गए और वहां लेबर डे पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया. 1956 में वे हिन्द मजदूर सभा के प्रतिनिधि के तौर पर जापान गए और जापान ट्रेड यूनियन के सालाना कार्यक्रम में हिस्सा लिया. उसी साल वे मई दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने के लिए भारतीय प्रतिनिधि मंडल के सदस्य के तौर पर सोवियत संघ भी गए. 1984 में अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर कांग्रेस ऑफ़ इंडस्ट्रियल वर्कर्स आर्गेनाईजेशन के आमंत्रण पर वे यूएसए भी गए.

23 मार्च 2000 को भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया. हाजीपुर में उनके नाम पर एक इंडोर स्टेडियम है.

 

 


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