बहुत दुखद दृश्य होता है जब प्राकृतिक आपदा का शिकार मासूम बच्चे बनते हैं

डिजास्टर मैनेजमेंट एक ऐसा विषय है, जिसके बारे में सारी जानकारी सरकारी पदाधिकारियों के पास ही है, Monopoly of information  ! आम आदमी अभी भी इस विषय के बारे में लगभग कुछ नहीं जानता. हालांकि वो साल दर डिजास्टर की चपेट में आता है. प्राकृतिक आपदाओं के कारण प्रतिवर्ष हमारे देश में जान और माल की भारी क्षति होती है. यह सही है कि प्राकृतिक आपदाओं पर मनुष्य का बस नहीं, लेकिन उचित जानकारी के साथ इसके खतरे को कम किया जा सकता है.  Marginalised.in डिजास्टर मैनेजमेंट पर 50 आर्टिकल्स का सीरीज लेकर आ रहा है, ताकि डिजास्टर मैनेजमेंट की पेचीदगियों को आम आदमी आम भाषा में समझ सके.

प्रस्तुत है इस कड़ी का छठा आर्टिकल:

नकुल तरुण डिजास्टर एक्सपर्ट हैं. इस सेक्टर में उन्हें 15 सालों का अनुभव है. फिलहाल नई दिल्ली में रहते हैं.

वैश्विक स्तर पर देखा गया है कि प्राकृतिक आपदा खासकर भूकंप, स्कूल बिल्डिंग के ध्वस्त होने और बड़े पैमाने पर आगजनी के चपेट में आकर बड़ी संख्या में मासूम स्कूली बच्चे अपनी जान गंवा बैठते हैं. ये एक ऐसी परिस्थिति है, जिसे काफी प्रभावी तरीके से टाला जा सकता है, खासकर अगर मामला जानकारी के अभाव जुड़ा है तो ( जो कि अक्सर देखा गया है).

दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण:

अगर हम अतीत के पन्ने पलटते हैं, तो पाते हैं प्राकृतिक आपदाओं और उनकी जद में आकर जान गंवाने  वाले मासूम स्कूली  बच्चों की कहानियों से पन्ने भरे हुए हैं. उदाहरण के तौर पर, 7 दिसंबर 1988 को आर्मेनिया में 400 स्कूली बच्चे अपनी जान गँवा बैठे जब Dzhrashen में एक प्राइमरी स्कूल का बिल्डिंग ढह गया. 10 मई 1997 को ईरान के अर्दाकुल इलाके में एक प्राथमिक स्कूल का भवन ढह गया तो इसकी जद में 110 बच्चे आ गये. 1999 में ची ची भूकंप ने तायवान में नन्तऔ और तैचुन्ग  इलाके में 43 स्कूलों को ध्वस्त कर दिया.  ये सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके थे; हालाकिं पुरे ताइवान में 700 स्कूल बिल्डिंग ध्वस्त हो गए. 2008 में सिचुआन भूकंप गज़ब का जलजला लेकर आया. जब कुल 7,000 स्कूल बिल्डिंग ध्वस्त हो गए और लगभग 19,000 स्कूली बच्चे अपनी जान गंवा बैठे. इतना बड़ा loss सिचुआन आज तक भूल नहीं पाया है.

भारत भी इन प्राकृतिक आपदाओं से अछूता नहीं रहा है. हाल के दिनों की आपदाओं पर नज़र डालें तो 2001 का भुज का भूकंप दिमाग में आता है. 2001 में आये भुज के भूकंप में 11,600 स्कूल के भवनों को भारी नुक्सान पहुंचा, कुल 31 टीचर मारे गए और 95 बुरी तरह घायल हो गए. 971 स्कूली बच्चों ने जान गंवायीं और 1051 बुरी तरह घायल हुए. स्कूली भवनों को भीषण नुकसान पहुँचने के चलते एक लम्बे अरसे तक पुरे इलाके में औपचारिक शिक्षा बाधित रही.

जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि प्राकृतिक आपदा अपने रूप में सिर्फ भूकंप और स्कूल भवन के गिरने तक सीमित नहीं रही है, बल्कि आगजनी भी जान माल के नुक्सान के रूप में आई है. 1995 में हरियाणा के डबवाली में जब प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन कार्यक्रम चल रहा था, तभी स्कूल में आग लग गयी. इस दुर्घटना में 400 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई, जिसे आधे से अधिक बच्चे थे. 2004 में तमिलनाडु के कुम्बकोनम में लार्ड कृष्णा स्कूल में आग लग गयी, जिसमे 94 बच्चे जिन्दा आग में जल गए. 2004 में पुरे दक्षिण एशिया में जो सुनामी आई, उसमे दक्षिण भारत के तटवर्तीय इलाकों में स्थित स्कूलों के हजारों बच्चे और शिक्षक प्रभावित हुए. ऐसी परिस्थितियों में अक्सरहां देखा गया है कि बच्चे की कैजुअल्टी रेट ज्यादा होती है, एक तो भगदड़ में बच्चे बड़ों से मुकाबला नहीं कर पाते हैं, उस पर से शिक्षकों में, बच्चों में जानकारी का अभाव चीजों को एकदम भयावह रूप दे देती है, नतीजा हमारे मासूम बच्चों की जान के रूप में हमारे सामने आता है.

वैश्विक घोषणा पत्रों में स्कूल सुरक्षा कार्यक्रम डिजास्टर रिस्क रिडक्शन का महत्वपूर्ण हिस्सा:

तमाम पहलुओं को मद्देनज़र रखते हुए विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय संगठनों और घोषणाओं ने स्कूल सुरक्षा कार्यक्रम को डिजास्टर रिस्क रिडक्शन के सबसे महत्वपूर्ण अवयव के रूप में देखा है.

अगर हम एक नज़र भारत के भूकंप से आशंकित और प्रभावित क्षेत्रों के नक़्शे पर डालें तो पाते हैं कि देश का एक बड़ा हिस्सा भूकंप जोन IV में पड़ता है, जिसका मतलब है कि ये हाई डैमेज रिस्क ज़ोन है, जहाँ 8 की इंटेंसिटी का भूकंप आ सकता है. अगर कोई प्राकृतिक आपदा, जैसे भूकंप या आगजनी दिन में होती है, तो देखा गया है कि असुरक्षित माहौल और स्कूलों की तैयारी में कमी के चलते बच्चों की कैजुअल्टी काफी ज्यादा होती है.

हाल के दिनों में भारत सरकार ने स्कूलों में डिजास्टर रिस्क रिडक्शन के मामले को बहुत गंभीरता से लिया है. स्कूल प्रशासन की भी जिम्मेवारी बनती है कि वे बच्चो की बेशकीमती जान को बचाने के लिए भारत सरकार के गाइड लाइन को फॉलो करते हुए स्कूल सेफ्टी प्रोग्राम को गंभीरता से लागू करें.

मै अभिभावकों और साथ ही अपार्टमेंट्स में रहने वाले लोगों के असोसिएशन से अनुरोध करना चाहूँगा कि वे अपने इलाके के स्कूलों में जाएँ और वहां जांच करें कि क्या सरकार के सुरक्षा नियामकों को माना जा रहा है, अगर नहीं, तो उन्हें इसको फॉलो करने पर बाध्य करें. आखिर बच्चों की जान का मामला है. पर इसके लिया जरुरी है कि हम जाने स्कूल डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान होता है क्या?

इसकी चर्चा हम सीरीज के अगले आर्टिकल में करेंगे.


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