मुज़फ्फरपुर सेक्स स्कैंडल पर बिहारी समाज का खून क्यों नहीं खौल रहा?29 निर्भया का सवाल है.

Balendushekhar Mangalmurty is Editor-in-chief of marginalised.in
मुजफ्फरपुर बालिका गृह सेक्स स्कैंडल ने एक बार फिर बिहार में सोशल लीडर्स की पोल खोल कर रख दी है. ब्रजेश ठाकुर जैसे लोग एनजीओ चला रहे हैं, बच्चों के लिए काम कर रहे हैं, दलितों के उद्धार के लिए काम कर रहे हैं, और परदे के पीछे क्या कर रहे हैं? मासूम अनाथ बच्चियों का शारीरिक दोहन. इतना ही नहीं, वह इन बच्चियों को सरकारी अधिकारियों को उपलब्ध करवाता आया है. 29 बच्चियों का यौन शोषण. अपने आप में कितनी शर्म की बात है !!
बिहार महिला आयोग की अध्यक्ष दिलमनी मिश्रा ने जांच के बाद कहा कि हर मंगलवार को सरकारी अधिकारीयों को लड़कियां उपलब्ध करवाई जाती थीं. क्यों उपलब्ध करवाई जाती थीं? क्योंकि ब्रजेश ठाकुर को अपने एनजीओ के लिए प्रोजेक्ट्स चाहिए थे. एनजीओ खुद को सामाजिक सेवा में संलग्न दिखाते हैं, पर ये काम तभी करेंगे जब इन्हें इस काम के लिए पैसे मिलेंगे. सामाजिक कल्याण विभाग के अधिकारियों  की ब्रजेश ठाकुर जैसे लोगों पर कृपा रही है, वो करोड़ों में खेलता रहा. ठाकुर के एनजीओ की फाइल क्लीयरेंस के लिए टॉप लेवल पर यानी सचिव और मंत्री के पास जाती होगी, ये एक रूटीन प्रोसीजर है. पर न सचिव न मंत्री ने इस पर एक शब्द कहा. मंत्री ने चुपचाप फाइल पर sign करना जारी रखा. क्यों इस एनजीओ पर मेहरबानी? पूछना जरुरी नहीं समझा.
पर दिलमनी मिश्र अधूरा सच बोल रही हैं. सरकारी पदाधिकारी दोषी हैं, और वे सजा के हक़दार हैं, पर क्या नेता दूध के धुले हैं? जो बात परदे के पीछे से छन कर आ रही है, उसमे सामाजिक कल्याण मंत्री के पति जांच की जद में आ रहे हैं. तो क्या वे अकेले हैं, और कोई शामिल नहीं है? ये कौन स्वीकार करेगा?
दुःख की बात है कि एक निर्भया पर पूरा देश आंदोलित हो जाता है, और यहाँ 29 नाबालिग लड़कियों के साथ बार बारे रेप का मामला है.
एनजीओ ने दुखी किया. पटना में कितने ही इंटरनेशनल एनजीओ के ऑफिस हैं. पर वे खामोश हैं. उन्होंने एक अलग ही कार्यशैली अपना ली है. वे सरकार के साथ काम करते हैं, वे सरकार से पैसे लेते हैं, वे अब जनता के बीच काम करने वाली संस्थाओं के साथ कम काम करते हैं. कॉर्पोरेट ऑफिस चलाते हैं, ऊँची तनख्वाह लेते हैं और विदेश यात्रा के अवसर ढूंढते रहते हैं. बिहार में सिविल सोसाइटी कमजोर है, बिहार में बौद्धिक लोगों के पास रीढ़ की हड्डी नहीं है, प्रोफेसर्स पढ़ाते कम हैं, राजनीति ज्यादा करते हैं, राजनीतिक दलों के दफ्तरों में मंडराते ज्यादा दिखाई पड़ते हैं. अखबारों ने मुजफ्फरपुर सेक्स काण्ड की रिपोर्टिंग करते हुए, सोशल मीडिया ने इसे जीवित रखा है.
नीतीश कुमार को चाहिए कि इस घृणित काण्ड को एक अवसर के रूप में लेते हुए राजनीति से, अपने दल से घिनोने लोगों को साफ़ करें. युवा, साफ़ सुथरे चेहरे वाले लोगों को मौका दें. बिहार की राजनीति को उनसे उम्मीद है, वे इस पर खरा उतरने की कोशिश करें.
और एनजीओ को सरकारी संरक्षण से बाहर आकर समाज के लिए प्रतिबद्ध होने की जरूरत है, ताकि वे जब भी मौका आये, सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकें.अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे बची खुची विश्वसनीयता भी खो देंगे. नुकसान सिर्फ उनका नहीं, बिहार के समाज का भी होगा.

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