श्रद्धांजली रफ़ी: 38 साल हो गए रफ़ी साहब को गए हुए, पर उनका लीजेंड बढ़ता जा रहा है

Balendushekhar Mangalmurty, Editor in Chief of marginalised.in 

31 जुलाई 1980 को सुर सम्राट रफ़ी इस दुनिया को छोड़ चले. पार्श्वगायन के इतिहास में के एल सहगल के असामयिक देहांत के बाद ये सबसे बड़ा झटका था, जिससे पार्श्व गायन कभी उभर नहीं पाया. जो जगह खाली हुई, वो फिर भर नहीं सकी. संगीतकारों ने रफ़ी के क्लोन तलाशे, शब्बीर कुमार, मुहम्मद अज़ीज़, पर आवाज़ की वो जादूगरी इन चेलों के बस की बात नहीं थी.

उस दिन रफ़ी साहब अपने घर पर गाने का रियाज़ कर रहे थे. दुर्गा पूजा बंगाल में बहुत बड़ा अवसर होता है और इस मौके पर कोलकाता में संगीतकार, गायक आदि अपनी एल्बम रिलीज़ करते हैं. रफ़ी साहब भी माँ दुर्गे को समर्पित एक एल्बम पर काम कर रहे थे. समय कम था. उन्होंने अपनी पत्नी बिलकिस बेगम को बताया कि उन्हें सीने में हल्का दर्द हो रहा है. लेकिन रफ़ी साहब ने सोचा कि शायद गैस्ट्रिक समस्या है तो उन्होंने सोडा लिया और फिर रीयाज़ में लग गए, पर बेगम साहिबा ने देखा कि उनके नाख़ून नीले पर रहे हैं. वो घबरा उठी और फाइनली उन्हें रात के साधे आठ बजे बॉम्बे हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया. ये वही हॉस्पिटल था जहाँ 1960 में रफ़ी साहब ने कार्डियक मशीन डोनेट किया था. पर तब तक देर हो चुकी थी. रात के दस बजे उन्हें दो और हार्ट अटैक आये और फिर वे नहीं रहे. डॉक्टर ने बेहद अफ़सोस जाहिर करते हुए कहा: “वे राष्ट्रीय धरोहर थे. हम उन्हें बचा सकते थे, अगर उन्हें पहले लाया जाता. पर जब तक उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट किया गया, तब तक उनके हार्ट को नुक्सान पहुँच चुका था.”

उस समय उनकी उम्र महज 55 साल की थी, पांच महीने के बाद वे 56 के होते. और उस समय वे गायकी के शीर्ष पर थे. उनकी आवाज बुलंद थी और उस साल वे अपने तीन गानों के साथ फिल्म फेयर अवार्ड के लिए नॉमिनेटेड थे. आर डी किशोर के दबदबे वाले दौर में वे नंबर वन सिंगर का रूतबा खो चुके थे. लेकिन अराधना फिल्म के सात साल के बाद 1977 में लैला मजनू, अमर अकबर अन्थोनी, हम किसी से कम नहीं जैसी फिल्मों से वे शानदार come back कर चुके थे और फिर से बेहद व्यस्त सिंगर बन चुके थे.

28 जुलाई को उन्होंने लक्शिकांत प्यारेलाल की धर्मेन्द्र हेमामालिनी अभिनीत फिल्म आसपास के लिए गाना गाया था: तू कहीं आसपास है दोस्त. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए उनका गाया अंतिम गीत था ये. ये सफ़र जो 1963 में पारसमणि फिल्म से शुरू हुआ था, वो 1980 में आसपास फिल्म के साथ थम गया.

उनके अचानक देहांत से पुरे महाद्वीप में एक सन्नाटा छा गया. बॉलीवुड थम गया. भारत सरकार ने तीन दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित कर दिया.

फ्यूनरल ऐसा जो बॉम्बे ने पहले कभी नहीं देखा. बॉम्बे की मुसलाधार बारिश, मानो प्रकृति भी इस फनकार के जाने पर शोक मना रही थी. 20000 लोग जनाजे के साथ चले, रास्ते भर लोग छतों से इस महान गायक को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि दे रहे थे.

रफ़ी साहब चले गए, पर उनकी आवाज रह गयी और रह गए किस्से उनकी गायकी की, उनके व्यक्तित्व के.

आज हम कुछ बातों का जिक्र करके रफ़ी साहब को याद करेंगे.

अपने चार दशक के करियर में रफ़ी साहब को छह बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला. 1967 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति राधाकृष्णन के हाथों पद्म श्री सम्मान मिला. हालाँकि उनके जैसे आइकोनिक सिंगर और भारत माता के महानतम सपूतों में एक के लिए बेहद छोटा सम्मान था. वे भारत रत्न के हक़दार हैं और आज भी आवाज उठती रहती है कि भारत सरकार इस एतिहासिक गलती को सुधारे और रफ़ी साहब को भारत रत्न सम्मान से सम्मानित करे.

 

रफी साहब समय के बड़े पाबंद थे

तो हुआ यूं कि एक बार वे संगीतकार सोनिक ओमी के घर रिहर्सल के लिए तय समय से 45 मिनट पहले पहुंच गए। तो उन्होंने डोरबेल नहीं बजाया बल्कि 45 मिनट तक सोनिक ओमी के घर के बाहर टहलते रहे।
एक बार ऐसा हुआ ओ पी नैय्यर सावन की घटा फ़िल्म का संगीत तैयार कर रहे थे। रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचने में रफी लेट हो गए। नैय्यर साहब खुद समय के बड़े पाबंद थे। जब लेट होने का कारण पूछा तो रफी ने कहा कि शंकर जयकिशन की रिकॉर्डिंग में देरी हो गयी। एक तो देरी दूसरे प्रोफेशनल राइवलरी…ओ पी नैय्यर ने कहा दिया: नय्यर को रफी की जरुरत नहीं। फिर नैय्यर साहब ने महेंद्र कपूर से गाना गवाना शुरू किया। पर नैय्यर साहब को लगने लगा कि फैसला म्यूजिकल मेरिट पर न लेकर गुस्से में लिया गया है। उन्हें अफसोस होने लगा। दो साल तक दोनो ने साथ काम नही किया। नैय्यर साहब को रफी की कमी खल रही थी। फाइनली दोनो फिर एक साथ आये। रफी ने भी दिल मे कोई मलाल नहीं रखा। नैय्यर साहब के गले लगते हुए हल्के से कहा:यूं तो हमने लाख संगीतकार देखे हैं, तुमसा नहीं देखा। नैय्यर भी कह बैठे: ऐसे फरिश्ते से मैं कैसे दूर रह सकता था

 

रफ़ी साहब ने कुल 23 भाषाओँ में गाने गाये. उन्होंने अपना एक प्रसिद्द गाना “ बहारों फूल बरसाओ” अंग्रेजी में भी गया, हसरत जयपुरी के इस गीत का अंग्रेजी में अनुवाद हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने किया था.

रफ़ी के आदर्श थे के एल सहगल. उन्हें इस बात का गर्व था कि सहगल साहब के साथ उन्होंने शाहजहाँ (1946) फिल्म में कोरस में गाना गया था: मेरे सपनों की रानी, रूही, रूही.

उन्होंने दो फिल्मों में एक्टिंग भी की. एक बार, 1945 में उन्होंने लैला मजनू फिल्म में स्क्रीन पर गाना गया: तेरा जलवा जिसने देखा. इसके बाद उन्होंने दिलीप कुमार के साथ 1957 में मुसाफिर फिल्म में एक्टिंग की.

रफ़ी साहब के करियर को उंचाई देने में संगीतकार नौशाद का बहुत बड़ा हाथ रहा. जब रफी साहब नौशाद साहब के पास गाने के लिए पहुंचे. उस समय नौशाद के प्रिय गायक थे तलत महमूद, जो अपनी मखमली आवाज के लिए जाने जाते थे. हुआ कुछ यूँ कि एक बार नौशाद साहब ने तलत साहब को रिकॉर्डिंग के पहले रिकॉर्डिंग रूम के बाहर सिगरेट पीते हुए देख लिया, इससे वे बहुत नाराज हुए और उन्होंने तय किया कि वे अपनी फिल्म का सारा गाना रफ़ी से गवाएंगे. वह फिल्म थी: बैजू बावरा. नौशाद साहब बताते थे कि रफ़ी पंजाब से आये थे और उनके उच्चारण में पंजाबियत की गहरी छाप थी. उन्होंने उनसे गाने गवाने से पहले उनके उच्चारण पर काफी मेहनत करवाया और उस पंजाबी एक्सेंट को हटाया. बैजू बावरा के गानों ने रफ़ी को इंडिया में नंबर वन मेल सिंगर बना दिया.

शंकर जयकिशन रफ़ी के दीवाने थे. हालांकि राजकपूर की फिल्मों में वे गाने मुकेश से गवाते थे, पर उनकी हमेशा कोशिश रहती थी कि कम से कम एक गाना रफ़ी साहब की आवाज में जरुर रहे. रफ़ी के छह फिल्म फेयर पुरस्कारों में तीन शंकर जयकिशन के गानों के लिए मिले थे.

रफ़ी साहब की आवाज के दीवाने एक संगीतकार थे, रवि. रवि जब भी बी आर चोपड़ा की फिल्मों के लिए धुन बनाया करते थे, तो चोपड़ा साहब अपने मित्र महेंद्र कपूर से गाने गवाना पसंद करते थे, पर रवि ने जब भी फ़िल्मे चोपड़ा साहब के इतर कीं, तो उन्होंने रफ़ी साहब से गाने गवाए.

संगीत कार ओ पी नैय्यर 1960 के दशक में रिदम किंग के नाम से जाने जाते थे. उनका संगीत फूट टैपिंग होता था, और बिट्स की प्रधानता होती थी. उन्होंने और शंकर जयकिशन ने शम्मी कपूर को रेबेल स्टार की छवि दी. वे कहा करते थे, अगर रफ़ी न होता, तो ओ पी नैय्यर भी न होता. नैय्यर और शंकर जयकिशन में कम्पटीशन तेज था उनदिनों, एक बार रफ़ी नैय्यर साहब के रिकॉर्डिंग पर लेट पहुंचे. पूछने पर उन्होंने कहा कि शंकर जयकिशन की रिकॉर्डिंग में कुछ समय लग गया. इस पर नैय्यर साहब नाराज हो गए. और उन्होंने रफ़ी से अपने गाने गवाने बंद कर दिया और बदले में महेंद्र कपूर को अवसर देने लगे. बाद में दोनों फिर साथ आये फिल्म एक बार मुस्कुरा दो से.

रफ़ी ने अपने जीवन काल में 26 बार फॉरेन टूर किया.

रफ़ी ने अपने करियर में 186 बैकग्राउंड सांग गए.

रफ़ी ने कुल 1960 हिंदी फिल्मों में अपनी आवाज दी.

रफ़ी ने सबसे ज्यादा देश भक्ति के गीत गाये.

रफ़ी रेगुलरली विट्ठल मंदिर जाया करते थे, जहां वे गजनबुवा रायकर के प्रवचन सुनते और संस्कृत श्लोक और अभंग के मायने गहराई से समझने की कोशिश करते.

रफ़ी का schedule बहुत व्यस्त रहता. पर फिर भी कुछ समय वे पतंग उड़ाने, बच्छों के साथ कार्रोम खेलने  के लिए निकालते . बैडमिंटन उनका प्रिय खेल था.

रफ़ी को अमिताभ बच्चन से इतना लगाव था कि उन्होंने शोले 20 से अधिक बार देखा. रफ़ी और अमिताभ बच्चन ने फिल्म नसीब में साथ गाना भी गया था: चल चल मेरे भाई.

लता मंगेशकर की माँ माई मंगेशकर ने उन्हें सोने के बटन गिफ्ट किये थे, जिन्हें उन्होंने जीवन भर संभाल कर रखा.

आनंद बख्शी अपने बेटे का एडमिशन बांद्रा के एक कान्वेंट स्कूल में करवाना चाह रहे थे, पर बात बन नहीं रही थी. किसी ने उन्हें बताया कि रफ़ी साहब ने इस स्कूल में बहुत बड़ा डोनेशन दिया है. आनंद बख्शी ने रफ़ी साहब से रिक्वेस्ट किया. रफ़ी साहब न केवल स्कूल गए, बल्कि वहां बच्चों के लिए गाना भी गाया. कहना न होगा कि आनंद बख्शी के बेटे का एडमिशन हो गया.

अपने दौर के गायकों में रफ़ी साहब ने सबसे ज्यादा बच्चों के लिए गीत गाये.

गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान रफ़ी साहब ने अपने सह गायकों/ गायिकों का पूरा ख्याल रखा. मुबारक बेगम ने बताया कि 1953 में दायरा फिल्म के लिए एक गाना रिकॉर्ड कर रहे थे, देवता तुम हो मेरा सहारा/ गाने के दौरान मुझे एहसास हुआ कि रफ़ी साहब की पिच को वे मैच नहीं कर पा रही हैं, तो उन्होंने रिक्वेस्ट किया कि वे अपनी पिच को थोडा लो कर लें. उन्होंने मुबारक बेगम की बात मान ली.

भजन गायक अनूप जलोटा ने रफ़ी साहब को याद करते हुए बताया कि माइक का इस्तेमाल उन्होंने रफ़ी साहब से सीखा. कितनी दूर से गाना है,कैसे माइक पकड़ना है, कब गले से गाना है और कब नाभि से. ये सचमुच अद्भुत अनुभव था.

मनमोहन देसाई रफी भक्त थे और वे रफ़ी के देहांत के बार उन पर  पर एक डाक्यूमेंट्री बनाना चाह रहे थे. पर देसाई के देहांत से ये प्रोजेक्ट अधूरा रह गया. फाइनली फिल्म्स डिवीज़न ऑफ़ इंडिया ने उन पर डाक्यूमेंट्री बनायी.

बहुत कम लोग जानते हैं कि रफ़ी साहब ने गाइड फिल्म के लिए गाना रिकॉर्ड किया था, “हम ही थी न कोई बात याद न तुमको आ सके, तुमने हमें भुला दिया, हम न तुम्हे भुला सके” जिसे बाद में हटा कर इसकी जगह ‘ दिन ढल जाए” रिकॉर्ड किया गया.

एक प्रोडूसर जिन्होंने रफ़ी साहब के गाने का पैसा काफी समय से नहीं दिया था, अचानक एक स्टूडियो में रेक्रोडिंग के दौरान टकरा गया. वे बच कर निकल जाना चाह रहे थे. रफ़ी साहब ने देखा तो उन्हें टोका: आप क्यों छुप रहे हैं? घबराईये मत, आपसे पहले भी कई लोग जिन्हें मेरा पैसा देना है.

ब्रह्मचारी फिल्म के गीत “दिल के झरोखे में”  गाने के दौरान शंकर जयकिशन जिस नोट पर उनसे गवाना चाह रहे थे, उस प्रयास के लिए रफ़ी साहब के गले को काफी नुक्सान पहुंचा. जब दुसरे गायकों ने ये गीत सुना, तो वे शंकर जयकिशन से खुश नहीं हुए. किशोर कुमार ने रफ़ी साहब को फ़ोन करके कहा कि आगे से वे इस तरह का प्रयास करने से बचें.

अपने करियर में रफ़ी साहब ने 47 मेल को सिंगर के साथ गाने गए और 80 फीमेल सिंगर के साथ गाने गाये.

कुल मिलाकर उन्होंने 310 गीतकारों के लिखे गीत गाये और 243 संगीतकारों के लिए गाने गाये.

उन्होंने सबसे अधिक शंकर जयकिशन के लिए एकल गीत गाये (216), उसके बाद लक्ष्मीकांत प्यारेलाल (186) और तीसरे स्थान पर रवि (130)

आर डी बर्मन के लिए ४३ एकल गीत और सलिल चौधरी के लिए १५ एकल गीत.

गीतकारों में सबसे अधिक उन्होंने राजेंद्र कृष्ण (182 एकल) के गीत गाये; उसके बाद हसरत जयपुरी (173) और फिर आनंद बख्शी (172)

फीमेल को सिंगर में सबसे ज्यादा आशा भोंसले ( 799) के साथ गाने गाये; फिर लता मंगेशकर ( 413) के साथ.

पुरुष सह गायकों में रफ़ी ने सबसे ज्यादा मन्ना डे ( 58) के साथ गाने गाये; फिर किशोर कुमार (34) और फिर तलत महमूद (5) के साथ.

अभिनेताओं में सबसे ज्यादा शम्मी कपूर (90) के लिए गाने गाये. दुसरे स्थान पर रहे जोनी वाकर (60). शशि कपूर के लिए 56 गीत, धर्मेन्द्र के लिए 53 गीत. राजेंद्र कुमार के लिए 54 गीत. देव आनंद के लिए 43. दिलीप कुमार के लिए सिर्फ 34 गीत उन्होंने गाये.

श्रद्धांजलि रफी साहब !!
जब रफी साहब हज करने मक्का मदीना गए, तो वहां प्रोफेट मुहम्मद की पाक जगह और लोगों का हुजूम देखकर उनके अंदर अज़ान देने की तीव्र लालसा जगी। वे वहां की मैनेजिंग कमिटी के पास गए और अपनी इच्छा के बारे में बताया। पर कमिटी ने इस ग्राउंड पर मना कर दिया कि सऊदी अरब के बाहर के मुसलमानों के लिए मनाही है। तब कई लोगों ने कमिटी को बताया कि रफी भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बड़े गायक हैं। कमिटी के लोगों ने जब ये सुना तो उन्हें एक बार अज़ान देने का मौका दिया। उस दिन जब रफी साहब ने अज़ान दिया तो एक सन्नाटा सा छा गया। दुनिया भर से आई भीड़ अपनी जगह पर जमी रह गयी। कमिटी के लोगों ने रफी साहब से क्षमा मांगते हुए उनसे रिक्वेस्ट किया कि जब तक वे मक्का मदीना में हैं, वे अज़ान दें।
यही ताकत रफी साहब के देशभक्ति गानों में भी है।

उस विराट व्यक्तित्व के किस किस पहलु को याद करें. एक आर्टिकल में सम्भव नहीं. 38 साल हो गए उन्हें गए हुए, पर उनका लीजेंड और बढ़ता जा रहा है.


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