ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी: जिन्होंने दर्द परदे पर ही नहीं अपने जीवन में भी जीया

Balendushekhar Mangalmurty is Editor in chief of marginalised.in

दिल में फिर दर्द उठा
फिर कोई भूली हुई याद
छेड़ती आई पुरानी बात
दिल को डंसने लगी गुज़री हुई जालीम रात
दिल में फिर दर्द उठा
फिर कोई भूली हुई याद बन के नश्तर
रंगे अहसास में उतरी ऐसे
मौत ने ले के मेरा नाम पुकारा जैसे !!

अगर मीना कुमारी आज जीवित होतीं, तो आज 85 साल की होतीं. भारतीय सिनेमा की ‘ट्रेजेडी क्वीन’  मीना कुमारी के 85वें जन्मदिवस के मौके पर गूगल ने आज डूडल बनाकर उन्हें याद किया.  मीना कुमारी अजीमोशान अदाकारा होने के साथ बेहतरीन शायरा  भी थीं. वे अपनी नज्में ‘नाज’ के तख़ल्लुस से लिखती थीं. मुंबई में एक अगस्त 1932 को मुस्लिम परिवार में जन्मीं मीना कुमारी गूगल डूडल में लाल साड़ी पहने बेहद भावुक नजर आ रहीं हैं और पीछे गूगल लिखा है.  उनके अनगिनत फिल्मी किरदारों में अभिनय से बयां किया गया दर्द इस डूडल में भी उनके चेहरे पर नजर आ रहा है.  महजबीन बानो ऊर्फ मीना कुमारी की जोड़ी हिन्दी सिनेमा में गुरूदत्त, राजकुमार और देवानंद के साथ बेहद सुन्दर बनी.

उन्होंने बेहतरीन किरदार जिए: 

कौन भूल सकता है साहिब, बीबी और गुलाम की ‘छोटी बहू’ को या फिर पाकीजा की ‘माहजबीन’ या मेरे अपने की ‘आनंदी देवी’ को । गुरूदत्त के साथ 1962 में आई साहिब , बीबी और गुलाम के लिये उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला. उन्होंने बैजू बावरा, परिणिता और काजल के लिये भी यह पुरस्कार जीता. मीना कुमारी ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत बाल कलाकार के रूप में वर्ष 1939 में ‘लैदरफेस’ से की थी, लेकिन एक अदाकारा के तौर पर उन्हें पहचान वर्ष 1952 में आई फिल्म ‘बैजूबावरा’ से मिली. उन्होंने ‘परिणीता’ (1953), ‘एक ही रास्ता’ (1956), ‘शारदा’ (1957), शरारत (1959) ‘कोहिनूर’ (1960), ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ (1960), साहिब बीबी और ग़ुलाम (1962), सांझ और सवेरा (1964) फूल और पत्थर’ (1966) जैसी तमाम हिट फिल्में दी. बेहतरीन अदाकारी के दम पर ही आज उन्हें हिंदी सिनेमा की महिला गुरु दत्त और भारतीय सिनेमा की सिंड्रेला कह कर संबोधित किया जाता है.

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, 
धज्जी-धज्जी रात मिली। 
जिसका जितना आंचल था, 
उतनी ही सौग़ात मिली।। 

मीना कुमारी की आखिरी फिल्म वर्ष 1972 में आई ‘पाकीजा’ (1972)  मानी जाती है,  जो अदाकारा के अचानक निधन के बाद एक हिट साबित हुई. पर उनकी आखिरी फिल्म गोमती के किनारे थी. जब मीना कुमारी का देहांत मुंबई के एक अस्पताल में हुआ तो वे जीवन में नितांत अकेली थीं और पैसे पैसे को मोहताज़. लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए हॉल में उमड़ने लगे और देखते ही देखते पाकीजा सुपर हिट फिल्म साबित हुई. पर अफ़सोस उस सफलता का आनंद लेने के लिए न मीना कुमारी जीवित थीं और न ही इस फिल्म के अमर धुनों के संगीतकार गुलाम मुहम्मद, जिनका देहांत फिल्म के निर्माण के दौरान ही हो गया और बची धुनों को नौशाद ने पूरा किया था.  उनका निधन महज 38 वर्ष की आयु में 31 मार्च 1972 को हो गया था.

राह देखा करेगा सदियों तक, 
छोड़ जाएंगे यह जहां तन्हा !!

उनके निभाये फिल्मी किरदारों की तरह उनका असल जीवन भी किसी ट्रेजेडी से कम नहीं रहा. खुद से उम्र में काफी बड़े कमाल अमरोही के साथ उनका वैवाहिक संबध सफल नहीं रहा. फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही से विवाह किया व लिखा की ‘ दिल सा जब साथी पाया, बैचेनी भी वो साथ ले आया’, लेकिन विवाह के 6 बरस बाद ही तलाक हो गया तब मीना ने लिखा, ‘तलाक तो दे रहे हो, नज़र कहर के साथ; जवानी भी मेरी लौटा दो मेहर के साथ’. मीना कुमारी अपने पूरे जीवन में सच्चे प्यार के लिए तरसती ही रही. धर्मेन्द्र, राजेंद्र कुमार, राजकुमार, गुलज़ार  .. पर किसी सम्बन्ध में स्थायित्व न रहा. उनके साथी कलाकारों ने उन्हें अपने करियर में उठान के लिए उनका इस्तेमाल किया. सब आगे बढ़ गए, मीना कुमारी पीछे रह गयीं.

न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन, 
बड़े क़रीब से उठकर चला गया कोई !!

प्रेम संबंधों में असफलताओं ने मीना कुमारी को तनहा कर दिया और वे टूट गयीं. इस तन्हाई से निकलने के लिए उन्होंने खुद को शराब में डुबो लिया. वे अपने बाथरूम में भी डेटोल की शीशी में शराब भर कर रखती थी. पर शराब से उन्हें सुकून तो न मिला, अलबत्ता वे अपना करियर, सौन्दर्य और अंत में अपना जीवन भी गंवा बैठीं.

अपने अन्दर महक रहा था प्यार– 
ख़ुद से बाहर तलाश करते थे !!

मीना  कुमारी के पिता मास्टर अली बक्स पारसी थियेटर के जानेमाने नाम थे. वह मूल रूप से भेड़ा के रहने वाले थे, जो अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में है. अदाकारा की मां इकबाल बेगम ऊर्फ प्रभावती देवी भी विवाह से पहले ‘कामिनी’ के नाम से स्टेज कार्यक्रम, नृत्य और अदाकारी किया करती थीं.

मिल गया होगा अगर कोई सुनहरी पत्थर  
अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा !!

उनकी वसीयत के मुताबिक प्रसिद्ध फ़िल्मकार और लेखक गुलज़ार को मीनाकुमारी की 25 निजी डायरियां प्राप्त हुईं. उन्हीं में लिखी नज़्मों, ग़ज़लों और शे’रों के आधार पर गुलज़ार ने मीनाकुमारी की शायरी का एकमात्र प्रामाणित संकलन तैयार किया गया.  विनोद मेहता ने मीना कुमारी की बायोग्राफी लिखी, जो काफी प्रसिद्द हुई. विनोद मेहता आगे चलकर आउटलुक पत्रिका के सम्पादक बने.

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