इस समय वह शहर उदास है : युवा कवि रोहित ठाकुर की कवितायेँ

आईये आज आपका परिचय युवा प्रतिभाशाली कवि रोहित ठाकुर से करवाते हैं. रोहित ठाकुर ने राजनीति शास्त्र में एमए किया है. सम्प्रति वे पटना में रहते हैं. उन्होंने कई कवि सम्मेलनों में अपनी कवितायेँ पढ़ी हैं और साथ ही अनेक पत्र पत्रिकाओं में उनकी कवितायेँ छपी हैं. पढ़िए यहाँ उनकी कुछ बेहतरीन कवितायेँ 

पत्राचार :- जयंती- प्रकाश बिल्डिंग, काली मंदिर रोड,
संजय गांधी नगर, कंकड़बाग , पटना-800020, बिहार
मोबाइल नंबर-  9570352164
ई-मेल पता-  rrtpatna1@gmail.com

 

______इस समय वह शहर उदास है    ______

शहर अपने गर्दन तक धुंध में लिपटी है

और उसका मफलर

जिस पर बहुत से फूल काढ़े गये थे

ओस की नदी में बह गयी है

 

शहर के कोतवाल ने

चिड़ियों को तड़ीपार कर दिया है

आसमान में जैसे कर्फ्यू लगा है

न पड़ोस से कोई आदमी आता-जाता है

न पड़ोस की छत से कोई चिड़िया

 

आधा शहर खाली है

इस शहर का मरद लोग

फिर मिलेंगे कह कर

किसी दूसरे शहर में मजूरी करने गया है

 

शहर के घरों की किवाड़

जो अक्सर बंद रहती है

किसी के आने की अटकलें लगाता है

खाली आंगन और खाली घर के बीच

बंद किवाड़ हवा में महसूस करता है

सूली पर चढ़ा होना

 

घर की दीवार पर

किसी औरत ने बनाया है

एक चिड़िया का चित्र

यह दुख में सुख का आविष्कार है

 

औरत किसी उदास शहर को

ऐसे ही बचा लेती है   ।।

 

 

____________    धुंध    _____________

 

धुंध में तैर रहे हैं चेहरे

धुंध एक समुद्र की तरह है

धुंध में हिल रहे हैं हाथ

धुंध एक समुद्र की तरह है

धुंध में खो रही है रोशनी

धुंध एक समुद्र की तरह है

धुंध में कोई दिवार खड़ी है

धुंध एक समुद्र की तरह है

धुंध में खो गयी है रेलगाड़ी

धुंध एक समुद्र की तरह है

धुंध खेल रही है आँख मिचौली

धुंध एक समुद्र की तरह है

धुंध लौट रही है

धुंध एक समुद्र की तरह है

वह हर कुछ जो लौटता है

समुद्र की तरह नहीं होता

खाली हाथ घर लौटता आदमी

लौट कर भी नहीं लौटता

उसकी आँखों में धुंध लौटती है

धुंध का घर एक खाली होता आदमी है

एक खाली होते आदमी के आँख की चमक

धुंध ही बहा कर ले जाती है

धुंध एक समुद्र की तरह है     ।।

 

 

 

________     धूप में औरत     ________

 

धूप सबकी होती है

धूप में खड़ी औरत

बस यही सोचती है

पर उसे तो जीवन – काल में

संतुलन बनाए रखना है

अपनी इच्छाओं और वृहत्तर संसार के बीच

इस लिये औरत धूप में

बिल्कुल सीधी खड़ी होती है

मार्क्स की व्याख्या में

औरत सर्वहारा होती है

इस युग की धूप औरत के लिये नहीं है

पर धूप में खड़ी औरत यह नहीं जानती है

वह तो सीधी खड़ी होकर

किसी और के हिस्से की

धूप को बचाना चाहती है

किसी और के हिस्से की धूप को बचाती औरत

की परछाई  दिवार पर सीधी पड़ती है

दिवार पर औरत की सीधी पड़ती परछाई

दूर से घंटाघर की घड़ी की सुई की तरह लगती है

और पास से सारस की गर्दन की तरह

पर धूप में खड़ी औरत यह नहीं जानती है      ।।

 

 

_____  बसें   ____

 

कितनी बसें हैं जो छूटती है

इस देश में

कितने लोग इन बसों में चढ़ कर

अपने स्थान को छोड़ जाते हैं

हवा भी इन बसों के अंदर पसीने में बदल जाती है

इन बसों में चढ़ कर जाते लोग

जेल से रिहा हुए लोगों की तरह भाग्यशाली नहीं होते

ये लोग मनुष्य की तरह नहीं सामान की तरह यात्रा में हैं

ये लोग एक जैसे होते हैं

मामूली से चेहरे / कपड़े / उम्मीद के साथ

जिस शहर में ये लोग जाते हैं

वह शहर इनका नाम नहीं पुकारता

भरी हुई बसों में सफर करता सर्वहारा

नाम के लिए नहीं मामूली सी नौकरी के लिए शहर आता है

ये बसें यंत्रवत चलती है

जिसके अंदर बैठे हुए लोगों के भीतर कुछ भींगता रहता है

कुछ दरकता सा रहता है  ।।

 

 

 

गोली चलाने से पलाश के फूल नहीं खिलते

बस सन्नाटा टूटता है

या कोई मरता है

 

तुम पतंग क्यों नहीं उड़ाते

आकाश का मन कब से उचटा हुआ-सा है

तुम मेरे लिए ऐसा घर क्यों नहीं ढूंढ़ देते

जिसके आंगन में सांझ घिरती हो

बरामदे पर मार्च में पेड़ का पीला पत्ता गिरता हो

 

तुम नदियों के नाम याद करो

फिर हम अपनी बेटियों के नाम किसी अनजान नदी के नाम पर रखेंगे

तुम कभी धोती-कुर्ता पहनकर तेज कदमों से चलो

अनायास ही भ्रम होगा दादाजी के लौटने का

 

तुम बाजार से चने लाना और

ठोंगे पर लिखी कोई कविता सुनाना   ।।

 

 

 

चाँद पर गुरुत्वाकर्षण बल कम है 

इस धरती पर देखो

कितना गुरुत्वाकर्षण बल है

इसे तुम विज्ञान की भाषा में

नहीं समझ सकते

कितने लोग हैं जिनकी चप्पलें

इस धरती पर घिसती है

कितने लोग हैं जो पछाड़ खा कर

इसी घरती पर गिरते हैं

कितने लोग हैं जिनके बदन से छीजता

पसीना इस धरती का नमक है

कितने लोग हैं जो थक कर चूर हैं

और इस धरती पर लेटे हुए हैं

कितने लोग हैं जो इस धरती

पर गहरी चिंता में डूबे हैं

वे जो प्रेम में हैं

और वे जो घृणा में हैं

इसी धरती पर हैं

कितने लोग हैं जो

आशाओं से बंधे हैं

कितने लोग हैं जो

किसी की प्रतीक्षा में हैं

इस धरती का जो

गुरुत्वाकर्षण बल है

यह इन सबका ही

सम्मिलित प्रभाव है    ।।

 

 

_____   गिनती  _____

 

गिनती गिनना आसान होता है

एक बच्चा भी

गिन सकता है गिनती

यह उन लोगों के लिये

आसान नहीं होता

जिन्हें कभी गिना ही नहीं गया

वह पहला आदमी

जिसे गिना नहीं गया

वह अंतिम आदमी

जो गिनती से बाहर है

उसका चेहरा नीला पड़ चुका है

नीले आकाश का नीलापन

उसके सामने फ़ीका है

गिनती का गणित

इस गणतंत्र का

शोक गीत है

गिनती से बाहर कर दिये गये

लोगों के लिये

जो लगा रहे गोता

लौट रहे खाली हाथ

उनके शरीर से बहता पसीना

गिनती में शामिल लोगों के लिये

शहद है      ।।

 

 


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