बिहार की राजनीति के बाहुबली जिन्होंने कभी राज्यनीति को प्रभावित किया था

Balendushekhar Mangalmurty, Editor in Chief, marginalised.in

बिहार के सामंती समाज में अपराध  सामाजिक वर्चस्व का औजार है. यहाँ हर जाति के अपने अपराधी रहे हैं. उनके समुदाय ने उन्हें नायक का दर्जा दिया, उनका महिमामंडन किया है. लंबे समय तक बिहार की संपन्न सवर्ण जातियों के बीच सामाजिक हैसियत को लेकर लड़ाई ठनी रही उनके बीच से दबंग नायक निकलते रहे, जिनका एक मकसद सरकारी ठेके हथियाना भी था. राज्य में खेती के अलावा आर्थिक समृद्धि के दूसरे स्रोत कम होने के चलते सड़कों का ठेका, दारू या बस चलाने की परमिट की छीनाझपटी चलती रही. हालांकि बिहार में शराबबंदी ने दबंगई का एक बहुत बड़ा रास्ता बंद कर दिया. कृषि कार्य में मजदूरों को उचित मजदूरी और बाकी सहूलियतों से दूर रखने के लिए भी दबंगई जरूरी थी. मजदूरों में राजनीतिक चेतना आने लगी तो उनके संगठन बनने लगे और भूमिपति भी अपनी सेना बनाने लगे. उनके बीच के आपराधिक तत्वों को समाज की स्वीकृति पहले की तरह मिलती रही.

जेपी आंदोलन ने इस स्थिति पर कुछ चोट की. सत्ता बदली तो एक-दो पिछड़ी जातियों की राजनीतिक हैसियत बढ़ी, लेकिन मंडल आंदोलन के बाद समीकरण पूरी तरह उलट गया. इस आंदोलन से एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन आया। पिछड़े, दलितों और अल्पसंख्यकों की एकजुटता पर आधारित पॉलिटिक्स राज्य पर हावी हुई. उनकी सामाजिक हैसियत पहले ही बदल चुकी थी, राजनीतिक ताकत मिलने से उस पर मुहर लग गई. अब इन जातियों ने भी सवर्णों की तरह अपनी धमक कायम करने के लिए अपराध का सहारा लिया. उन्होंने समाज में अपनी हैसियत का दिखावा शुरू किया, लेकिन इससे राज्य में संतुलन की स्थिति बनी. जातीय संघर्ष कम हुए. फिर नीतीश जैसे नेता सामने आए जिन्होंने बिहार का राजनीतिक समीकरण बदलने की कोशिश की. उन्होंने यह संदेश दिया कि सामाजिक न्याय का असली मकसद तभी पूरा होगा जब राज्य खुशहाल हो. नीतीश ने अपराध और राजनीति का रिश्ता तोड़ने की कोशिश की. चुनौतियाँ कम नहीं थीं. मुश्किल यह है कि नीतीश के अलावा किसी भी पिछड़े या दलित नेता में यह विजन नहीं कि वह राजनीति  को अपराध में मुक्त करने के बारे में सोच भी सके.

तो आईये कुछ ऐसे ही बाहुबलियों के बारे में जाने जो कभी अपराध की दुनिया में बेताज बादशाह हुआ करते थे और अपने रसूख को बरकरार रखने के लिए राजनीति का चोला ओढ़े बैठे थे लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता गया हालात भी बदलते चले गए. आज कुछ नेता जेल की सलाखों के पीछे अपने गुनाहों की सजा काट रहे हैं तो कुछ  का जलवा फीका पड़ा है:

शहाबुद्दीन हैं बाहुबलियों की लिस्ट में नबंर वन


क्राइम से राजनीति में पैर जमाने वाले पुराने तेजाब कांड में जेल से छुटा है। शहाबुद्दीन ने छोटी उम्र में ही अपराध की दुनिया में कदम रख दिया था। जल्द ही लालू का दामन पकड़कर वह राजनीति में भी उतर आया। शहाबुद्दीन की खबरें तब फैली, जब उन्होंने राजद नेता को गिरफ्तार करने आए पुलिस अफसर को थप्पड़ जड़ दिया था. इसके बाद भारी अमले के साथ उसे पकड़ने पहुंची पुलिस और उसके गुर्गों के बीच घंटों गोलाबारी हुई थी. जिसमें दो पुलिसकर्मियों समेत दस लोग मारे गए थे. हालांकि तब भी शहाबुद्दीन पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके थे.  नीतीश सरकार आने के बाद उन्हें  जेल भेजा गया.

राबड़ी देवी जब बिहार के मुख्यमंत्री थीं तो शहाबुद्दीन बिहार के सुपर अपराधी सीएम हुआ करते थे. जैसे ही लालू शासन का अंत हुआ शहाबुद्दीन के आतंकी समराज की उल्टी गिनती शुरू होने लगी और कुछ ही दिनों में लालू के खास कहे जाने वाले शहाबुद्दीन पुलिस के शिकंजे में कैद हो गये. उनके  खिलाफ जमीन विवाद को लेकर तीन भाइयों की तेजाब से नहलाकर हत्या का आरोप था. इसी आरोप में हाईकोर्ट ने उसकी उम्र कैद की सजा बरकरार रखी है। फिलहाल वे  सीवान से निकलकर दिल्ली के तिहाड़ जेल में कैद हैं  और अपने गुनाहों की सजा काट रहे है.

कौन है मोहम्मद शहाबुद्दीन
शहाबुद्दीन एक ऐसा नाम है जिसे बिहार में हर कोई जानता है. मोहम्मद शहाबुद्दीन का जन्म 10 मई 1967 को सीवान जिले के प्रतापपुर में हुआ था. उन्होंने अपनी शिक्षा दीक्षा बिहार से ही पूरी की थी. राजनीति में एमए और पीएचडी करने वाले शहाबुद्दीन ने हिना शहाब से शादी की थी. उनका एक बेटा और दो बेटी हैं. शहाबुद्दीन ने कॉलेज से ही अपराध और राजनीति की दुनिया में कदम रखा था. किसी फिल्मी किरदार से दिखने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन की कहानी भी फिल्मी सी लगती है. उन्होंने कुछ ही वर्षों में अपराध और राजनीति में काफी नाम कमाया.

अपराध की दुनिया में पहला कदम
अस्सी के दशक में शहाबुद्दीन का नाम पहली बार आपराधिक मामले में सामने आया था. 1986 में उनके खिलाफ पहला आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ था. इसके बाद उनके नाम एक के बाद एक कई आपराधिक मुकदमे लिखे गए. शहाबुद्दीन के बढ़ते हौंसले को देखकर पुलिस ने सीवान के हुसैनगंज थाने में शहाबुद्दीन की हिस्ट्रीशीट खोल दी.  ए श्रेणी का हिस्ट्रीशीटर घोषित कर दिया गया. छोटी उम्र में ही अपराध की दुनिया में शहाबुद्दीन जाना माना नाम बन गया. उनकी ताकत बढ़ती जा रही थी.

राजनीति में शहाबुद्दीन का उदय
राजनीतिक गलियारों में शहाबुद्दीन का नाम उस वक्त चर्चाओं में आया जब शहाबुद्दीन ने लालू प्रसाद यादव की छत्रछाया में जनता दल की युवा इकाई में कदम रखा. राजनीति में सितारे बुलंद थे. पार्टी में आते ही शहाबुद्दीन को अपनी ताकत और दबंगई का फायदा मिला. पार्टी ने 1990 में विधान सभा का टिकट दिया. शहाबुद्दीन जीत गए. उसके बाद फिर से 1995 में चुनाव जीता. इस दौरान कद और बढ़ गया. ताकत को देखते हुए पार्टी ने 1996 में उन्हें लोकसभा का टिकट दिया और शहाबुद्दीन की जीत हुई. 1997 में राष्ट्रीय जनता दल के गठन और लालू प्रसाद यादव की सरकार बन जाने से शहाबुद्दीन की ताकत बहुत बढ़ गई थी.

आतंक का दूसरा नाम बन गए थे शहाबुद्दीन
2001 में राज्यों में सिविल लिबर्टीज के लिए पीपुल्स यूनियन की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि राजद सरकार कानूनी कार्रवाई के दौरान शहाबुद्दीन को संरक्षण दे रही थी. सरकार के संरक्षण में वह खुद ही कानून बन गए थे. सरकार की ताकत ने उन्हें एक नई चमक दी थी. पुलिस शहाबुद्दीन की आपराधिक गतिविधियों की तरफ से आंखे बंद किए रहती थी. शहाबुद्दीन का आतंक इस कदर था कि किसी ने भी उस दौर में उनके खिलाफ किसी भी मामले में गवाही देने की हिम्मत नहीं की. सीवान जिले को वह अपनी जागीर समझते थे. जहां उनकी इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था.

पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी रहे निशाने पर
ताकत के नशे में चूर मोहम्मद शहाबुद्दीन इतना अभिमानी हो गए थे कि वह पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को कुछ नहीं समझते थे. आए दिन अधिकारियों से मारपीट करना उनका शगल बन गया था. यहां तक कि वह पुलिस वालों पर गोली चला देते थे. मार्च 2001 में जब पुलिस राजद के स्थानीय अध्यक्ष मनोज कुमार पप्पू के खिलाफ एक वारंट तामील करने पहुंची थी तो शहाबुद्दीन ने गिरफ्तारी करने आए अधिकारी संजीव कुमार को थप्पड़ मार दिया था. और उनके आदमियों ने पुलिस वालों की पिटाई की थी.


पुलिस और शहाबुद्दीन समर्थकों के बीच गोलीबारी

मनोज कुमार पप्पू प्रकरण से पुलिस महकमा सकते में था. पुलिस ने मनोज और शहाबुद्दीन की गिरफ्तारी करने के मकसद से शहाबुद्दीन के घर छापेमारी की थी. इसके लिए बिहार पुलिस की टुकड़ियों के अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद भी ली गई थी. छापे की उस कार्रवाई के दौरान दो पुलिसकर्मियों समेत 10 लोग मारे गए थे. पुलिस के वाहनों में आग लगा दी गई थी. मौके से पुलिस को 3 एके-47 भी बरामद हुई थी. शहाबुद्दीन और उसके साथी मौके से भाग निकले थे. इस घटना के बाद शहाबुद्दीन पर कई मुकदमे दर्ज किए गए थे.

सीवान में चलती थी शहाबुद्दीन की हुकूमत
2000 के दशक तक सीवान जिले में शहाबुद्दीन एक समानांतर सरकार चला रहे थे. उनकी एक अपनी अदालत थी. जहां लोगों के फैसले हुआ करते थे. वह खुद सीवान की जनता के पारिवारिक विवादों और भूमि विवादों का निपटारा करते थे. यहां तक के जिले के डॉक्टरों की परामर्श फीस भी वही तय किया करते थे. कई घरों के वैवाहिक विवाद भी वह अपने तरीके से निपटाते थे. वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कई जगह खास ऑपरेशन किए थे. जो मीडिया की सुर्खियां बन गए थे.

जेल से लड़ा चुनाव, अस्पताल में लगाया था दरबार
1999 में एक सीपीआई (एमएल) कार्यकर्ता के अपहरण और संदिग्ध हत्या के मामले में शहाबुद्दीन को लोकसभा 2004 के चुनाव से आठ माह पहले गिरफ्तार कर लिया गया था. लेकिन चुनाव आते ही शहाबुद्दीन ने मेडीकल के आधार पर अस्पताल में शिफ्ट होने का इंतजाम कर लिया. अस्पताल का एक पूरा फ्लोर उनके लिए रखा गया था. जहां वह लोगों से मिलते थे, बैठकें करते थे. चुनाव तैयारी की समीक्षा करते थे. वहीं से फोन पर वह अधिकारियों, नेताओं को कहकर लोगों के काम कराते थे. अस्पताल के उस फ्लोर पर उनकी सुरक्षा के भारी इंतजाम थे.

हालात ये थे कि पटना हाई कोर्ट ने ठीक चुनाव से कुछ दिन पहले सरकार को शहाबुद्दीन के मामले में सख्त निर्देश दिए. कोर्ट ने शहाबुद्दीन को वापस जेल में भेजने के लिए कहा था. सरकार ने मजबूरी में शहाबुद्दीन को जेल वापस भेज दिया लेकिन चुनाव में 500 से ज्यादा बूथ लूट लिए गए थे. आरोप था कि यह काम शहाबुद्दीन के इशारे पर किया गया था. लेकिन दोबारा चुनाव होने पर भी शहाबुद्दीन सीवान से लोकसभा सांसद बन गए थे. लेकिन उनके खिलाफ चुनाव लड़ने वाले जेडी (यू) के ओम प्रकाश यादव ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी. चुनाव के बाद कई जेडी (यू) कार्यकर्ताओं की हत्या हुई थी.

चंद्रशेखर हत्याकांड:

दबी हुई आवाज़ों को बचाने की अलख जगाने वाले चंद्रशेखर  ने जेएनयू के अध्यक्ष पद से हटने के बाद दिल्ली छोड़ दी और सीवान जाकर परिवर्तन का बिगुल फूंक दिया. सीवान पहुंचकर चंदू ने बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के ख़िलाफ़ उनके गढ़ में ही मोर्चा खोल दिया. उन्होंने बिहार की राजनीति में अपराध, बाहुबल, घोटालों और भ्रष्टाचार के मुद्दों को बहुत प्रमुखता से उठाया. जनता से उनको बेहतर प्रतिक्रिया मिल रही थी.

चंदू भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का सपना देख रहे थे और इसकी शुरुआत भी कर दी थी. बिहार में जनसंहारों और घोटालों के विरोध में 2 अप्रैल, 1997 को बंद बुलाया गया था. इस बंद के लिए 31 मार्च शाम चार बजे जेपी चौक पर एक नुक्कड़ सभा को संबोधित करते हुए चंदू और उनके सहयोगी श्याम नारायण को गोलियों से भून दिया गया. इस गोलीबारी में एक ठेलेवाले भुटेले मियां भी मारे गए.

चंद्रशेखर की हत्या के बाद भाकपा माले ने आरोप लगाया, ‘अब तक हमारे कई नेताओं कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है. श्याम नारायण और चंद्रशेखर की हत्या में राजद सांसद शहाबुद्दीन का हाथ है. वही सूत्रधार हैं. जिस समय हत्या हुई, हमारे कार्यकर्ता वहां पर मौजूद थे, जिन्होंने हत्यारों को पहचाना. वे शहाबुद्दीन के साथ के लोग थे. हत्या की वजह राजनीतिक है. हमारी पार्टी ने पिछले चुनाव में शहाबुद्दीन को सशक्त चुनौती दी थी. हमने चुनाव में अपराध के ख़िलाफ़ एजेंडा तैयार किया था. शहाबुद्दीन अपराध शिरोमणि हैं. अपराध को एजेंडा बनाने के बाद हमारे कार्यकर्ताओं पर चुन-चुनकर हमला हो रहा है.’

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने दिल्ली से राहत राशि के रूप में एक लाख रुपये का चेक भेजा तो चंदू की मां ने यह कहकर लौटा दिया कि ‘बेटे की शहादत के एवज में मैं कोई भी राशि लेना अपमान समझती हूं… मैं उन्हें लानतें भेज रही हूं जिन्होंने मेरे बेटे की जान की क़ीमत लगाई. एक ऐसी मां के लिए, जिसका इतना बड़ा बेटा मार दिया गया हो और जो यह भी जानती हो कि उसका क़ातिल कौन है, एकमात्र काम हो सकता है, वह यह है कि क़ातिल को सज़ा मिले. मेरा मन तभी शांत होगा महोदय. मेरी एक ही क़ीमत है, एक ही मांग है कि अपने दुलारे शहाबुद्दीन को क़िले से बाहर करो या तो उसे फांसी दो या फिर लोगों को यह हक़ दो कि उसे गोली से उड़ा दें.’

तत्कालीन सरकार से मांग की गई कि शहाबुद्दीन की संसद सदस्यता खारिज की जाए और बिहार आवास पर प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर गोली चलाने वाले साधु यादव को गिरफ़्तार किया जाए. प्रधानमंत्री गुजराल ने इन मांगों को अव्यवहारिक बताया. सांसद शहाबुद्दीन गिरफ़्तार हुए, लेकिन उनके ख़िलाफ़ ठोस सबूत और गवाह नहीं मिले. वे जमानत पर छूट गए.

अदालत में यह मामला 15 साल तक खिंचा. आख़िरकार बाहुबली नेताओं से संबंध रखने वाले तीन शार्प-शूटरों को उम्रक़ैद की सज़ा मिली. शहाबुद्दीन को जेल तो हुई लेकिन अन्य मामलों में.


हत्या और अपहरण के मामले में हुई उम्रकैद
साल 2004 के चुनाव के बाद से शहाबुद्दीन का बुरा वक्त शुरू हो गया था. इस दौरान शहाबुद्दीन के खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए. राजनीतिक रंजिश भी बढ़ रही थी. नवंबर 2005 में बिहार पुलिस की एक विशेष टीम ने दिल्ली में शहाबुद्दीन को उस वक्त दोबारा गिरफ्तार कर लिया था जब वह संसद सत्र में भागेदारी करने के लिए यहां आए हुए थे. दरअसल उससे पहले ही सीवान के प्रतापपुर में एक पुलिस छापे के दौरान उनके पैतृक घर से कई अवैध आधुनिक हथियार, सेना के नाइट विजन डिवाइस और पाकिस्तानी शस्त्र फैक्ट्रियों में बने हथियार बरामद हुए थे. हत्या, अपहरण, बमबारी, अवैध हथियार रखने और जबरन वसूली करने के दर्जनों मामले शहाबुद्दीन पर हैं. अदालत ने शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा सुनाई थी.

चुनाव लड़ने पर रोक
अदालत ने 2009 में शहाबुद्दीन के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. उस वक्त लोकसभा चुनाव में शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब ने पर्चा भरा था. लेकिन वह चुनाव हार गई. उसके बाद से ही राजद का यह बाहुबली नेता सीवान के मंडल कारागार में बंद है.

 

मोकामा के बाहुबली अनंत सिंह की कथा है अनंत:

कानून की किताब में शायद ही कोई ऐसी धारा बची हो जिसके तहत अनंत सिंह के नाम पर केस दर्ज न हो. अनंत सिंह पर ढाई दर्जन से अधिक संगीन मामले दर्ज हैं. इनमें कत्ल, अपहरण, फिरौती, डकैती और बलात्कार जैसे तमाम संगीन मामले शामिल हैं. अकेले सिर्फ बिहार के बाढ़ थाने में ही कुल 23 संगीन मामले दर्ज हैं. ये बात दीगर है कि अनंत सिंह अपने रसूख से इनमें से कई मामलों में बरी हो चुके हैं.

अनंत सिंह ने जुर्म की दुनिया के साथ साथ सियासी गलियारों में भी अपनी पैठ बढ़ाई और नीतीश कुमार के नजदीक आ गए. उनकी दोस्ती अनंत को बहुत रास आई और नवबंर 2005 में वो मोकामा से जेडीयू के टिकट पर चुनाव जीत गए. मोकामा के इस ‘डॉन’ की सरकार अलग ही चलती है. उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले भी सामने आए, लेकिन सरकार के दबाव के चलते पुलिस उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकी.

कोई नहीं कर सका बाल बांका
2005 में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ चुनाव लड़ने के दौरान नीतीश ने बिहार को अपराधियों से मुक्त करने का वादा तो किया लेकिन चुनाव जीतने के लिए अनंत का ही सहारा लिया. सत्ता में आने के बाद बिहार में 80,000 से ज्यादा अपराधियों को अदालतों की ओर से दोषी करार दिया गया. हजारों अपराधी जेल भेजे गए, जिनमें लालू प्रसाद का करीबी मोहम्मद शहाबुद्दीन भी शामिल था. लेकिन अनंत को छूने की हिम्मत किसी में नहीं हुई.

रेप और हत्या में सामने आया नाम 
2007 में एक महिला से बलात्कार और हत्या के मामले में उनके शामिल होने की बात सामने आई. जब इस संबंध में एक चैनल के पत्रकार ने उनसे सवाल किया तो बाहुबल के नशे में चूर विधायक ने उन्हें जमकर पीटा. मामले ने तूल पकड़ा और विधायक की गिरफ्तारी भी हुई. लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुप्पी साध ली. 2013 में उन पर पटना के पॉश पाटलिपुत्र कॉलोनी स्थित अपने होटल के सामने अतिक्रमण करने का आरोप भी लग चुका है.

विधायक बनते ही बढ़ गई संपत्ति 
विधायक बनने के पांच साल बाद ही अनंत सिंह की संपत्ति कई गुना बढ़ गई. 2005 में अनंत सिंह ने अपने चुनावी हलफनामे में 3.40 लाख रुपये की मामूली संपत्ति होने की घोषणा की थी, जो 2010 में बढ़कर 38.84 लाख रुपये तक पहुंच गई. अब तक सार्वजनिक तौर पर ऐसी कोई जानकारी सामने नहीं आई है कि उनसे कभी इस दुर्लभ तरीके से और तत्काल अमीर बनने के बारे में कोई सवाल किया गया हो.

लालू का घोड़ा लेकर मेले में पहुंचे! 
2007 में जानवरों के मेले में वह लालू यादव का घोड़ा लेकर पहुंचे थे. अनंत सिंह को पता था कि लालू उन्हें अपना घोड़ा नहीं बेचेंगे, इसलिए उन्होंने किसी और के जरिए घोड़ा खरीदा था. अजगर पालने जैसी अपनी सनक के लिए चर्चित ये विधायक पहले भी कई विवादों में फंस चुके हैं. मसलन, दूसरे की मर्सिडीज का मनमाने ढंग से दबावपूर्वक इस्तेमाल करना या फिर एक कार्यक्रम के दौरान हवाई फायरिंग करना भी उनके रिकॉर्ड में दर्ज है.

मर्सिडीज छोड़ चलाई घोड़ा-बग्‍गी 
अनंत ने पेट्रोल बचाने के लि‍ए अपने मर्सिडीज छोड़कर घोड़ा-बग्‍गी चलाई. हमेशा वि‍वादों में घि‍रे रहने वाले अनंत सिंह ने वि‍धानसभा जाने के लि‍ए घोड़ा-बग्‍गी का इस्‍तेमाल कि‍या. उनका कहना था कि उन्होंने अपने लि‍ए ये बग्‍गी दि‍ल्‍ली में बनवाई थी. इसे कुछ साल पहले घर मंगवाया. इसके बाद से लगातार वह घोड़ा-बग्‍गी ही चलते हैं. उनका कहना था कि इससे पेट्रोल की बचत होती है.

2004 में एसटीएफ से हो चुकी है मुठभेड़ 
अनंत सिंह के घर पर एसटीएफ ने 2004 में धावा बोला था. घंटों गोलीबारी हुई. गोली अनंत सिंह को भी लगी थी. लेकिन वो बच गए. हालांकि, इस एनकाउंटर में उनके आठ लोग मारे गए. इसके बाद उन्होंने घर को किले में तब्दील कर लिया. उन्होंने इस मकान में कुल 50 परिवारों को किराए पर रख लिया. जानते हैं क्यों? ताकि फिर कभी पुलिस या एसटीएफ उन पर धावा बोले तो ये परिवार उनके लिए ढाल का काम करे.

बाहुबली राज्बल्लभ यादव:

राजबल्लभ यादव राजद से विधायक है. फिलहाल वह नाबालिग लड़की से दुष्कर्म करने के आरोप में जेल में कैद है. लालू यादव की पार्टी में राजबल्लभ यादव की एक अपना अलग पहचान थी जिसे लोग बिहार के एक दबंग विधायक के रूप में जानते थे. इनके  नाम के आगे बाहुबली शब्द उस वक्त से जुड़ने लगा जब यह बिहार सरकार में मंत्री हुआ करते थे और राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री थी तभी अपने ड्राइवर का नाखून नोंच कर निर्मम हत्या करने के मामले में इसका नाम सामने आया था लेकिन इनके  रसूख के सामने उस वक्त की पुलिस ने घुटने टेक दिए और मामले को रफा-दफा कर दिया. जैसे ही बिहार में नीतीश कुमार की सरकार बनी और इन पर नाबालिग से दुष्कर्म करने के आरोप लगा, पुलिस ने सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया. फिलहाल वह जेल में बंद है.

 

 बिंदी यादव

बिंदी यादव, जो कभी छोटी-मोटी चोरी किया करता था लेकिन धीरे-धीरे उसकी अपराधियों से साठगांठ हुई और 90 के दशक में वह अपराध की दुनिया का बादशाह बन गया. उस वक्त बिहार में सुरेंद्र यादव, राजेंद्र यादव और महेश्वर यादव जैसे अपराधियों का बोलबाला था. जब प्रशासन के द्वारा इन सभी लोगों पर कार्रवाई की जाने लगी तो इसने राजनीतिक नेताओं का दरवाजा खटखटाया और लालू की पार्टी जॉइन कर ली जिसके बाद राजनीतिक संरक्षण में यह अपराधिक घटनाओं को अंजाम देने लगा. फिर वर्ष 2001 में गया जिला के जिला परिषद का निर्विरोध अध्यक्ष चुना गया और वर्ष 2010 में विधानसभा चुनाव भी लड़ा लेकिन चुनाव नहीं जीत पाया.  उसके ऊपर कुल 18 मामले दर्ज है. जिसके बाद राजद का दामन छोड़ उसने जदयू ज्वाइन की और इसके टिकट पर बिंदी यादव की पत्नी मनोरमा देवी एमएलसी बन गई लेकिन बेटे के एक कारनामे ने पूरे परिवार को जेल भिजवा दिया. साइड नहीं देने पर इसके बेटे रॉकी यादव ने आदित्य सचदेवा की गोली मारकर हत्या कर दी थी. यह मामला काफी चर्चित हुआ और पार्टी से भी उसे बेदखल कर दिया गया.

 

कोसी का आतंक आनंद मोहन

कोसी क्षेत्र के रहने वाले आनंद मोहन की छवि बाहुबली के रूप में चर्चित थी. राजनीति में आने से पहले इनके  ऊपर कई संगीन मामले दर्ज थे  फिर  वर्ष 1990 में राजनीति में एंट्री की थी और पहली बार विधायक बने थे. बिहार के दो बाहुबली आनंद मोहन और पप्पू यादव का टकराव पूरे देश में चर्चित रहा था. फिर 1994 में उनकी  पत्नी लवली आनंद ने वैशाली लोकसभा का उपचुनाव जीता  और राजनीति में अपनी धमाकेदार शुरुआत की. आनंद मोहन के अपराध की कहानी किसी से छुपी नहीं है. मामूली से विवाद में इन्होने  गोपालगंज के जिला अधिकारी की निर्मम हत्या कर दी थी और जेल चले गए थे. जेल से ही इन्होने  1996 में लोकसभा चुनाव समता पार्टी के टिकट पर लड़ा और जीत हासिल की और दो बार सांसद रहे. उनकी  पत्नी जो फिलहाल राजनीति में सक्रिय हैं , वह भी एक बार सांसद रही हैं. फिलहाल आनंद मोहन जेल में कैद होकर उम्र कैद की सजा काट रहे हैं.

 

कोशी क्षेत्र के रॉबिनहुड पप्पू यादव:

90 के दशक में अपनी दबंगई से खबरों में रहने वाले पप्पू यादव के खिलाफ 17 क्रिमिनल केस हैं. फिलहाल वह और उनकी पत्नी सांसद हैं. पप्पू यादव पर कानून का शिंकजा तब कसा गया जब उन्होंने  कम्यूनिस्ट पार्टी के विधायक अजीत सरकार की हत्या कर दी थी. इस आरोप में उन्हें  अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें  बरी कर दिया.

बात 1986-87 की है. उन दिनों लालू यादव अपने राजनीतिक जीवन के चढ़ाव पर थे. वह बिहार में विरोधी दल के नेता बनाना चाहते थे. उस समय उनके मकसद को कामयाब करने में एक शख्स ने उनकी सबसे ज्यादा मदद की थी. जी हां, उस शख्स का नाम पप्पू यादव है. बिहार में राजनीति और अपराध के बीच पनपे इस शख्स को बाहुबली के रूप में जाना जाता है. हालांकि वह अपनी इस छवि के लिए सीधे लालू को दोषी ठहराते हैं.

एक दैनिक अखबार को दिए इंटरव्यू में पप्पू कहते हैं, ‘मैं तो एक सीधा-सादा छात्र था. लालू का प्रशंसक था. उनको अपना आदर्श मानता था, लेकिन लालू मेरे साथ बार-बार छल करते गए. मुझे बिना अपराध किए ही कुर्सी का नाजायज फायदा उठाते हुए कुख्यात और बाहुबली बना दिया. जब लालू विरोधी दल का नेता बनना चाहते थे, उस समय इस दौड़ में अनूप लाल यादव, मुंशी लाल और सूर्य नारायण भी शामिल थे. मैं अनूप लाल यादव के घर में ही रहता था.

वह बताते हैं, ‘इसके बावजूद मैं लालू का समर्थन कर रहा था. मैंने नवल किशोर से बात कर लालू के लिए जमीन तैयार किया. लालू के नेता विरोधी दल बनने के अगले ही दिन पटना के सभी अखबारों में एक खबर प्रकाशित हुई कि कांग्रेस नेता शिवचंद्र झा की हत्या करने के लिए पूर्णिया से एक कुख्यात अपराधी पप्पू यादव पटना पहुंचा है. मैं इन सब से बेखबर था. मेरे एक मित्र नवल किशोर मुझे पटना विश्वविद्यालय के पीजी हॉस्टल ले गए.’

पप्पू कहते हैं कि वहां जाकर उनको पता चला कि वह एक कुख्यात अपराधी बन चुके हैं. वह आगे बताते हैं, ‘मैं एक ऐसा कुख्यात अपराधी था, जिसके खिलाफ तब तक किसी थाने में कोई केस तक नहीं दर्ज था. मैं तीन दिनों तक अपने एक मित्र गोपाल के कमरे में रहा. वहां से कोलकता गया. पुलिस मेरे पीछे पड़ गई. मेरे घर की कुर्की हो गई. मां-बाप को सड़क पर रात गुजारनी पड़ी. मेरे पिता लालू से मिले, लेकिन उन्होंने मदद से इनकार कर दिया.’

अजित सरकार हत्याकांड में मिली थी उम्रकैद 
बताते चलें कि माकपा के पूर्व विधायक अजित सरकार की 14 जून, 1998 को पूर्णिया में अज्ञात लोगों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी. इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई. अजित और पप्पू के बीच किसानों के मुद्दे पर मतभेद था. सीबीआई की विशेष अदालत ने 2008 में इस हत्याकांड में पप्पू यादव, राजन तिवारी और अनिल यादव को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. बाद में पटना हाईकोर्ट ने 2008 में पप्पू को रिहा कर दिया था.

फिल्मी है पप्पू और रंजीत की प्रेम कहानी 
पप्पू यादव और उनकी पत्नी रंजीत की प्रेम कहानी पूरी फिल्मी है. पटना की बांकीपुर जेल में बंद वह अक्सर जेल अधीक्षक के आवास से लगे मैदान में लड़कों को खेलते देखा करते थे. इन लड़कों में रंजीत के छोटे भाई विक्की भी थे. इसी दौरान विक्की से पप्पू की दोस्ती हो गई. एक दिन विक्की ने उनको अपनी फैमिली एलबम दिखाई. उसमें उनकी बहन रंजीत की टेनिस खेलती एक तस्वीर थी.

फोटो देखकर रंजीत पर हुए फिदा 
अपनी बायोग्राफी ‘द्रोहकाल का पथिक’ में पप्पू यादव ने अपने प्रेम कहानी का विस्तार से वर्णन किया है. वह लिखते हैं कि एलबम में रंजीत की फोटो देखकर उन पर फिदा हो गए. जेल से छूटने के बाद रंजीत से मिलने के लिए अक्सर टेनिस क्लब में पहुंच जाते थे. रंजीत को उनका आना अच्छा नहीं लगता था. उन्होंने पप्पू को कई बार मना किया, लेकिन वह वहां डटे रहे. इस बीच रंजीत की बेरूखी जारी रही.

प्यार में नाकामी पर खुदकुशी की कोशिश 
पप्पू यादव ने अपनी बायोग्राफी में लिखा है कि प्रेम में असफलता मिलती देख एक दिन परेशान होकर उन्होंने खुदकुशी करने की कोशिश की थी. इसके लिए उन्होंने ढेर सारी नींद की गोलियां खा ली. गंभीर हालत में उनको अस्पताल में भर्ती कराया गया. काफी दिनों बाद उनकी सेहत में सुधार हुआ. इस बीच रंजीत को उनके प्यार का अहसास हुआ और वह उनको चाहने लगी. लेकिन अब इस प्यार के बीच परिवार आड़े आ गया.

 

प्यार में बनी बात तो परिवार आया आड़े 
बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में पप्पू यादव ने बताया था कि रंजीत के पिता ग्रंथी थे. वह शुरू से ही उनकी शादी के खिलाफ थे. लेकिन पप्पू यादव के आनंद मार्गी पिता चंद्र नारायण प्रसाद और माता शांति प्रिया की ओर से कोई समस्या नहीं थी. वे दोनों इस शादी के पक्ष में थे. कांग्रेसी नेता एसएस अाहलूवालिया की मदद से पप्पू यादव रंजीत के परिवार को मनाने में सफल रहे. पूर्णिया के गुरुद्वारे में दोनों की धूमधाम से शादी हुई.

बहन डॉक्टर, बेटा क्रिकेटर 
पप्पू यादव के परिवार में उनके माता-पिता के अलावा एक छोटी बहन हैं, जो डॉक्टर हैं. उनके बहनोई फर्रुखाबाद में कई मेडिकल कॉलेज चलाते हैं. पप्पू का एक बेटा और एक बेटी है. बेटे सार्थक रंजन दिल्ली अंडर-19 क्रिकेट टीम के उप कप्तान हैं, जबकि उनकी बेटी दिल्ली में पढ़ती है. पप्पू को भरोसा है कि उनका बेटा एक दिन इंडिया के लिए जरूर खेलेगा. वह ऑलराउंडर है.

 

सुनील पांडे पर भी है कई आरोप

बिहार के चर्चित आरा सिविल कोर्ट बम ब्लास्ट के मामले में जेल में बंद तरारी विधानसभा के जदयू विधायक सुनील के खिलाफ पुलिस ने जांच पूरा करते हुए चार्जशीट फाइल कर दिया। इन पर मुख्य आरोपी लंबू शर्मा की मदद करने का आरोप है। इस मामले में सुनील पांडे पटना के बेउर जेल में बंद हैं।

हालांकि, ये पहला मामला नहीं है, जिसमें सुनील पांडे का नाम सामने आया है. इसके पहले रणवीर सेना सुप्रीमो ब्रह्मेश्वर मुखिया के हत्या के मामले में भी इनका नाम उछला था. इतना ही नहीं पटना के एक होटल में इन्होंने खुलेआम गोली मारने की धमकी भी दे दी थी. वहां मौजूद कई लोगों ने इनका  वीडियो बना लिया था.  इस वीडियो में वे ठोंक देने (गोली मारने) की बात कहते हैं.

अहिंसा में पीएचडी हैं सुनील पांडे

सुनील पांडे इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए बेंगलुरु गए थे, उसी दौरान मामूली विवाद में एक लड़के को चाकू मार दी और वापस लौट आए. इसके बाद से अपराध जगत में ये आगे बढ़ते चले गए. हालांकि, पढ़ाई से नाता कभी नहीं टूटा. सुनील अहिंसा में पीएचडी कर चुके हैं.

हुलास पांडे

हाल ही में बतौर विधानपार्षद राजनीति में पदार्पण किया. बिहार बाहुबली विधायक सुनील पांडे के भाई हैं. रणवीर सेना सुप्रीमो की हत्या के मामले में भी इनका नाम चर्चा में आया था, लेकिन पुष्टि नहीं हो सकी थी. बतौर निर्दलीय विधानपार्षद चुने गए, फिर जद (यू) से जुड़े. हाल ही में हुलास पांडे लोजपा से जुड़ गए हैं.

मुन्ना शुक्ला

दूसरे दबंग नेता और बाहुबली पूर्व विधायक का नाम है विधायक मुन्ना शुक्ला उर्फ विजय कुमार शुक्ला. अपनी आपराधिक रसूख को बढ़ाने के लिए मुन्ना शुक्ला ने भी राजनीति की शरण ली और बन गए बाहुबली विधायक.  इनपर गोपालगंज के जिलाधिकारी की हत्या समेत कई अन्य आपराधिक मामले इन पर चल रहे हैं.  वहीं, बिहार के पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के मामले में अदालत ने मुन्ना शुक्ला को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. जेल के अंदर रहते हुए जहां नर्तकी के डांस का लुत्फ उठाते हुए मीडिया में उनके फोटोग्राफ आए, तो कभी पीएचडी की डिग्री हासिल करने की खबर.

 

रामा सिंह

बिहार के इस दबंग राजनेता पर हत्या और बलात्कार समेत कई मामले दर्ज हैं. रामा सिंह रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा से जुड़े रहे हैं. बिहार के महनार से लोजपा के टिकट पर चुनाव भी जीते.

 

सूरज भान

तीस से अधिक जघन्य अपराधों में लिप्त होने वाले सूरजभान को हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद रामविलास पासवान उन्हें महान समाजसेवी बताने से नहीं चूकते हैं. सूरजभान अपनी रंगदारी के दम पर देश की संसद तक पहुंच चुके हैं. सांसद सूरजभान उर्फ सूर्या आठवें दशक में मोकामा में छिटपुट अपराध करते थे. नवें दशक में अपहरण, रंगदारी व हत्या जैसे कई संगीन अपराधों को लेकर अपराध की दुनिया में उनका ग्राफ बढ़ने लगा. शुरुवाती दिनों में सूरजभान के घर और परिवार की आर्थिक दशा भले ही खराब रही हो   सूर्या के चाल-  से उनके पिता रामनंदन सिंह और सीआरपीएफ में कार्यरत उनका भाई काफी    रहते थे। लकहने पर भी सूर्या ने अपनी दिशा नहीं बदली.  सूरजभान मूल रूप से मोकामा के शंकरबार टोला के निवासी हैं. कभी व्यावसायिक क्षेत्र माने  जाने वाले मोकामा में इनके पिता सरदार गुलजीत सिंह नामक एक व्यवसायी की दुकान पर काम किया करते थे. सूरजभान ने जब आपराधिक रास्ता अख्तियार कर मोकामा में रंगदारी और वसूली शुरू की तो इसी क्रम में उसने उस व्यवसायी से भी रंगदारी की मांग कर डाली, जिससे सूरजभान के परिवार का भरण-पोषण होता था.  पिता द्वारा य समझाने पर कि ‘डायन भी एक घर बख्शती है’ सूरजभान नहीं माने. मोकामा वासियों की मानें तो इस घटना से क्षुब्ध हो उनके पिता ने गंगा में छलांग लगा आत्महत्या कर ली.  इस घटना के कुछ दिन बाद सीआरपीएफ में कार्यरत उनके एकमात्र सहोदर भाई ने भी आत्महत्या कर ली, जबकि दो सौतेले भाई कन्हैया और चंदन फिलवक्त सूरजभान के साथ हैं और उनके साम्राज्य को संभालते हैं.  सूरजभान का नाम अपराध की दुनिया में 80 के दशक में तब उभरा जब मोकामा में कुख्यात नाटा सरदार से उनकी अदावत चली.  इस अदावत में कई लाशें गिरीं.  मोकामा बाजार पर वर्चस्व और वसूली को लेकर यह टकराव वर्ष 2000 तक जारी रहा. इस बीच उत्तर बिहार के डॉन माने जाने वाले अशोक सम्राट से भी सूरजभान का टकराव हुआ. अशोक सम्राट ने सूरजभान पर मोकामा में ही घातक हमला किया. इस हमले में पैर में गोली लगने के बावजूद सूरजभान तो बच गए पर उनका चचेरा भाई अजय और पोखरिया निवासी उनका शूटर मनोज मारा गया. अशोक सम्राट जब तक जिन्दा रहा सूरजभान मोकामा से बाहर नहीं आए.  हाजीपुर में पुलिस मठभेड़ में अशोक सम्राट के मारे जाने के बाद सूरजभान ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार शुरू कर दिया. इसी बीच सूर्यभान के चचेरे भाई मोती सिंह की कुख्यात नागा सिंह ने हत्या कर दी। जिसके बाद सूरजभान का मोकामा विधायक दिलीप सिंह से अदावत बढ़ी और उस दौर में अपराधियों के हो रहे राजनीतिकरण में सूरजभान जैसे एक और डॉन का नाम जुड़ गया.

 ब़ृजबिहारी प्रसाद

ब्रिजबिहारी प्रसाद लालू प्रसाद यादव के मंत्रिमंडल में तकनीकी शिक्षा मंत्री थे. मंत्री रहते इन पर राज्य के तकनीकी शिक्षण संस्थानों में लाखों रुपए लेकर सैकड़ों लड़कों का एडमिशन अवैध रूप से कराने को आरोप लगा था. बाद में मंत्री रहते हुए पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, शेखपुरा में उनकी हत्या कर दी गई. इसके पीछे श्री प्रकाश शुक्ला, देवेंद्र दुबे, छोटन शुक्ला का हाथ बताया गया. बृज बिहारी प्रसाद की पत्नी रमा देवी ने इनकी हत्या के बाद भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया और शिवहर जिला से लगातार सांसद चुनी जा रही हैं.

1995 से लेकर साल 2000 तक बिहार की सियासत में कई उलटफेर हुए. कई बाहुबली ‘शहीद’ हो गए तो कई लोगों ने सत्ता के साथ अपनी सियासी जमीन मजबूत बना ली. इस दौर में प्रभुनाथ सिंह, साधु यादव, तस्लीमुद्दीन, बूटन सिंह, प्रदीप महतो जैसे लोग भी परिस्थितियों के साथ ज्यादा मजबूत होते चले गए. जहां तक जनमत का मामला था तो इन बाहुबलिय़ों में ज्यादातर का अपने इलाके से बाहर प्रभाव उतना ज्यादा नहीं था. आनंद मोहन जरूर उस दौर में राजपूतों के सबसे बड़े नेता बनकर बिहार में उभर चुके थे.

चूंकि लालू खुद यादवों का नेतृत्व कर रहे थे लिहाजा पप्पू यादव को वो कुर्सी नहीं मिली, लेकिन कोसी के इलाके में पप्पू यादव ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली. शुक्ला खानदान की सियासत को आगे बढ़ाने का काम किया मुन्ना शुक्ला ने. 2000 आते-आते बिहार की राजनीति में नेता कम बाहुबली ज्यादा थे जो सीधे सक्रिय हो गए.

लालू के  खास बाहुबली रीत लाल यादव

आइए जानते हैं बिहार के दूसरे बाहुबली डॉन की कहानी जिसके नाम से पूरा राजधानी आज भी कांप जाता है लेकिन वह सलाखों के पीछे पिछले कई वर्षों से कैद है. नाम है रीत लाल यादव, इसकी भी अपराधिक छवि की उत्पत्ति 90 के दशक में हुई थी जब बिहार में लालू की सरकार थी. अपराध इसके लिए आम बात हो गई थी. चलते-चलते लोगों की हत्या करना और रंगदारी वसूलना और अपहरण मुख्य पेशा था. राजधानी पटना के कोथवां गांव के रहने वाले रीत लाल यादव कुछ ही वर्षों में अपराध की दुनिया में इतने चर्चित हो गये कि पूरा पटना उसके नाम से कांपने लगता था. इसके बाद उसने राजधानी पटना के दानापुर के रेलवे स्टेशन में अपना पैर जमाया तथा वहां होने वाली हर टेंडर पर कब्जा कर लिया. ऐसा कहा जाता है कि जिस किसी ने भी रीत लाल यादव के रेलवे पर अवैध कब्जे को लेकर आवाज उठाई वह आज इस दुनिया में नहीं है. रीत लाल यादव उस वक्त बिहार के चर्चित डॉन बन गये  जब दिनदहाड़े सत्यनारायण सिंह की निर्मम हत्या कर दी. जिसके बाद चलती ट्रेन में बिहार के दो रेलवे ठेकेदारों की हत्या से पूरे राजधानी मे रीत लाल यादव के नाम के आगे बाहुबली लगाया जाने लगा क्योंकि लालू प्रसाद के वह खास माने जाते थे.  यह दौर  काफी दिनों तक चला लेकिन जैसे ही बिहार में सरकार बदली उनके भी दुर्दिन शुरू हो गए,  फिर पुलिस ने उसको कई मामले में गिरफ्तार कर लिया.फिलहाल वह राजधानी पटना के बेऊर जेल मे बंद है और हर बार चुनाव लड़ते हैं  तथा जीत दर्ज होती है. रीतलाल यादव का रसूख आज भी उसके क्षेत्रों में कायम है. इसी का नतीजा है कि जब लालू यादव की बेटी पटना संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रही थी तो लालू यादव ने खुद उसके घर जाकर अपनी बेटी के लिए मदद मांगी थी.

 

 

सुरेंद्र यादव पर अब भी आधा दर्जन आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं

1990 और 2005 में सुरेंद्र प्रसाद यादव का गया में एकछत्र राज हुआ करता था. उसके बाद इनके प्रभाव में कमी आई पर रूतबा खत्म नहीं हुआ है. उस जमाने में यह लालू यादव के असली हनुमान हुआ करते थे. इनके ‘कर्मों’ को याद कर गया की जनता के तन-मन में आज भी सिहरन फैल जाती है. पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी तो इनकी ‘नेकी’ को चाहकर भी कभी भूल नहीं सकते हैं. मांझी 1991 लोकसभा चुनाव गया से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में लड़ रहे थे. लालू यादव के हनुमान ने मांझी के पक्ष में कार्यरत तात्कालिक कांग्रेस विधायक जयकुमार पालित की चुनाव के दिन मगही स्टाइल में ऐसी ‘खातिरदारी’ की थी कि दवाई करने वाले पीलग्रीम हास्पीटल के डाक्टरों को आज भी याद है.

सुरेंद्र यादव ने पुलिस कस्टडी से अतुल प्रकाश का अपहरण कर सूबे का नाम रोशन किया था. पुलिस रिकॉर्ड में देश की यह अनोखी घटना है. 14 दिसंबर, 2014 को अपने बॉडीगार्ड और ड्राइवर के साथ मिलकर गया बाजार में सरेराह एक तिलकुट व्यापारी की पिटाई की थी. इस घटना के खिलाफ शहर के चर्चित नागरिक संघर्ष मोर्चे ने जब आंदोलन किया था तब जाकर इनकी गिरफ्तारी हुई थी.

1985 में सुरेंद्र यादव जहानाबाद से पहली बार विधानसभा का चुनाव बतौर निर्दलीय लड़े और हार गए. बाद में वो गया जिले के नक्सली प्रभावित बेलागंज क्षेत्र शिफ्ट कर गए, जहां से वो लगातार 1990 से लेकर 2015 तक जीतते रहे हैं. 1998 में एक बार वो जहानाबाद से बतौर आरजेडी उम्मीदवार चुनाव जीते हैं.

अवधेश मंडल:

बिहार के रुपौल से सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड की विधायक और लगातार विवादों की वजह से सुर्खियों में रहने वाली बीमा भारती के बेटे का शव आज पटना में रेल ट्रैक पर मिला. बीमा भारती के पटना से लेकर पूर्णिया जिले के रुपौली आवास तक कोहराम मचा हुआ है. बदहवास बीमा भारती कह रही हैं कि हम्मर बेटा के मार देलकै (मेरे बेटे को मार दिया).

पुलिस अभी इस जांच में जुटी है कि बीमा भारती के 21 साल के बेटे ने आत्महत्या की है या फिर उसकी हत्या की गई हैं क्योंकि उसके शरीर पर चोट के कई निशान मिले हैं.

बीमा भारती जितनी बतौर विधायक और मंत्री चर्चा में रही हैं उससे कहीं ज्यादा वो अपने बाहुबली पति अवधेश मंडल से अपने बनते-बिगड़ते रिश्तों की वजह से मीडिया की सुर्खियां बनी हैं.

बीमा भारती बिहार में न सिर्फ मंत्री रह चुकी हैं बल्कि सीएम नीतीश कुमार की भी बेहद करीबी मानी जाती है. ऐसे में राजधानी पटना में सरेआम उनके बेटे का शव मिलना बिहार सरकार के सुशासन के दावों पर सवाल उठा रहा है।.पुलिस इस बात की भी जांच में जुटी है कि कहीं उसके पति अवधेश मंडल के दुश्मनों ने तो बेटे का निशाना नहीं बनाया.

अवधेश मंडल पर अपहरण, हत्या, जमीन कब्जा और फिरौती के कई आरोप और केस दर्ज हैं, फिर भी उनकी पत्नी बीमा भारती बिहार सरकार में मंत्री रही हैं.

अवधेश मंडल ने अपने बेटे की हत्या के लिए लिए अपने चंदन सिंह, शंकर सिंह, संतोष मंडल समेत कई लोगों को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा है कि उनके बेटे की हत्या पुरानी दुश्मनी को लेकर की गई है.

जेल से दिन दहाड़े फरार हो गया था अवधेश मंडल

अवधेश मंडल उस वक्त अचानक सुर्खियों में आ गये थे,  जब पूर्णिया के मरंगा थाने से उसके समर्थकों ने पुलिस के कब्जे से छुड़ा लिया और वह फरार हो गए. उस वक्त आरोप लगे थे कि बीमा भारती ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर उनको थाने से भगाने में मदद की थी.

जेल से ही धंधा चलाने का आरोप

अवधेश मंडल का जेल से किसी शख्स से बात करता हुआ वीडियो वायरल हो गया था जिसके बाद प्रशासन पर गंभीर सवाल उठे थे. वीडियो देखकर ऐसा लग रहा था कि अवधेश मंडल जेल से रंगदारी, फिरौती, जमीन कब्जा समेत कई काम कर रहे थे.  हालांकि डीएम ने वीडियो से पल्ला झाड़ लिया था.

महादलित के जमीन पर कब्जे में कई लोगों की गई थी जान

बीमा भारती के पति अवधेश मंडल पर रुपौली में ही महादलित समुदाय को आवंटित कई एकड़ जमीन पर कब्जा करने का भी आरोप लगा था. इस जमीन पर कब्जे को लेकर दो गुटों में काफी खूनी संघर्ष हुआ था जिसके कई लोगों की जान भी चली गई थी.

रणवीर यादव:

लक्ष्मीपुर-तौफीर दियारा नरसंहार आजीवन कारावास की सजा काट चुके रणवीर की सिक्का खगड़िया जिला में तूती बोलती है. रणवीर का जलवा इतना है कि सीएम नीतीश के सामने कार्बाइन बंदूक उठाकर लोगों की भीड़ को धमकाने से पीछे नहीं हटे थे. बाद में सीएम से लेकर पुलिस ने भी उन्हें क्लीन चिट दे दी थी.

बिहार की सबसे चर्चित सीटों में से एक खगड़िया बाहुबली रणवीर यादव के कारण 1990 से ही चर्चा में रही है. 2012 में यह इलाका उस समय और चर्चा में आया जब रणवीर ने सीएम नीतीश कुमार के सामने लोगों को राइफल लहराते हुए धमकाया और फायरिंग की. फुटेज और वीडियो होने के बाद भी वे इस मामले से बरी हो गए थे.

रणवीर की खगड़िया और इसके आसपास के इलाकों पर अच्छी पॉलिटिकल पकड़ और धाक है. इतना ही नहीं तौफीर दियारा नरसंहार में तो वे दोषी तक ठहराये जा चुके हैं, इसके अलावा उन पर रंगदारी, हत्या के प्रयास, लोगों को धमकाने सहित कई और आपराधिक आरोप और केस भी चल रहे हैं. सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि उन्होंने दो शादियां की हैं और दोनों ही पत्नियां पॉलिटिक्स में हैं.

रणवीर इतने पाॅवरफुल हैं कि उनकी लालू से लेकर नीतीश तक पहुंच है. एक समय था जब वे लालू के काफी करीबी माने जाते थे. आज वे नीतीश कुमार के करीबी हैं. उनकी पहली पत्नी और विधायक पूनम यादव को जेडीयू ने लगातार दूसरी बार टिकट दिया है.

कौन हैं रणवीर यादव ?

बाहुबली रणवीर यादव 1990 में पहली बार निर्दलीय के रूप में खगड़िया से विधायक बने थे. इसके पहले लक्ष्मीपुर-तौफीर दियारा नरसंहार में उनका नाम सामने आया था.

नरसंहार केस में मिली थी उम्रकैद

लक्ष्मीपुर-तौफीर दियारा नरसंहार में नौ लोगों की हत्या कर दी गई थी. 1985 में हुए इस हत्याकांड का सीधा आरोप बाहुबली रणवीर यादव पर लगा था. बाद में कोर्ट ने भी उन्हें इस केस में दोषी पाया था और उम्रकैद की सजा सुनाई थी.

 

कई और भी बाहुबली हैं, जिनका सितारा या तो अस्त हो गया है, या उनकी चमक फीकी पड़ गयी है. पर बिहार की राजनीति कब बाहुबलियों से मुक्त होगी, ये सिर्फ बिहार का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व तय नहीं करेगा, कर भी नहीं पायेगा. इसे तय करेगी बिहार की जनता कि वो अपने लिए कैसे प्रतिनिधियों को चुनती है. फिलहाल तो बिहार के सामंती समाज में ये दूर की कौड़ी लगती है.


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