ब्रजेश ठाकुर और जर्मन शेफ़र्ड (मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड)

संजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार 

# मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड से बिहार सरकार, मीडिया और मुजफ्फरपुर नगरवासियों ने स्वीकार किया है कि वे शर्मसार है। घटना से आहत हैं। यही नहीं पूरा देश शर्मसार हुआ है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वीकारा कि वे शर्मसार है। लेकिन, ब्रजेश ठाकुर के परिवार के लोग इस घटना से जुड़ी पीड़ित बच्चियों की दर्द भरी दास्तान से शर्मसार नहीं हैं। शर्मसार नहीं होने वालों में ब्रजेश ठाकुर का जर्मन शेफर्ड और गली के कुत्ते भी शामिल हैं।

1जून को इस कांड में ब्रजेश ठाकुर की गिरफ्तार के बाद जब-जब पुलिस, मीडिया, सीबीआई और अन्य जांच टीम बालिका गृह, प्रातःकमल अखबार और ब्रजेश ठाकुर के घर (सभी एक ही परिसर में हैं) आयी तब-तब आम और जर्मन शेफर्ड कुत्ते सोते दिखे। कभी-कभी धीरे से आंख खोल देख लेते लेकिन अपने स्वभाव के अनुरूप भूंकते तक नहीं, उन्हें भी पता चल गया था कि उनका मालिक जेल में हैं और भूंकते हैं तो पोल खुल जायेगी कि बच्चियों की चीखों और उन्हें पीड़ा देने वालों को नजरअंदाज क्यों किया?

6अग्रस्त को जब सीबीआई और अन्य जांच एजेंसी आई तो ब्रजेश ठाकुर का जर्मन शेफर्ड और गली के कुत्ते में कोई हरकत नहीं दिखी। सील बालिका गृह की सीढ़ी के पास काला-सफेद रंग का कुत्ता घोड़ा बेच सो रहा था तो वहीं बरामदे में सोफे के पास देशी एवं जर्मन शेफर्ड भी। परिसर में मीडियाकर्मियों की चहलकदमी का कोई असर उन पर नहीं था। कुत्ते पर चर्चा हुई तो एक पत्रकार ने कहा बालिका गृह के मामला सामने में आने के बाद एक दिन मीडियाकर्मी आये थे और उपर सीढ़ी पर चढ़ने के क्रम में एक पत्रकार का पैर कुत्ते की पूंछ पर पड़ गयी लेकिन वह हिला तक नहीं। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे बालिका गृह के रास्ते पर सोये कुत्ते को भी इसकी आदत पड़ी हुई थी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बालिका गृह की बच्चियों द्वारा खाना मांगे जाने पर मार पड़ती थी। भले ही बालिका गृह की बच्चियों को खाना नहीं मिलता हो लेकिन इन कुत्तों के लिए भात से भरे कटोरे जरूर रखे दिखे। रात होते ही आम कुत्ता हो या जर्मन शेफर्ड, चैकीदार की भूमिका में आ जाते। बालिका गृह कांड से जुड़े लोगों के आने-जाने पर ये कुत्ते अपना मुंह तक नहीं खोलते। अंजान व्यक्ति को देख भौंकने वाले कुत्ते शांत रहते थे।


घर की सुरक्षा के लिए जाली से घेरा बंदी है। बालिका गृह को पूरी तरह से सील, ताकि कोई परिंदा पर न मार सके। गजब की घेराबंदी। सन्नाटा ऐसा, मानों यह जगह कई रहस्यों को समेटे हुए है। जहां तक सुरक्षा का सवाल है तो, बालिका गृह की बच्चियों की सुरक्षा के लिए कोई खास व्यवस्था नहीं। स्थानीय लोग बताते हैं कि किसी को इस घटना की भनक तक नहीं लगी। ब्रजेश ठाकुर ने कुत्तों के हवाले सुरक्षा व्यवस्था कायम कर रखी थी। बालिका गृह का नजारा किसी जेल से कम नहीं है। ठाकुर का घर प्रवेश द्वारा से बायीं ओर है तो सामने प्रिंटिग प्रेस, उपर प्रातःकमल का प्रेस कार्यालय, दायीं ओर बरामदा के पहले एक सीढ़ी जो बालिका गृह जाती है, बाहर दीवार पर बालिका गृह का बोर्ड प्रिंट किया हुआ। प्रिंटिंग प्रेस के पीछे एक सीढ़ी है जो अंदर से बालिका गृह और भवन के अंदर जाती है। आगे से पूरी इमारत एक जेल की दीवार की तरह है। अजीब सा सन्नाटा। रात में ब्रजेश के कुत्ते जरूर सचेत हो जाते है। दरवाजा बंद होने से सिर्फ जर्मन शेफर्ड खूले में चौकीदार बनता वहीं गली में चौकीदार आम वे कुत्ते होते जो दिन में बालिका गृह के रास्ते पर जमे रहते थे


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