बस्ते का वजन न्यूनतम दो व अधिकतम 4.2 किलोग्राम होना चाहिए: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सिफारिश

बस्ते का वजन न्यूनतम दो व अधिकतम 4.2 किलोग्राम होना चाहिए.
पटना : व्यावसायिक मुनाफाखोरी के लालच में प्राइवेट स्कूलों ने अतिरिक्त किताबों  और दूसरी सामग्रियों से सामान्य बस्ते को  भारी-भरकम पिट्ठू में बदल रखा  है. अब राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने बस्ते का वजन कम करने की कवायद शुरू की है.
आयोग ने अपना प्रस्ताव एमएचआरडी के  पास भेज दिया है. प्रस्ताव में बस्ते का भार बच्चे के वजन का  10%  करने समेत अन्य कई सुझाव हैं. बिहार राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग  (बीएससीपीसीआर) की ओर से कहा गया है कि एनसीपीसीआर का  निर्देश मिलते ही राज्य में भी इस प्रस्ताव को सख्ती से लागू किया जायेगा.
सूत्रों के अनुसार बस्ते का वजन अधिक होने से बच्चों की सेहत और अभिभावकों  की जेब दोनों ही प्रभावित होती है. बस्ते का वजन न्यूनतम दो व अधिकतम 4.2 किलोग्राम होना चाहिए. प्राइवेट स्कूल एनसीइआरटी के  बदले प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबों को अहमियत देते हैं. इसी कारण बस्ते का वजन और अभिभावकों पर खर्च  का भार भी बढ़ जाता है.
– प्राइवेट पब्लिशरों की किताबें थोपने से बढ़ता है वजन :  अमूमन एक बच्चे के बस्ते में आठ किताबें और आठ कॉपियां होती हैं. – टिफिन, पेंसिल बॉक्स के बाद बस्ते का वजन अमूमन चार से छह किलो हो जाता है.
– वाटर बोतल का वजन अलग से होता है. – स्कूल संचालकों द्वारा प्राइवेट पब्लिशरों की किताबें थोपने की वजह से बढ़ता है वजन. – प्राइवेट किताबों की वजह से स्कूलों को मिलता है भरपूर कमीशन. – कई स्कूलों ने कैंपस में ही शुरू कर दी है किताबों की बिक्री. – एनसीइआरटी की किताबें पढ़ाई के लिए पर्याप्त होती हैं. – अनौपचारिक शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ी सामग्री का वजन अलग होता है. – इन सभी सामग्रियों को स्कूल या उसकी अधिकृत दुकानों से खरीदना पड़ता है.
– क्या हैं एनसीपीसीआर की सिफारिशें :  पाठ्य पुस्तकों को मासिक शिक्षण योजना के आधार  पर विभाजित करें.  – निचली कक्षाओं के लिए शिक्षा का अधिकार  अधिनियम, 2009 में बदलाव करें.  – मासिक सिलेबस के हिसाब से सभी विषयों की एक किताब हो.  – छपाई ग्लेज  के बजाय साधारण कागज में हो.  – कॉपियां अधिकतम 100 से 120 पन्ने की हो. – पाठ्य सामग्रियां कक्षा में उपलब्ध हो. – प्राइवेट  स्कूलों में भी मूल्याकंन का पैमाना एनसीइआरटी के नेशनल केरिकुलम  फ्रेमवर्क  पर आधारित हो. – एनसीइआरटी क्लास  के हिसाब से राज्यों को टाइम-टेबल दे. – राज्यों को उसमें बदलाव करने का अधिकार हो. – आयोग की सिफारिशें लागू हो तो किताब-कॉपियों की संख्या लगभग आधी हो जायेगी.
अभिभावकों को भी होगा फायदा
आरटीई   के नियमानुसार एनसीईआरटी एजुकेशनल अथॉरिटी है और मान्यता प्राप्त कोई भी   स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता.  ऐसे में अभिभावकों को सिर्फ एनसीइआरटी की ही किताबें खरीदनी होगी. इस तरह   बस्ते का बोझ कम होने के साथ ही अभिभावकों को पांच हजार रुपये तक की बचत होगी.
एनसीपीसीआर की ओर से इस संबंध में गाइडलाइन मिलती है तो उसे राज्य  में भी लागू कराया जायेगा.
डॉ हरपाल कौर, अध्यक्ष, बीएससीपीसीआर

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