एक थी ऊदा देवी: ध्रुव गुप्त की नयी किताब “हाशिये पर रौशनी” से

जाने माने लेखक ध्रुव गुप्त की नयी किताब “हाशिये पर रौशनी” हर्ष पब्लिकेशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित होकर पाठकों के बीच आई है. इस किताब में विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में समय समय पर प्रकाशित उनके  छब्बीस आलेख संकलित हैं. इन आलेखों में साहित्य, संस्कृति, संगीत, सिनेमा आदि विभिन्न विषयों पर चर्चा की गयी है. प्रस्तुत है उसकी किताब से एक आलेख ” एक थी ऊदा”. इस आलेख में लेखक महोदय ने 1857 की लड़ाई की एक कम सुनी नायिका ऊदा देवी के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं, उनके जीवन के रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयास किया है.

ध्रुव गुप्त 

झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की तरह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली एक और भी वीरांगना थी जिसे दुर्भाग्य से वह यश और सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हक़दार थी. शायद इसलिए कि वह किसी राजघराने या सामंती परिवार में नहीं, एक गरीब दलित परिवार में पैदा हुई एक मामूली सैनिक थी. इतिहास के पन्नों में ऐसे मामूली लोगों को जगह देने की परंपरा हमारे देश में कम ही रही है. इतिहास द्वारा विस्मृत स्वाधीनता संग्राम की वह नायिका थी ऊदा देवी पासी जिसे 1857 के स्वाधीनता संग्राम के कुछ लेखकों द्वारा दिए गए विवरणों में ” black  tigress” कहा गया था. लखनऊ के पास उजिरियाँव गाँव की ऊदा देवी उस दलित पासी जाति से थी जिसे अछूत माना जाता था, लेकिन जो अन्याय और अश्पृश्यता के प्रतिरोध में अपने जुझारू स्वभाव के लिए हमेशा से जानी जाती रही है. उसका पति मक्का पासी वाजिद अली शाह की पलटन में एक सैनिक था. देशी रियासतों पर अंग्रेजों के बढ़ते हस्तक्षेप के मद्देनज़र जब वाजिद अली शाह ने महल की रक्षा के उद्धेश्य से स्त्रियों का एक सुरक्षा दस्ता बनाया तो उसके एक सदस्य के रूप में ऊदा देवी नियुक्त हुई. अपनी बहादुरी और तुरंत निर्णय लेने की उसकी क्षमता से नबाब की बेगम और देश के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की नायिकाओं में एक बेगम हज़रत महल बहुत प्रभावित हुई. नियुक्ति के कुछ ही अरसे के बाद ऊदा देवी को बेगम हज़रत महल की महिला सेना की टुकड़ी का कमांडर बना दिया गया.

 

महिला दस्ते के कमांडर के रूप में ऊदा ने देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जिस अदम्य साहस, दूरदर्शिता और शौर्य का परिचय दिया था उससे खुद अँगरेज़ सेना भी चकित रह गयी थी. ऊदा की वीरता पर उस दौर में कई गीत लिखे और गाये जाते थे. उन गीतों की कुछ पंक्तियाँ आज भी उपलब्ध हैं:

कोई उसको हब्शी कहता,

कोई कहता नीच अछूत,

अबला कोई उसे बताये,

कोई कहे उसको मज़बूत !!

 

ऊदा देवी को शौर्य और बलिदान की प्रेरणा अपने पति मक्का पासी की शहादत से मिली थी. यह वह समय था जब 10 मई 1857 को मेरठ के सिपाहियों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध छेड़ा गया संघर्ष तेजी से पुरे उत्तर भारत में फैलने लगा था. 10 जून 1857 को लखनऊ के कस्बा चिनहट के निकट इस्माईलगंज में हेनरी लौरेंस के नेत्रित्व में ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौज की मौलवी अहमदुल्लाह शाह की अगुवाई में संगठित विद्रोही सेना से ऐतिहासिक लड़ाई हुई थी. चिनहट की इस लड़ाई में विद्रोही सेना की जीत और हेनरी लौरेंस की फ़ौज का मैदान छोड़ कर भाग खडा होना प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी उप्लाधियों में एक थी. देश को गौरवान्वित करने वाली और स्वाधीनता सेनानियों का मनोबल बढाने वाली उस लड़ाई में सैकड़ों दुसरे सैनिकों के साथ मक्का पासी की भी शहादत हुई थी. ऊदा ने अपने पति की लाश पर उसकी शहादत का बदला लेने की कसम खायी थी. मक्का पासी के बलिदान का प्रतिशोध लेने का वह अवसर ऊदा देवी को मिला चिनहट के महासंग्राम की अगली कड़ी सिकंदर बाग़ की लड़ाई में.

अंग्रेजों की सेना चिनहट की पराजय का बदला लेने की तैयारी कर रही थी. उन्हें पता चला कि लगभग दो हज़ार विद्रोही सैनिकों ने लखनऊ के सिकंदर बाग़ में शरण ले रखी है. 16 नवम्बर 1857 को कोलिन कैम्पबेल के नेतृत्व में अँगरेज़ सैनिकों ने एक सोची समझी रणनीति के तहत सिकंदर बाग़ की उस समय घेराबंदी की जब विद्रोही सैनिक या तो सो रहे थे या बिलकुल ही असावधान थे. ऊदा के नेतृत्व में वाजिद अली शाह की स्त्री सेना की टुकड़ी भी हमले के वक़्त उसी बाग़ में थी. असावधान सैनिकों की बेरहमी से ह्त्या करते हुए अँगरेज़ सैनिक तेजी से आगे बढ़ रहे थे. हज़ारों विद्रोही सैनिक मारे जा चुके थे और पराजय सामने नज़र आ रही थी. मैदान के एक हिस्से में महिला टुकड़ी के साथ मौजूद ऊदा ने पराजय निकट देखकर पुरुषों के कपडे पहन लिए. हाथों में बन्दूक और कन्धों पर भरपूर गोला बारूद लेकर वह पीपल के एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गयी.

ब्रिटिश सैनिकों को मैदान के उस हिस्से में आता देख ऊदा ने उन पर निशाना लेकर फायरिंग शुरू कर दिया. पेड़ की पत्तियों और डालियों के पीछे छिपकर उसने हमलावर ब्रिटिश सैनिकों को सिकंदर बाग़ के उस हिस्से में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया था जब तक उसका गोला बारूद ख़त्म नहीं हो गया. ऊदा देवी ने अपनी उस अकेली लड़ाई में ब्रिटिश सेना के दो बड़े अफसरों कूपर और लैम्सदेन सहित 32 अँगरेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था. गोलियां ख़त्म होने के बाद ब्रिटिश सैनिकों ने पेड़ को घेरकर अंधाधुंध फायरिंग की. कोई उपाय न देखकर जब वह पेड़ से उतरने लगी तो उसे गोलियों से छलनी कर दिया गया. ब्रिटिश सेना के हाथ पड़ने से पहले ही वह वीरगति को प्राप्त हो गयी.

 

लाल रंग की कसी जैकेट और पैंट पहने ऊदा की लाश जब पेड़ से जमीन पर गिरी, तो उसका जैकेट खुल गया. कैम्पबेल ये देख कर हैरान रह गया कि वीरगति प्राप्त वह बहादुर सैनिक कोई पुरुष नहीं, बल्कि एक महिला थी. कहा जाता है कि ऊदा देवी की स्तब्ध कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर कैम्पबेल ने हैट उतारकर उसे सलामी और श्रद्धांजली दी. ऊदा के शौर्य, साहस और शहादत पर देशी इतिहासकारों ने बहुत कम, अँगरेज़ अधिकारीयों और पत्रकारों ने ज्यादा लिखा. ब्रिटिश सार्जेंट फोर्बेस मिशेल ने अपने एक संस्मरण में बिना नाम लिए सिकंदर बाग़ में पीपल के एक बड़े पेड़ के ऊपर बैठी एक ऐसी स्त्री का उल्लेख किया है जो अंग्रेजी सेना के 32 से ज्यादा सिपाहियों और अफसरों को मार गिराने के बाद शहीद हुई थी. लन्दन टाइम्स के तत्कालीन संवाददाता विलियम हावर्ड रसेल ने लड़ाई का जो डिस्पैच लन्दन भेजा, उसमे उसने पुरुष भेष में एक स्त्री द्वारा पीपल के पेड़ से फायरिंग कर अंग्रेजी सेना को भारी क्षति पहुचाने का उल्लेख प्रमुखता से किया है. लन्दन के कई दुसरे अखबारों ने भी ऊदा की बहादुरी पर लेख प्रकाशित किये थे.

लखनऊ का पतन, 1857

ऊदा देवी हमारे राष्ट्रीय गौरव और स्वाभिमान की जीवंत प्रतीक है. जातिगत पूर्वाग्रह से ग्रस्त इतिहास लेखन ने उसके साथ न्याय नहीं किया. अंग्रेजों से  अपनी रियासत बचाने की लड़ाई लड़ रहे कई लोग देश के पहले स्वाधीनता संग्राम के नायक और नायिका घोषित किये गए, मगर बिना किसी स्वार्थ के देश की आज़ादी के लिए लड़ने और मर मिटने वाले सैकड़ों आमलोग इतिहास के अँधेरे तहखानों में गम कर दिए गये. वीरांगना ऊदा देवी उनमे से एक थीं. कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश की सरकार ने ऊदा देवी की एक मूर्ति सिकंदर बाग़ परिसर में स्थापित की है. उसकी तरह सैकड़ों दुसरे लोग भी हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहूति दी थी, लेकिन न इतिहास को उनकी याद है और न लोकमानस को. अब वक़्त आ गया है कि भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास फिर से लिखा जाए ताकि उसके अनाम नायक- नायिकाओं के बलिदान को अपेक्षित सम्मान मिले.

अमेज़न पर जाने के लिए किताब का लिंक 


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