आजाद भारत का फ़साना: सरकारें बदलती रहीं, घोटाले होते रहे

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति.

हमें आजादी पाए हुए 71 साल पुरे हो गए. आईये ये सही मौका है हम सोचें कहाँ तक पहुंचे ?

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के रिपोर्ट के अनुसार, भ्रष्टाचार के चलते कुल 2 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान होता है. दुनिया की जीडीपी का लगभग 2 प्रतिशत. यूएन हर साल 9 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोधी दिवस  मनाता है.  बर्लिन स्थित अंतर्राष्ट्रीय संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अध्ययन के अनुसार, पुरे एशिया प्रशांत महासागर क्षेत्र में भारत सबसे भ्रष्ट देश है. यहाँ 10 में से 7 लोगों को सरकारी तन्त्र से अपना काम करवाने के लिए घूस देना पड़ा है.

अगर हम आज़ाद भारत की तस्वीर पर एक नज़र डालें, तो हम पातें हैं, कि सरकारें बदलीं, पर घोटाले होते रहे. इन घोटालों के चलते पब्लिक फण्ड का दुरूपयोग हुआ, पब्लिक सर्विस की क्वालिटी में कमी आई. सिविल सोसाइटी की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति के चलते इन घोटालों के खिलाफ सशक्त आवाज नहीं उठ सकी.

 

जीप खरीद घोटाला (1948)

आजादी के बाद भारत सरकार ने एक लंदन की कंपनी से 2000 जीपों को सौदा किया. सौदा 80 लाख रुपये का था. लेकिन केवल 155 जीप ही मिल पाई. घोटाले में ब्रिटेन में मौजूद तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन का हाथ होने की बात सामने आई. लेकिन 1955 में केस बंद कर दिया गया. जल्द ही मेनन नेहरु केबिनेट में शामिल हो गए. पैसे की वसूली 1 रुपए नहीं हो पाई.

 

 

 मूंदड़ा घोटाला (1958)

आज़ाद हिंदुस्तान का पहला वित्तीय घोटाला 1958 में हुआ था. इसे मूंदड़ा घोटाला भी कहा जाता है क्योंकि इसे अंजाम देने वाले का नाम हरिदास मूंदड़ा था. यह पहला घोटाला था जिसमें व्यापारी, अफ़सर और नेता की तिकड़ी शामिल थी. इससे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बड़ी किरकिरी हुई थी क्यूंकि इसे उजागर करने वाला और कोई नहीं उनके दामाद फीरोज़ गांधी थे. इसकी वजह से तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी को इस्तीफ़ा देना पड़ा. हालंकि, नेहरू का इस घोटाले से कोई संबंध नहीं था पर इसकी वजह से नेहरू और फ़ीरोज़ गांधी के रिश्ते सामान्य नहीं रह पाए. घोटाला सिर्फ इतना था कि हरिदास मूंदड़ा ने सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करके एलआईसी को अपनी संदेहास्पद कंपनियों के शेयर्स ऊंचे दाम पर ख़रीदने पर मजबूर किया था और इसकी वजह से एलआईसी को करोड़ों का नुकसान झेलना पड़ा.

एलआईसी और घोटाले की साठगांठ

आजादी के आसपास कुल मिलाकर 245 छोटी बड़ी कंपनियां बीमा के क्षेत्र में कार्यरत थीं. इनमें से कुछ कंपनियां अक्सर छोटी-मोटी वित्तीय गड़बड़ियां करती रहती थीं. इसके मद्देनज़र और देश के नागरिकों के लिए बीमा की गारंटी देने के विचार से 1956 में भारतीय संसद ने बीमा विधेयक पारित किया. इसके साथ उन सभी 245 कंपनियों का विलय करके एक सरकारी संस्था का गठन हुआ जिसका नाम था भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी. शुरुआत में सरकार ने पांच करोड़ रुपये की पूंजी इसमें लगायी. इसके ज़रिये भारत सरकार कंपनियों में निवेश करती. ये एक तरीक़े से समाजवादी व्यवस्था का व्यापारिक दृष्टिकोण था.

एलआईसी अपनी नीतियों के तहत उन कंपनियों में भी निवेश करती जिनका प्रबंधन नामी-गिरामी होता या जिनकी काफ़ी प्रतिष्ठा होती. दूसरे शब्दों में कहें तो उसका पैसा ‘ब्लू चिप कंपनियों’ में लगता. 1957 में उसने उन छहों कंपनियों के शेयर्स ऊंचे दाम या बाज़ार भाव से अधिक भाव पर ख़रीदे थे जिनमें मूंदड़ा ने भी पैसा लगाया था और जिनका जिक्र ऊपर हुआ है. ये कंपनियां न तो ‘ब्लू चिप कंपनियों’ की श्रेणी में आती थीं और न ही इनका कोई अच्छा वित्तीय रिकॉर्ड था. बावजूद इसके एलआईसी ने इन कंपनियों में उस वक़्त सबसे बड़ा निवेश कर दिया.

इसके पीछे हरिदास मूंदड़ा की चाल थी कि जब निवेशकों को मालूम होगा कि उसकी कंपनियों में सरकार ने निवेश किया है तो मुनाफ़े को निश्चित मनाकर अन्य लोग भी उन कंपनियों के शेयर्स ख़रीदेंगे. इससे शेयर्स के बाज़ार भाव ऊंचे होंगे और वह उन शेयर्स को ऊंचे दाम पर बेचकर मुनाफ़ा कमा लेगा.

बताते हैं कि अंदरखाने एलआईसी के अफ़सरों को इस बात का पता चल गया था. तो भी एलआईसी की निवेश कमेटी ने इस ख़रीद पर कोई आपत्ति नहीं जताई. कमेटी के सदस्यों का मानना था कि सरकार की रज़ामंदी के बिना निगम के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर इतनी बड़ी डील नहीं कर सकते लिहाज़ा किसी ने भी न तो हरिदास मूंदड़ा की कंपनियों के शेयर्स ख़रीदने पर हामी भारी और न ही किसी ने आपत्ति जताई. सब कुछ एक तरह से ‘सेट’ हो गया था कि तभी भांडा फूट गया.

 

बोफोर्स घोटाला:

 

सन् 1987 में यह बात सामने आयी थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 1.42 करोड़ डालर की दलाली चुकायी थी. उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे. स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया.  आरोप था कि राजीव गांधी परिवार के नजदीकी बताये जाने वाले इतालवी व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोक्की ने इस मामले में बिचौलिये की भूमिका अदा की, जिसके बदले में उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला. कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डालर का था. आरोप है कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत के साथ सौदे के लिए 1.42 करोड़ डालर की रिश्वत बांटी थी.

काफी समय तक राजीव गांधी का नाम भी इस मामले के अभियुक्तों की सूची में शामिल रहा लेकिन उनकी मौत के बाद नाम फाइल से हटा दिया गया. सीबीआई को इस मामले की जांच सौंपी गयी लेकिन सरकारें बदलने पर सीबीआई की जांच की दिशा भी लगातार बदलती रही. एक दौर था, जब जोगिन्दर सिंह सीबीआई चीफ थे तो एजेंसी स्वीडन से महत्वपूर्ण दस्तावेज लाने में सफल हो गयी थी. जोगिन्दर सिंह ने तब दावा किया था कि केस सुलझा लिया गया है. बस, देरी है तो क्वात्रोक्की को प्रत्यर्पण कर भारत लाकर अदालत में पेश करने की. उनके हटने के बाद सीबीआई की चाल ही बदल गयी. इस बीच कई ऐसे दांवपेंच खेले गये कि क्वात्रोक्की को राहत मिलती गयी. दिल्ली की एक अदालत ने हिंदुजा बंधुओं को रिहा किया तो सीबीआई ने लंदन की अदालत से कह दिया कि क्वात्रोक्की के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं हैं. अदालत ने क्वात्रोक्की के सील खातों को खोलने के आदेश जारी कर दिये. नतीजतन क्वात्रोक्की ने रातों-रात उन खातों से पैसा निकाल लिया.

2007 में रेड कार्नर नोटिस के बल पर ही क्वात्रोक्की को अर्जेन्टिना पुलिस ने गिरफ्तार किया. वह कई दिन तक पुलिस की हिरासत में रहा. सीबीआई ने काफी समय बाद इसका खुलासा किया. सीबीआई ने उसके प्रत्यर्पण के लिए वहां की कोर्ट में काफी देर से अर्जी दाखिल की. तकनीकी आधार पर उस अर्जी को खारिज कर दिया गया, लेकिन सीबीआई ने उसके खिलाफ वहां की ऊंची अदालत में जाना मुनासिब नहीं समझा. नतीजतन क्वात्रोक्की जमानत पर रिहा होकर अपने देश इटली चला गया. पिछले बारह साल से वह इंटरपोल के रेड कार्नर नोटिस की सूची में है.

यह ऐसा मसला है, जिस पर 1989 में राजीव गांधी की सरकार चली गयी थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह हीरो के तौर पर उभरे थे. हालाँकि उनकी सरकार भी बोफोर्स दलाली का सच सामने लाने में विफल रही थी. समय समय पर कांग्रेस विरोधी राजनीतिक दल बोफोर्स का जिन्न बोतल से निकालते रहते हैं और अब न्याय की जगह ये राजनीतिक रोटी सेंकने का जरिया बन गया है.

सुखराम टेलिकॉम घोटाला:

सुखराम पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में टेलीकॉम मिनिस्टर थे. उन्होंने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए एक निजी फर्म को ठेका दे दिया और इसके बदले में तीन लाख रुपये की रिश्वत ली. इसके अलावा उन्होंने दूरसंचार विभाग को तार बेचने के लिए एक निजी कंपनी को ठेका दे दिया. ये निजी कंपनी थी हरियाणा टेलीकॉम लिमिटेड (एचटीएल), जिसे पॉलीथीन इन्सुलेटेड जेली फिल्ड (पीआईजेएफ) के 3.5 लाख कंडक्टर किलोमीटर (सीकेएम) केबल देने थे. इसकी कीमत 30 करोड़ रुपये थी. सीबीआई जांच हुई. इसके बाद कोर्ट ने पाया कि सुखराम ने दोनों ही मामलों में अपने पद का दुरुपयोग किया है और इसके एवज में पैसे खाए हैं. दिल्ली की अदालत  ने 2011 में सुखराम को दोषी पाया और पांच साल की सजा दे दी.

 

चारा घोटाला 

950 करोड़ रुपये के चारा घोटाले की कहानी 1994 से शुरू होती है. सृजन घोटाले से पहले तक यह बिहार राज्य का सबसे बड़ा घोटाला था जिसमें पशुओं को खिलाए जाने वाले चारे के नाम पर सरकारी खजाने से 950 करोड़ रुपये का फर्जीवाड़ा हुआ था. बिहार पुलिस ने 1994 में तत्कालीन बिहार के गुमला, रांची, पटना, डोरंडा और लोहरदगा जैसे कई कोषागारों से फर्जी बिलों के ज़रिए करोड़ रुपये की कथित अवैध निकासी के बिल जुटाए, जिसके बाद रातो-रात सरकारी कोषागार और पशुपालन विभाग के सैकड़ों कर्मचारी गिरफ्तार कर लिए गए. पूरे राज्य में कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए और कई डेकेदारों व सप्लायरों को हिरासत में ले लिया गया. उस वक्त राज्य में लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल की सरकार थी. विपक्षी पार्टियों ने उन पर निशाना साधते हुए कहा कि घोटाला इतना बड़ा है कि बिना सरकार की मिलीभगत के हो ही नहीं सकता. उन्होंने मांग की कि इस घोटाले की जांच सीबीआई से कराई जाए.

1996 में शुरु हुई सीबीआई की शुरुआती जांच में सामने आया कि  पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने चारे, पशुओं की दवा आदि की सप्लाई में खर्च करने के लिए करोड़ों रुपये की फर्जी बिल सरकारी कोषागार से कई सालों तक भुनाए. सीबीआई ने अपनी जांच में यह भी दावा किया कि लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में दोषी हैं.  सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक, 950 करोड़ के चारा घोटाला (आरसी/20ए/96) मामले में लालू प्रसाद यादव के अलावा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र, जेडीयू सांसद जगदीश शर्मा सहित 45 आरोपी बने. 1997 में घोटाले के चलते लालू प्रसाद यादव को जेल भी जाना पड़ा और उन्हें मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र भी देना पड़ा.  चारा घोटाला में लालू यादव पर छह अलग-अलग मामले लंबित हैं और इनमें से एक में उन्हें 5 साल की सजा हो चुकी है। इस घोटाले से जुड़े 15 आरोपियों की मौत हो चुकी है जबकि 2 सरकारी गवाह बन चुके हैं और एक ने अपना गुनाह कबूल कर लिया और एक आरोपी को कोर्ट से बरी किया जा चुका है.

कारगिल ताबूत घोटाला:

भारत और पाकिस्‍तान के बीच वर्ष 1999 में हुए करगिल युद्ध के बाद एक बेहद संगीन मामला सामने आने से देशवासियों की भावनाएं बुरी तरह आहत हुईं. इस तरह की बातें सामने आईं कि युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के शव को सम्मानजनक तरीके से घर पहुंचाने के लिए जिन ताबूतों की खरीद हुई, उसमें भारी घोटाला हुआ.

बाजार-भाव से ज्‍यादा दर पर खरीद
इसी मामले में देश की केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और अमरीका के एक ठेकेदार के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया. तथ्‍य यह है कि भारत के रक्षा मंत्रालय ने अमरीका की एक कंपनी से अल्युमिनियम के ताबूत और शव रखने योग्‍य थैले ख़रीदे थे. आरोपी अधिकारियों ने वर्ष 1999-2000 के दौरान ऐसे 500 अल्यूमुनियम ताबूत और 3000 शव थैले ख़रीदने के लिए अमरीका की एक कंपनी के साथ सौदा किया था. इस सौदे में प्रति ताबूत 2500 अमरीकी डॉलर यानी लगभग एक लाख बीस हज़ार रुपए और शव के थैलों के लिए 85 अमरीकी डॉलर प्रति थैला के हिसाब से भुगतान किया गया. बाद में पाया गया कि यह दर अंतरराष्‍ट्रीय बाजार-भाव के अनुसार बहुत ही ज्‍यादा थी.

ताबूतों के वजन से भी खिलवाड़

कुल मिलाकर यह सौदा करीब 15 लाख और 5 हज़ार अमरीकी डॉलर यानी क़रीब 7 करोड़ रुपए का था. जांच में पाया गया है कि जिस अमरीकी कंपनी के साथ सौदा हुआ था, वह इन ताबूतों की निर्माता कंपनी नहीं थी. कंपनी ने पहले जिन 150 ताबूतों की आपूर्ति की, उनका वज़न 55 किलोग्राम प्रति ताबूत था, जबकि सौदे के मुताबिक से वजन 18 किलोग्राम होना चाहिए था.

शुरुआती जांच में यह भी पाया गया कि ताबूतों के साथ वेल्डिंग के जरिए छेड़छाड़ की गई थी, जिसके कारण उसमें सुराख होने का ख़तरा बढ़ गया था. इसी वजह से विवादास्‍पद ताबूत इस्तेमाल के योग्य नहीं पाए गए थे. इस तरह सरकार को करीब एक लाख 87 हजार अमरीकी डॉलर यानी लगभग 89 लाख 76 हज़ार रुपए का भरी घाटा हुआ. जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा शहीदों के शव के काम न आकर दलालों व भ्रष्‍ट अफसरों की जेब में चले गए.

जॉर्ज पर भी लगे थे आरोप
करगिल युद्ध के बाद तब विपक्ष में बैठ रही कांग्रेस ने तत्‍कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस पर ताबूत आयात में घोटाले का आरोप लगाया था. विपक्ष ने जॉर्ज से इस्‍तीफे की भी मांग की थी. बाद में इस मामले में उन्‍हें क्‍लीन चिट दे दी गई थी.

 

ताज कॉरिडोर घोटाला:

 

ताज हेरिटेज कॉरिडोर प्रोजेक्ट नवंबर 2002 में मायावती की सरकार के दौरान शुरू हुआ था. 175 करोड़ के इस प्रोजेक्ट में ताजमहल से लेकर आगरा फोर्ट तक के दो किलोमीटर के रास्ते पर एक कॉरिडोर यानि गलियारा बनाने की बात की गई थी. इस गलियारे में शॉपिंग कॉम्पलेक्स, टूरिस्ट कॉम्पलेक्स, एम्यूजमेंट पार्क और रेस्त्रां बनाए जाने थे. इस काम के लिए शुरुआती 17 करोड़ रुपये जारी भी कर दिए गए थे, लेकिन काम शुरू होने के तुरंत बाद ही रोक दिया गया क्योंकि पर्यावरणविदों के मुताबिक इस गलियारे के बनने से ताजमहल को खतरा पैदा हो जाता.

इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए ताजमहल के पास बह रही यमुना नदी के किनारों को मिट्टी-पत्थर से भरना पड़ता जिससे नदी की चौड़ाई कम हो जाती और ताजमहल और आगरा फोर्ट के आधार को खतरा पैदा हो सकता था. ये प्रोजेक्ट कानून की अनदेखी थी क्योंकि ताज के 300 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण अवैध है. पर्यावरण विभाग की मंजूरी के बगैर ताज कॉरिडोर योजना में 17 करोड़ रुपये जारी करने के घोटाले पर 2003 में एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को जांच के आदेश दिए थे.

2007 में सीबीआई ने मायावती और नसीमुद्दीन सिद्दीकी सहित कई अधिकारियों को घोटाले का आरोपी पाया था और यही चार्जशीट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी. सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमा चलाने के लिए सीबीआई को लखनऊ में मौजूद विशेष सीबीआई अदालत जाने के आदेश दिए थे. इस पर 2007 में सीबीआई ने यूपी के तत्कालीन राज्यपाल टी वी राजेश्वर से मायावती और नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी थी. टी वी राजेश्वर ने अनुमति देने से मना कर दिया.

एयरसेल-मैक्सिम समझौता

2006 में दूरसंचार मंत्री रहते हुए दयानिधि मारन ने चेन्नै की टेलिकॉम कंपनी एयरसेल के प्रमोटर पर दबाव डाला कि वह अपनी फर्म मलयेशियाई कंपनी मैक्सिस को बेच दें. मामला उजागर होने पर 2011 में उनको कपड़ा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा.

हेलिकॉप्टर घोटाला

वीवीआईपी हेलिकॉप्टरों के लिए भारत ने फिनमैकानिका कंपनी के साथ फरवरी 2010 में सौदा किया. इस डील के तहत भारत को 12 अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर मिलने थे. फिनमैकानिका कंपनी के साथ यह सौदा करीब 4000 करोड़ रुपये में किया गया था. हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल सरकार के वीवीआईपी लोगों के आने-जाने के लिए खरीदे. सौदे के तहत तीन हेलिकॉप्टर भारत को मिल भी गये. लेकिन इस डील में हुए घोटाले का खुलासा होने के बाद बाकी बचे 9 हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी पर रोक लगा दी गई. रक्षा मंत्रालय ने इस घोटाले की सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं. गौरतलब है कि इस सौदे के लिए 2006 में टेंडर निकाले गए थे और एस. पी. त्यागी वायु सेना अध्यक्ष थे.

आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाला:

इस घोटाले का आरम्भ फरवरी 2002 में हुआ जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से निवेदन किया गया कि मुम्बई के हृदयस्थल में सेना से सेवानिवृत्त हुए तथा कार्यरत लोगों के लिए भूमि प्रदान की जाय.  महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई के कोलाबा में आदर्श हाउसिंग सोसायटी बनाई गई. यह 31 मंजिला पौश इमारत युद्ध में मारे गए सैनिकों की विधवाओं और भारतीय रक्षा मंत्रालय के कर्मचारियों के लिए बनाई गई थी. सोसायटी बनने के कुछ सालों बाद एक आरटीआई से यह खुलासा हुआ कि तमाम नियमों को ताक पर रख सोसायटी के फ्लैट ब्यूरोक्रैट्स, राजनेताओं और सेना के अफसरों को बेहद कम दामों में बेचे गए. दस वर्ष की अवधि में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण तथा उच्च-स्तरीय राजनेता, नौकरशाह, सेना के अधिकारी आदि ने मिलकर नियमों को तोड़-मरोड़ दिया और कौड़ियों के दाम पर अपने नाम से इसमें फ्लैट ले लिया.इस घोटाले का पर्दाफाश 2010 में हुआ. इस मामले में महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हान को इस्तीफा देना पड़ा.

21 दिसंबर 2010 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना कि यह सीधे-सीधे धोखेबाजी का मामला है. इसके बाद कोर्ट ने सोसायटी को अंतरिम राहत देने से इन्कार कर दिया. पर्यावरण नियमों को दरकिनार करने की वजह से केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने सिफारिश की कि इस इमारत को तीन महीने के अंदर गिरा दिया जाए.

मामले की जांच के लिए 2011 में महाराष्ट्र सरकार ने दो सदस्यीय न्यायिक कमिशन का गठन किया. इसकी अध्यक्षता हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस जेए पाटिल ने की. 2 साल तक इस समिति ने 182 से ज्यादा गवाहों से पूछताछ की और अप्रैल 2013 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कुल 25 फ्लैट गैरकानूनी तौर पर आवंटित किए गए थे. इनमें से 22 फ्लैट फर्जी नाम से खरीदे गए थे. इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र के चार पूर्व मुख्यमंत्रियों का भी नाम आया. इनमें अशोक चव्हाण, विलासराव देशमुख, सुशील कुमार शिंदे और शिवाजीराव निलंगेकर पाटिल शामिल थे. इनके अलावा दो पूर्व शहरी विकास मंत्री राजेश तोपे और सुनील ततकारे और 12 ब्यूरोक्रैट्स के नाम रिपोर्ट में गैरकानूनी गतिविधयों को लेकर शामिल किया गया.

आदर्श सोसायटी को लेकर एक मामला यह भी है कि यह इमारत बेहद संवेदनशील तटवर्ती क्षेत्र में बनाई गई है. यह नौसेना की जमीन पर बनाया गया और इसके निर्माण से पहले नौसेना से ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ नहीं लिया गया.

सीबीआई कोर्ट ने कुल 8 गिरफ्तारियां की. इसमें दो रिटायर्ड मेजर जनरल टीके ठाकुर और एआर कुमार, रिटायर्ड ब्रिगेडियर एमएम वांचू, पूर्व जनरल ऑफिसर कमांडिंग ऑफ महाराष्ट्र, प्रमोटर कन्हैयालाल गिडवानी और प्रदीप व्यास और शहर के तत्कालीन कलेक्टर, महाराष्ट्र सरकार में फाइनेंस सेक्रेटरी भी शामिल हैं. इसके बाद 2012 में महाराष्ट्र सरकार ने दो IAS अफसरों को सस्पेंड करने की घोषणा की थी. मई 2012 में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने 7 लोगों को रिहा कर दिया. इसकी वजह 60 दिन के अंदर चार्जशीट फाइल न कर पाना था.

 

सत्यम कंप्यूटर घोटाला:

सत्यम कंप्यूटर की स्थापना 1987 में हुई. 1992 में ये पब्लिक लिमिटेड कंपनी में तब्दील हुई. रामालिंगा राजू ने महज 20 कर्मचारियों के साथ मिलकर कंपनी की शुरुआत की थी. जब कंपनी घोटाले में फंसी तब 66 देशों में कंपनी का कारोबार फैला हुआ था और इसमें करीब 53 हज़ार कर्मचारी काम करते थे.

सत्यम घोटाले को देश का अब तक का सबसे बड़ा ऑडिट फ्रॉड माना जाता है, जो 7 जनवरी 2009 को सामने आया था.

22 जनवरी, 2009 को सीआईडी ने अदालत को बताया कि सत्यम में कुल 40 हजार कर्मचारी काम करते थे. कंपनी ने इन्हीं कर्मचारियों की संख्या को 53 हजार बताया हुआ था. राजू इन तेरह हजार कर्मचारियों के वेतन के रूप में हर महीने 20 करोड़ रुपये विद ड्रॉ कर रहे थे. राजू ने निवेशकों के पैसे को बिना निवेशकों को जानकारी दिए अपने बेटों के नाम पर बनाई कंपनी मायता इंफ्रा और मायता प्रोपर्टीज में डायवर्ट किया था. इसके अलावा उन पर कंपनी के मुनाफा गलत दर्शाने का आरोप भी था. 6 साल चली जांच में तीन हज़ार से ज्यादा डाक्यूमेंट्स और 226 चश्मदीद के बयानों को आधार बनाया गया. सेबी के मुताबिक, फर्जीवाड़े के जरिये 6 करोड़ निवेशकों को सत्यम के कर्ता-धर्ताओं ने करीब 7800 करोड़ रुपये को चूना लगाया था.

घोटाले के सामने आने से पहले सत्यम भारत की आईटी कंपनियों में चौथे स्थान पर थी. घोटाले के सामने आने के बाद सत्यम भारत की सबसे कम वैल्यूबल आईटी कंपनी बन गई. बाद में महिंद्रा एंड महिंद्रा ने सत्यम कंप्यूटर्स का अधिग्रहण कर लिया. जुलाई, 2009 में सत्यम का नाम महिंद्रा सत्यम हो गया. 21 मार्च, 2012 को दोनों कंपनियों के बोर्ड ने इस अधिग्रहण को मंजूरी के बाद महिंद्रा सत्यम का विलय टेक महिंद्रा में कर दिया गया.

कामनवेल्थ गेम्स घोटाला ( 2010)

2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान कई प्रोजेक्टों में धांधली पाई गई. इसमें करीब 70 हजार करोड़ रुपये के घोटाले की बात सामने आई. मनमाने तरीके से ऊंचे दामों पर सामान खरीदा गया. कई ऐसी कंपनियों को भुगतान किया गया, जो अस्तित्व में ही नहीं थीं. इस घोटाले से पूरी दुनिया में भारत की बदनामी हुई. मामले के तूल पकड़ने पर कांग्रेसी नेता और कॉमनवेल्थ गेम्स ऑर्गनाइजिंग कमिटी के चेयरमैन सुरेश कलमाड़ी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.

 

 

शारदा चिट फण्ड घोटाला ( 2013):

 

कभी नक्सली रहे सुदीप्त सेन ने कारोबारी चतुराई और राजनैतिक मित्रों के बल पर बेहद कामयाब पोंजी स्कीम चलाई. लेकिन किस्मत दगा दे गई.  54 वर्ष के सेन ने देश के इतिहास में एक सबसे बड़े चिट फंड घोटाले में लाखों निवेशकों को चूना लगाया है. उसने निवेशकों से 4,000 करोड़ रु. ठग लिए हैं. शारदा ग्रुप के मुखिया को 20 अप्रैल को उसकी निकट सहयोगी और ग्रुप की कार्यकारी निदेशक देबजानी मुखर्जी और वरिष्ठ अधिकारी अरविंद चौहान के साथ जम्मू-कश्मीर में सोनमर्ग के आलीशान होटल से गिरफ्तार किया गया.

सीबीआइ के नाम पत्र में सेन ने दावा किया कि जमीन-जायदाद, यात्रा और निर्यात के क्षेत्रों में उसका अच्छा-खासा कारोबार है, लेकिन पुलिस सूत्रों और पुराने कर्मचारियों का दावा है कि उसका असली धंधा हमेशा से चिट फंड का था. शारदा ग्रुप की वेबसाइट पर कई तरह के कारोबार का दावा किया गया है, जिसमें रियल एस्टेट से लेकर टू-व्हीलर, मीडिया, टूर ऐंड ट्रैवल्स और बायोगैस तक शामिल हैं. तरह-तरह के कारोबार चलाने के कागजी दावे का इस्तेमाल निवेशकों और एजेंटों को यह दिखाने के लिए किया गया कि उनसे जमा पैसे का कंपनी क्या करती है.

 

सेन ने फायदेमंद योजनाओं और चमकीले ब्रॉशर्स से निवेशकों को ललचाया, जिन पर तृणमूल कांग्रेस की सांसद अभिनेत्री शताब्दी रॉय की तस्वीरें भी थीं. कहते हैं, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से निकटता के भ्रम ने सेन को निवेशकों को आकर्षित करने में मदद दी. तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद कुणाल घोष ”15 लाख रु. प्रति माह के वेतन” पर पश्चिम बंगाल में उसकी मीडिया डिवीजन के प्रमुख थे.

करीब 3,00,000 लोग पैसा जमा करने के लिए एजेंट का काम करते थे और उन्हें 15 से 40 प्रतिशत तक कमीशन मिला करता था. वैसे, सेन के साम्राज्य के पतन का सिलसिला 2010 में उसी समय से शुरू हो गया था, जब उसने मीडिया कारोबार शुरू किया. जनवरी 2013 से टेलीविजन चैनलों और अखबारों के कर्मचारियों के वेतन के चेक बैरंग वापस आने लगे और 15 अप्रैल तक ग्रुप के सभी 10 मीडिया संगठन बंद कर दिए गए.

इस बीच राजनीतिक पैंतरेबाजी शुरू हो गई. पार्टी के दो सांसदों के नाम घोटाले में आने से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मुश्किल में आ गईं. कांग्रेस के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि ऐसी निवेश योजनाओं के संचालन और नियमन में उसकी कोई भूमिका नहीं होती. भारत में चिट फंड का संचालन चिट फंड्स ऐक्ट 1982 के तहत होता है. इस कानून के अंतर्गत चिट फंड कारोबार के पंजीकरण और नियमन का अधिकार सिर्फ संबद्ध राज्य सरकार को है.

ममता बनर्जी प्रशासन ने 500 करोड़ रुपए का एक फंड बनाया है जिसके द्वारा निवेशकों और एजेंटों के पैसे लौटने का कार्य शुरू होगा. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने छोटे निवेशकों को भरोसा दिलाया है कि उनके पैसे सरकार लौटाएगी.

कैसे चलता है यह गोरखधंधा
पश्चिम बंगाल, ओडिसा, असम और त्रिपुरा में ऐसी 194 कंपनियों की जांच चल रही है जिन पर आरोप है कि उन्होंने ऊंचे सब्जबाग दिखाकर लोगों का पैसा ठग लिया. जानें किस तरह चूना लगाती हैं ये कंपनियां

चरण 1: कंपनी ‘क’ पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में अपनी शाखाएं खोलती है.
चरण 2: जनता से पैसा इकट्ठा किया जाता है. निवेशकों को निवेश के बदले या तो जमीन या छुट्टियों में यात्रा का वादा किया जाता है.
चरण 3: ग्राहकों या जमाकर्ताओं को परिपक्वता अवधि पूरी होने पर ब्याज सहित पैसा वापस लेने का भी विकल्प दिया जाता है.
चरण 4: जमाकर्ता को और लुभाने के लिए कहा जाता है कि वो नया सदस्य लाए और उसके बदले में कमीशन ले. कंपनी एजेंटों का नेटवर्क तैयार करने के लिए पिरामिड की तरह काम करती है.
चरण 5: आरंभिक निवेशकों को परिपक्वता राशि या भुगतान नए निवेशकों के पैसे से किया जाता है.
चरण 6: विभिन्न स्कीमों के तहत पैसे जुटाने के लिए कंपनी ‘ए’ जमापत्र पर शब्दों से खिलवाड़ करती है ताकि सेबी और आरबीआइ जैसे नियामकों से बच सके.
चरण 7: जैसे ही पुराने निवेशकों की संख्या नए निवेशकों से ज्यादा हो जाती है, नकद प्रवाह में असंतुलन पैदा हो जाता है. या तो कंपनी ‘क’ पैसा लेकर गायब हो जाती है, या प्रवर्तक हार मान लेते हैं या फिर स्कीम अपने ही वजन से बैठ जाती है.

कहां लगाया जाता है पैसा
निर्माण और रियल एस्टेट,खेल और सामुदायिक आयोजन, अखबार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया
अभिनेताओं और हस्तियों के साथ अनुबंध, होटल, मनोरंजन और पर्यटन,स्वास्थ्य सेवाएं,माइक्रो फाइनेंस

 

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाला ( 2013)

 

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले की आंच उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती तक पहुंच गई.  सीबीआई सूत्रों ने दावा किया कि कुछ नए सबूत हाथ लगे हैं जो दो मुद्दों पर पूर्व मुख्यमंत्री की भूमिका की जांच करने को जरूरी बताते हैं. इनमें एक मुद्दा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग को बांटने और दूसरा जिला परियोजना अधिकारियों के 100 से अधिक पद तैयार करने से जुड़ा है. इन अधिकारियों को ही कथित भ्रष्टाचार में कथित तौर पर मददगार माना जाता है.

मायावती उस वक्त मुख्यमंत्री थीं जब स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को अलग अलग किया गया. आरोप है कि इस विभाग को बांटा गया ताकि एनआरएचएम के धन को सीधे तौर पर परिवार कल्याण विभाग के अधीन लाया जा सके.

क्या है पूरा घोटाला?

केंद्र सरकार के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन [एनआरएचएम] योजना के मद में छह वर्ष के दौरान उत्तर प्रदेश को 8657 करोड़ रुपये मिले, लेकिन अधिकारियों व चिकित्सकों ने इसमें पांच हजार करोड़ रुपये की बंदरबांट कर ली। इसका राजफास नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक [कैग] की रिपोर्ट में हुआ. यूपी सरकार की नाक के नीचे हुए इस घोटाले की जांच का काम सीबीआई को सौंपे जाने के बाद मंत्री, राजनेता व वरिष्ठ अधिकारियों के नाम सामने आए। इस घोटाले में तीन सीएमओ समेत सात लोगों की जान जा चुकी है.

कैग की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2005 से  मार्च 2011 तक एनआरएचएम में लोगों की सेहत सुधार के लिए 8657.35 करोड़ रुपये मिले, जिसमें से 4938 करोड़ रुपये नियमों की अनदेखी कर खर्च किए गए. करीब तीन सौ पेज की रिपोर्ट में लिखा गया है कि एनआरएचएम में 1085 करोड़ रुपये का भुगतान बिना किसी के हस्ताक्षर ही कर दिया गया. बिना करार के ही 1170 करोड़ रुपये का ठेका चंद चहेते लोगों को दिया गया. निर्माण एवं खरीद संबंधी धनराशि को खर्च करने के आदेश जारी करने में सुप्रीम कोर्ट एवं सीवीसी के निर्देशों का पालन नहीं किया गया. परिणाम स्वरूप जांच में केंद्र से मिले 358 करोड़ और कोषागार के 1768 रुपयों करोड़ का हिसाब राज्य स्वास्थ्य सोसाइटी की फाइलों में सीएजी को नहीं मिला. 23 जिलों की सीएजी जांच के दौरान एनआरएचएम में मिली धनराशि के खर्च का लेखा-जोखा तैयार करने के दौरान सच्चाई सामने आई.

 

2जी स्पेक्ट्रम घोटाला (1.76 लाख करोड़ का घोटाला)

2008 में जारी कैग की रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन टेलिकॉम मिनिस्टर ए. राजा के मनमाने रवैये के चलते 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन से देश को 1.76 लाख करोड़ का घाटा हुआ. 2001 की पुरानी कीमतों के आधार पर आवंटन किए गए. बोली प्रक्रिया की जगह ‘पहले आओ पहले पाओ’ नीति पर अमल किया गया। बेचे गए 122 लाइसेंस में से 85 लाइसेंस उन कंपनियों को दिए गए जो पात्रता की जरूरी शर्ते भी नहीं पूरी करती थीं. इस मामले में टेलिकॉम मिनिस्टर राजा को इस्तीफा देना और 15 महीने जेल में रहना पड़ा. इस मामले में पीएम मनमोहन सिंह भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं.

 

कोयला घोटाला

कैग की रिपोर्ट से कोयला घोटाला सामने आया. रिपोर्ट के मुताबिक, 2004 से 2009 के दौरान कंपनियों को 155 कोयला ब्लॉकों का आवंटन बिना नीलामी के ही कर दिया गया. इससे कंपनियों को कई लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ है. कोयला खदानों के आवंटन से जिन कमर्शियल इकाइयों को फायदा पहुंचा उनमें पावर, स्टील और सीमेंट इंडस्ट्री की करीब 100 प्राइवेट कंपनियां हैं और बाकी सरकारी कंपनियां. इस मामले में कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल के साथ-साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शक के दायरे में हैं.

 

राफेल विमान का क्या है सच?

 

वायुसेना ने 126 विमानों की जरूरत बताई थी, ताकि आने वाले वर्षों में पुराने पड़ चुके विमानों की जगह उनकी भरपाई हो सके और उसके पास किसी भी दो मोर्चे वाले युद्ध के लिए आवश्यक विमान मौजूद हों। विमानों की खरीद से संबंधित यह प्रस्ताव 2007 में जारी किया गया। उसके बाद से 2011 तक वायु सेना ने विमान के चयन के लिए कई चरणों में परीक्षण किए। अंत में राफेल और यूरोफाइटर टाइकून को छांटा गया। 2012 में राफेल को ‘एल1बिडर’ घोषित किया गया, जिसका मतलब था कि इसकी कीमत सबसे कम थी।

यूरोफाइटर ने उसके बाद डिस्काउंट की पेशकश की, मगर उसका कोई मतलब नहीं था। 2012-2014 क दौरान जब यूपीए शासन था, ठेके से संबंधित बातचीत अधूरी रही, इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था कि प्रस्ताव की शर्तों और कीमत पर सहमति नही बन पा रही थी।

भारत, फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान ख़रीद रहा है. क्या भारत ने एक विमान की क़ीमत टेंडर में कोट किए गए क़ीमत से बहुत ज़्यादा चुकाई है? इसे लेकर बहस हो रही है.

कांग्रेस पार्टी आरोप लगा रही है कि प्रधानमंत्री ने फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान की ख़रीद को लेकर जो क़रार किया है, उसमें घपला हुआ है. इस घपले में ख़ुद प्रधानमंत्री शामिल हैं.

पिछले साल जब कांग्रेस ने मामला उठाया था तब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि हम सब कुछ बताने को तैयार हैं. कोई घोटाला नहीं हुआ है. अब वे कह रही हैं कि दोनों देशों के बीच क़रार की शर्तों के अनुसार हम जानकारी नहीं दे सकते. मगर क़ीमत बताने में क्या दिक्कत है?

कांग्रेस का दावा है कि उसके कार्यकाल यानी 2012 में जब डील हो रही थी तब एक राफेल की क़ीमत 526 करोड़ रुपये आ रही थी. एनडीए सरकार के समय जो डील हुई है उसके अनुसार उसी राफेल की क़ीमत 1640 करोड़ रुपये दी जा रही है.

1 दिसंबर 2017 को द प्रिंट में मनु ने लिखा कि 36 राफेल लड़ाकू विमान ख़रीदने से पहले सरकार ने उससे सस्ता और सक्षम लड़ाकू विमान ख़रीदने के विकल्प को नज़रअंदाज़ कर दिया. एक ‘यूरोफाइटर टाइफून’ 453 करोड़ रुपये में ही आ जाता. ब्रिटेन, इटली और जर्मनी ने सरकार से कहा था कि वे विमान के साथ पूरी टेक्नोलॉजी भी दे देंगे. 2012 में राफेल और यूरोफाइटर दोनों को भारतीय ज़रूरतों के अनुकूल पाया गया था.

स्कोर्पियन पनडुब्बी से जुड़ा डाटा लीक:

भारतीय स्कॉर्पियन पनडुब्बी से जुड़े संवेदनशील डाटा लीक हो गए. ऑस्ट्रेलियाई मीडिया रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया.  यह भारतीय नौसेना  के लिए बड़ा झटका रहा. इस वाकये के बाद नौसेना में खलबली मच गयी. ऑस्ट्रेलियाई अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, जो दस्तावेज लीक हुए हैं उनमें 6 स्कॉर्पियन क्लास पनडुब्बी से संबंधित जानकारियां हैं. स्कॉर्पियन क्लास पनडुब्बी फ्रांस ने बनाई थी और अब भारत के पास है. ये डाटा भारत के पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान के लिए काफी अहम् साबित हो सकता है.

ऑस्ट्रेलियाई दैनिक के मुताबिक उसे पनडुब्बी से जुड़ी गोपनीय जानकारी वाले लीक हो चुके 22,400 पेज, जिन पर ‘रेस्ट्रिक्टिड स्कॉरपीन इंडिया’ (Restricted Scorpene India) लिखा हुआ है, पढ़ने का मौका मिला है. ये पेज दरअसल पनडुब्बी के संचालन के लिए बनाए गए पूर्ण दस्तावेज़ (ऑपरेटिंग मैनुअल) का हिस्सा हैं.

3.5 अरब अमेरिकी डॉलर के इस सौदे के तहत बनने वाली कुल छह पनडुब्बियों में से पहली आईएनएस कलवरी इस समय मुंबई में बनाई जा रही है.

इन पनडुब्बियों को अपनी तरह की पनडुब्बियों में सबसे आधुनिक माना जाता है. ये पानी के भीतर इतनी कम आवाज़ करती हैं कि इनकी भनक लगना नामुमकिन न सही, बेहद मुश्किल ज़रूर होता है.

स्कॉर्पीन पनडुब्बी मामले में व्हिसलब्लोअर एडमंड्स एलन ने पीएमओ को एक चिट्ठी लिखी कि आर्म्स डीलर अभिषेक वर्मा ने वरुण को हनीट्रैप में फंसाकर खुफिया जानकारियां हासिल की.

 

2001 स्टॉक मार्किट स्कैम: 

इंडियन इकोनॉमी के लिए साल 1990 से 92 का समय बड़े बदलाव का वक्त था. देश ने उदारवादी इकोनॉमी की तरफ चलना शुरू कर दिया था. लेकिन इसी दौर में देश के सामने एक ऐसा घोटाला सामने आया, जिसने शेयर खरीद-बिक्री की प्रकिया में ऐतिहासिक परिवर्तन किए. साल 1990 के समय से शेयर मार्केट में लगातार तेजी का रुख था. इस तेजी के लिए शेयर ब्रोकर हर्षद मेहता जिम्मेदार माना जाने लगा। यहां तक की हर्षद मेहता को ‘बिग बुल’ का दर्जा दे दिया गया.
 
कैसे किया इतना बड़ा घोटाला
एक वक्त ऐसा था जब हर्षद मेहता शेयर मार्केट में लगातार निवेश करता जा रहा था. जिस कारण शेयर मार्केट में लगातार तेजी बनती चली गई. लेकिन फिर सवाल उठा कि आखिर शेयर मार्केट में निवेश करने के लिए मेहता के पास इतने पैसे कहां से आए. फिर अप्रैल 1992 में टाइम्स ऑफ इंडिया के एक पत्रकार ने इसका खुलासा किया. इस लेख में बताया गया कि कैसे हर्षद मेहता ने बैंकिंग के नियम का फायदा उठाकर बैंकों को बिना बताए उनके करोड़ों रुपए को शेयर मार्केट में लगाया था. मेहता दो बैंकों के बीच बिचौलिया बनकर 15 दिन के नाम पर लोन लेकर बैंकों से पैसा उठाता और फिर मुनाफा कमाकर बैंकों को पैसा लौटा देता. ये बात जब सामने आई तो शेयर मार्केट में तेजी से गिरावट आनी शुरू हो गई. 4,000 करोड़ रुपए से अधिक के इस घोटाले के बाद ही सेबी को शेयर मार्केट में गड़बड़ी रोकने की ताकत दी गई.
मधु कोड़ा काण्ड: 

मधु कोड़ा सितंबर 2006 से अगस्त 2008 तक झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. वो इस आदिवासी राज्य के पांचवें मुख्यमंत्री थे. मुख्यमंत्री बनने के समय वो राज्य की विधानसभा में निर्दलीय विधायक थे. राजनीति में ऑल झारखंड स्टूडेंड यूनियन (आजसू) के एक कार्यकर्ता के तौर पर शुरूआत करने वाले मधु कोड़ा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से भी जुड़े रहे हैं.

बीजेपी की बाबूलाल मरांडी की सरकार में कोड़ा पंचायती राज मंत्री बने थे. वर्ष 2005 के चुनाव में बीजेपी ने मधु कोड़ा को टिकट नहीं दिया था. इसके बाद कोड़ा निर्दलीय चुनाव लड़कर जीते थे. विधानसभा में किसी पार्टी या गठबंधन को बहुमत नहीं मिलने पर उन्होंने बीजेपी के नेतृत्व वाले अर्जुन मुंडा सरकार को अपना समर्थन दिया था.

सितंबर 2006 में मधु कोड़ा और 3 दूसरे निर्दलीय विधायकों ने अर्जुन मुंडा सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. जिसके बाद अल्पमत में आई बीजेपी सरकार गिर गई थी. बाद में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर राज्य में अपनी सरकार बनाई थी.

 ये मामला झारखंड में राजहरा उत्तरी कोयला ब्लॉक के आवंटन में अनियमितता से जुड़ा हुआ है. इस ब्लॉक का आवंटन कोलकाता स्थित विनी आयरन और स्टील उद्योग लिमिटेड (VISUL) को किया गया था. कोयला घोटाला मामले में सीबीआई कोर्ट ने मधु कोड़ा को 3 साल की जेल की सजा सुनाई. कोर्ट ने कोड़ा पर 25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है.

एचसी गुप्ता कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के दौरान दो वर्षों के लिए कोयला सचिव थे. साल 2008 में वे इस पद से रिटायर हुए. गुप्ता ने ही कोयला खनन के अधिकार से जुड़े 40 मामलों को क्लियर करने वाली स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्षता की थी.

पूर्व शीर्ष ब्यूरोक्रेट पर आरोप है कि उन्होंने कोयला ब्लॉक के आवंटन के लिए पारदर्शी प्रक्रिया का पालन नहीं किया जिसके चलते करदाताओं के करोड़ों रुपये डूब गए. गुप्ता पर कम से कम आठ मामले दर्ज हैं. सीबीआई ने कहा है कि कोड़ा, बसु और दो आरोपी ब्यूरोक्रेट ने कोल ब्लॉक आवंटन में VISUL को फायदा पहुंचाने का काम किया.

 

ONGC गैस चोरी मामला:

आंध्र के कृष्णा-गोदावरी बेसिन में ओएनजीसी के गैस भंडार में सेंध लगाकर रिलायंस द्वारा 30 हजार करोड़ रू की प्राकृतिक गैस चुराने के मामले मे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पैनल का फ़ैसला आ गया है. इस पैनल ने जो रिलायंस ओर मोदी सरकार की सहमति से चुनी गई थी उसने ओएनजीसी की शिकायत को रद्द कर रिलायंस से 10 हजार करोड़ के जुर्माना हटा दिया है जो 2016 में जस्टिस ए पी शाह आयोग द्वारा रिलायंस को दंडित करने की सिफ़ारिश के चलते सरकार को लगाना पड़ा था.

इस भी बड़ा तुर्रा यह लगा है कि ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया है कि अब सरकार को ही हरजाने के तौर पर लगभग 50 करोड़ रू रिलायंस को देने होंगे.

यह मामला क्या था 

  • आंध्र प्रदेश की दो प्रमुख नदियों कृष्णा और गोदावरी के डेल्टा क्षेत्र में स्थित कृष्णा-गोदावरी (केजी) बेसिन कच्चे तेल और गैस की खान माना जाता है.
  • 1997-98 में सरकार न्यू एक्सप्लोरेशन और लाइसेंस पॉलिसी (नेल्प) लेकर आई। इस पॉलिसी का मुख्य मकसद तेल खदान क्षेत्र में लीज के आधार पर सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियों को एक समान अवसर देना था.
  • इस पॉलिसी से रिलायंस का प्रवेश तेल और गैस के अथाह भंडार वाले इस क्षेत्र में हो गया रिलायंस ने इन तेल क्षेत्रों में अपना अधिकार बनाना शुरू किया जहाँ ONGC पहले से खुदाई कर रहा था.
  • धीरे धीरे रिलायंस ने यह कहना शुरू किया कि उसे इस क्षेत्र में करोड़ों घनमीटर प्रतिदिन उत्पादन करने वाले कुए मिल गए हैं इन खबरों से रिलायंस के शेयर आसमान पर जा पुहंचे. 2008 में रिलायंस ने तेल और अप्रैल 2009 में गैस का उत्पादन शुरू किया था.
  • लेकिन हकीकत यह थी कि रिलायंस को अपनी घोषणाओं के विपरीत बेहद कम तेल और गैस इन क्षेत्रों से प्राप्त हो रही थीं ओर पास के क्षेत्र में स्थित ONGC अपने कुओं से भरपूर मात्रा में तेल गैस का उत्पादन कर रहा था.

2011 में केजी बेसिन में रिलायंस इंडस्ट्रीज की परियोजना से गैस उत्पादन में गिरावट आई और सरकार ने रिलायंस को गैर-प्राथमिक क्षेत्रों को गैस की आपूर्ति बंद करने का आदेश दिया लेकिन रिलायंस ने इस्पात उत्पादन करने वाले समूहों को साथ मे लेकर सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया पेट्रोलियम मंत्रालय और रिलायंस में यह विवाद गहराता चला गया पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना था कि रिलायंस को कैग द्वारा ऑडिट कराना होगा लेकिन रिलायंस इसके लिए तैयार नही हुआ उसने इस क्षेत्र में अपने वादे के मुताबिक अरबो करोड़ का निवेश करने से इनकार कर दिया.

रिलायंस कंपनी ने यह शर्त भी रखी कि लेखा परीक्षा उसके परिसर में होनी चाहिये और इस रिपोर्ट को पीएससी के तहत पेट्रोलियम मंत्रालय को सौंपी जाए, संसद को नहीं, UPA सरकार में भी मुकेश अम्बानी की रिलायंस इतनी पॉवरफुल थी कि कहा जाता था कि मुकेश अम्बानी की मर्जी से पेट्रोलियम मंत्री हटाये और बहाल किये जाते थे.

इस बीच 2013 में रिलायंस और ओएनजीसी के बीच गैस चोरी को लेकर विवाद की थोड़ी–थोड़ी भनक मिलना शुरू हो गयी थी.

 

15 मई 2014 को ONGC ने जो केस दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल किया था वह केस एक ऐतिहासिक केस था क्योंकि ओएनजीसी ने रिलायंस पर तो चोरी का आरोप लगाया ही था, उसने सरकार को भी आड़े हाथों लिया था. ओएनजीसी का कहना था कि डीजीएच और पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा निगरानी नहीं किये जाने के कारण ही रिलायंस ने यह चोरी की.

 

हवाला स्कैम : एक डायरी जिसने कर दिया धमाका 

जैन बंधु कारोबारी और हवाला ऑपरेटर थे. उन्होंने कई परियोजनाओं की रफ्तार बढ़ाने और अपने काम निकलवाने के लिए कई नेताओं को घूस खिलाई थी. एस के जैन की डायरी से खुलासा हुआ था कि 1.8 करोड़ डॉलर की रिश्वत दी गई है. LKA और JK जैसे अक्षरों के आगे पैसे देने की बात का ज़िक्र हुआ था. इस मामले में लालकृष्‍ण आडवाणी, बलराम जाख़ड़, वी सी शुक्ला, माधवराव सिंधिया और मदन लाल खुराना जैसे दिग्गज नेताओं पर कई सवाल खड़े हुए थे.

 

सृजन घोटाला:

बिहार में इन दिनों सृजन घोटाले का बड़ा शोर है. कल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा सीबीआइ जांच की अनुशंसा किये जाने के बाद इसकी चर्चा बिहार से बाहर होने लगी है. इस घोटाले के पीछे सृजन नामक एनजीओ की कहानी है. सृजन संस्था का पूरा नाम ‘सृजन महिला विकास सहयोग समिति’ है. इससे एकीकृत बिहार (अब झारखंड) के रांची में लाह अनुसंधान में वरीय वैज्ञानिक की पत्नी मनोरमा देवी के आत्मनिर्भर बनने की कहानी गुंथी हुई है. इसकी शुरुआत वर्ष 1993-94 में की गयी थी. वर्ष 1991 में जब मनोरमा देवी के पति का निधन हो गया, तब छह बच्चों की मां के कंधों पर परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी आ गयी. पति की मौत के करीब ढाई-तीन वर्षों बाद वर्ष 1993-94 में मनोरमा देवी ने दो महिलाओं के साथ सृजन संस्था की शुरुआत की. वर्ष 1996 में सहकारिता विभाग में को-ऑपरेटिव सोसाइटी के रूप में संस्था को मान्यता भी मिल गयी. को-ऑपरेटिव सोसाइटी के रूप में सदस्य महिलाओं के पैसे जमा भी लिये जाते थे, जिस पर उन्हें ब्याज भी मिलता था. आपातकाल में महिलाओं को संस्था कर्ज भी देने लगी.

गरीब, पिछड़ी और महादलित महिलाओं का जीवन स्तर ऊंचा उठाने के लिए संस्था से जोड़ा

मनोरमा देवी ने वर्ष 1993-94 में सबौर में किराये का एक कमरा लिया. उन्हें सुनीता और सरिता नाम की दो महिलाओं का सहयोग मिला. मनोरमा देवी ने एक सिलाई मशीन लेकर कपड़ा सिलने का काम शुरू किया. कपड़े तैयार कर बाजार में बेचा जाने लगा. मनोरमा देवी गरीब, पिछड़ी और महादलित महिलाओं के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने और आत्मनिर्भर करने के लिए अपनी संस्था से जोड़ने लगीं. महिलाओं की संख्या बढ़ने और काम अधिक आने पर मनोरमा देवी ने रजंदीपुर पैक्स से 10 हजार रुपये कर्ज लिया. कपड़े सिलने और बाजार में आपूर्ति बढ़ने से मनोरमा देवी ने स्वयं सहायता समूह बनाना शुरू कर दिया. इन महिलाओं को स्वरोजगार के जरिये अपनी संस्था ‘सृजन’ से जोड़ने लगीं.

धीरे-धीरे बढ़ने लगा ‘सृजन संस्था’ का कद

धीरे-धीरे आमदनी भी बढ़ने लगी. सिलाई-कढ़ाई का काम भी बढ़ता गया. एक से बढ़ कर कई सिलाई मशीनों पर काम होने लगा. महिलाओं की संख्या भी बढ़ने लगी. इसके बाद वर्ष 1996 में मनोरमा देवी ने ‘सृजन महिला विकास सहयोग समिति’ नाम से अपनी संस्था का निबंधन कराया. साथ ही मनोरमा देवी संस्था में सचिव के रूप काम करने लगीं. समाज की गरीब, पिछड़ी और महादलित महिलाओं को समिति से जुड़ता देख सहकारिता बैंक ने 40 हजार रुपये का लोन पास कर दिया. काम से प्रभावित होकर सबौर स्थित ट्रायसम भवन में समिति को अपनी गतिविधियों के आयोजन की अनुमति भी मिल गयी. बाद में जिलाधिकारी एक एनजीओ को सरकार की जमीन मात्र 200 रुपया महीने पर 35 साल की लीज पर दे देते हैं.

कैसे शुरू हुआ घोटाले का खेल

वर्ष 2007-2008 में सृजन को-ऑपरेटिव बैंक खुल जाने के बाद से घोटाले का खेल शुरू होता है. भागलपुर ट्रेजरी के पैसे को सृजन को-ऑपरेटिव बैंक के खाते में ट्रांसफर करने और फिर वहां से सरकारी पैसे को बाजार में लगाया जाने लगा. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सृजन में स्वयं सहायता समूह के नाम पर कई फर्जी ग्रुप बनाये गये. उनके खाते भी खोले गये और इन खातों के जरिये नेताओं और नौकरशाहों का कालाधन सफेद किया जाने लगा.

कैसे होता था घोटाला

सरकारी विभाग के बैंकर्स चेक या सामान्य चेक के पीछे ‘सृजन समिति’ की मुहर लगाते हुए मनोरमा देवी हस्ताक्षर कर देती थीं. इस तरह उस चेक का भुगतान सृजन के उसी बैंक में खुले खाते में हो जाते थे. जब भी कभी संबंधित विभाग को अपने खाते की विवरणी चाहिए होती थी, तो फर्जी प्रिंटर से प्रिंट करा कर विवरणी दे दी जाती थी. इस तरह विभागीय ऑडिट में भी अवैध निकासी पकड़ में नहीं आ पाती थी.

वर्ष 2008 से ही हो रहा था घोटाला

सृजन में घोटाला वर्ष 2008 से ही हो रहा है. उस समय बिहार में जदयू-भाजपा की सरकार थी. वित्त मंत्रालय का प्रभार सुशील कुमार मोदी के पास था. उसी साल ऑडिटर ने यह गड़बड़ी पकड़ ली. तब ऑडिटर ने आपत्ति जतायी कि सरकार का पैसा को-ऑपरेटिव बैंक में कैसे जमा हो रहा है? उसके बाद तत्कालीन एसडीएम विपिन कुमार ने सभी प्रखंड के अधिकारियों को पत्र लिखा कि पैसा ‘सृजन’ के खाते में जमा नहीं करें. इसके बावजूद सब कुछ पहले जैसा ही होता रहा. आखिर कोई जिलाधिकारी किसके आदेश पर सरकारी विभागों का पैसा ‘सृजन को-ऑपरेटिव बैंक’ के खाते में भेज रहा था? यहां पदस्थापित होनेवाले दूसरे कई जिलाधिकारियों ने भी ऐसा होने दिया. इसके बाद 25 जुलाई, 2013 को भारतीय रिजर्व बैंक ने बिहार सरकार से कहा था कि इस को-ऑपरेटिव बैंक की गतिविधियों की जांच करें. रिजर्व बैंक का आदेश है कि अगर 30 करोड़ से अधिक की गड़बड़ी होगी, तो जांच सीबीआई करेगी. वर्ष 2013 में भागलपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी प्रेम सिंह मीणा ने ‘सृजन’ की बैंकिंग प्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए जांच टीम गठित कर दी थी. अब फिर यह मामला गर्म हो गया है.

 

तेलगी स्टाम्प घोटाला:

तेलगी को कोर्ट ने स्टांप पेपर घोटाला के मामले में 2007 से 30 साल तक सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी. उस पर 202 करोड़ रूपये का जुर्माना भी लगाया गया था.

केले बेचने से किंगपिन बनने तक का सफर

रेलवे के एक चतुर्थवर्गीय कर्मचारी के घर पैदा हुआ अब्दुल करीम तेलगी एक वक्त नासिक रेलवे स्टेशन पर केले बेचा करता था. इसी संघर्ष के साथ जैसे-तैसे उसने अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर किसी छोटी-मोटी नौकरी के सिलसिले में गल्फ चला गया. करीब सात साल बाद वापस लौटकर आया और आते ही उसने जालसाजी के काम में हाथ आजमाने शुरू कर दिए. 1990 के शुरुआती दिनों में उसका नाम फर्जी पासपोर्ट बनाने के धंधे में आया और उसपर मुकदमे में भी दर्ज हुए.

लेकिन 1996 के आते-आते तेलगी आधुनिक भारत के सबसे बड़े घोटालों में एक स्टैंप पेपर स्कैम की नींव रख चुका था. नासिक में मौजूद नेशनल सिक्यूरिटी प्रेस के कर्मचारियों की मिलीभगत से तेलगी रात-दिन जाली स्टैंप पेपर छाप रहा था. 2003 में जब तेलगी स्कैम का भंडाफोड़ हुआ तो पता चला कि जाली स्टैंप पेपर का धंधा चलाने के लिए उसने साढ़े तीन सौ कर्मचारियों की पूरी फौज खड़ी कर रखी थी. अपने एजेंट्स की मदद से तेलगी ने फर्जी स्टैंप पेपर का कारोबार भारत के 70 शहरों में फैला रखा था.

देश का कोई ऐसा स्टॉक एक्सेज, बैंक, इंश्योरेंस कंपनी या कॉरपोरेट नहीं होगा, जहां तेलगी ने जाली स्टैंप पेपर की सप्लाई ना की हो. अगर तेलगी के घोटाले के असर की बात करें तो इसका मतलब सीधे-सीधे ये हुआ कि 1996 से लेकर 2003 तक के बीच देश भर में हुए लाखों करोड़ रुपये के सौदे तकनीक तौर पर अमान्य कहे जा सकते हैं. एक लॉ एक्सपर्ट तो उस दौर में यह कहकर सनसनी मचा दी थी कि अब हजारो शादियां भी नाजायज हो गई हैं, क्योकि उन्हें रजिस्टर करने के लिए जाली स्टैंप पेपर का इस्तेमाल किया गया है.

बीस हजार करोड़ का घोटाला

तेलगी का स्टैंप पेपर घोटाला कितना बड़ा था, इसे लेकर मीडिया में तरह-तरह की रिपोर्ट आती रही हैं. कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि तेलगी ने लगभग एक दशक में करीब 20 हजार करोड़ रुपए के जाली स्टैंप पेपर बेचे. अगर अभी के आधार पर इन पेपर्स की कीमत आंकी जाए तो ये घोटाला लगभग एक लाख करोड़ रुपए का बैठेगा. सवाल ये है कि बेहद कड़ी सुरक्षा वाले नेशनल सिक्यूरिटी प्रेस में तेलगी किस तरह सेंध लगाने में कामयाब हुआ और पूरे देश में बरसो तक उसका धंधा किस तरह बेरोक-टोक चलता रहा.

जब मामले की छानबीन शुरू हुई तो देश हैरान रह गया. तेलगी के अंडरवर्ल्ड लिंक थे. लेकिन ज्यादा बड़ी बात ये थी कि सत्ता प्रतिष्ठानों में उसकी अंदर तक पैठ थी. तेलगी के सहयोगी के तौर पर गिरफ्तार किए गए महाराष्ट्र पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर के पास से जब 200 करोड़ रुपए की संपत्ति बरामद हुई, तो मीडिया को समझ में आया कि इस घोटाले को जितना बड़ा माना जा रहा है, वो उससे कहीं ज्यादा बड़ा है.

जेब में सरकार, नौकरी पर पुलिस वाले

2003 के बाद से तेलगी स्टैंप पेपर घोटाले की परते खुलनी शुरू हुईं, तो हर रोज एक नई कहानी सामने आने लगी. ये कहा जाने लगा कि तेलगी तत्कालिक महाराष्ट्र सरकार को अपनी जेब में रखता था. दर्जन भर से ज्यादा टॉप लेवल के पुलिस ऑफिसर और ब्यूरोक्रेट उससे बकायदा सैलरी लेते थे. यही वजह है कि इतना घोटाला बिना किसी रुकावट के चलता रहा.

तेलगी की गिरफ्तारी के कुछ साल बाद उसके नार्को टेस्ट की एक कथित सीडी सामने आई. जिसमें तेलगी महाराष्ट्र सरकार में शामिल पार्टी के सबसे बड़े नेता का नाम ले रहा था. हालांकि जांच अधिकारियों ने बाद में तेलगी के इस बयान को खारिज कर दिया. लेकिन यह सच है कि तेलगी कांड के छींटे महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री समेत कई बड़े नेताओं पर पड़े. इतना ही नहीं दिल्ली की राजनीति से जुड़े अलग-अलग पार्टियों वाले कई बड़े नेताओं के नाम भी इस घोटाले में उछले. लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है, इस मामले में शक के दायरे में आए ज्यादातर राजनेताओं का कुछ नहीं बिगड़ा.

30 साल की सजा और 200 करोड़ का जुर्माना

लेकिन लंबी अदालत कार्रवाई के बाद तेलगी का मामला अंजाम तक पहुंच गया. कोर्ट ने उसे अलग-अलग धाराओं में कुल मिलाकर 30 साल की सजा सुनाई. इसके अलावा उस पर 202 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया गया.

 

कर्णाटक वक्फ बोर्ड जमीन घोटाला:

राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने पाया  कि पिछले एक दशक में वक्फ बोर्ड की 22 हजार संपत्तियों पर कब्जा कर उन्हें बेच दिया गया. इससे राजकोष को करीब दो लाख करोड़ रुपये का चूना लगा.

राज्य अल्पसंख्यक आयोग के सूत्रों के अनुसार इस घोटाले में कुछ बड़े राजनेता भी शामिल थे.  आयोग की रिपोर्ट में 38 कांग्रेसी नेताओं के नाम दर्ज थे. 7500 पेज की यह रिपोर्ट सोमवार को मुख्यमंत्री सदानंद गौडा को सौंप दी गई.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 11 सालों के दौरान वक्फ बोर्ड अधिकारियों की मदद से जमीन निजी लोगों और संस्थानों को हस्तांतरित कर दी गई. रिपोर्ट में यही कहा गया है कि ‌वक्फ बोर्ड की 85 फीसदी भूमि का दुरुपयोग तो बंगलूरू में ही किया गया है.

 

नोट के लिए वोट स्कैम:

वर्ष 2008 में भारतीय संसद में घटित एक घटना जिसमें मनमोहन सिंह सरकार द्वारा विश्वास मत हासिल करने की बहस के दौरान भाजपा के तीन सांसदों ने संसद में एक करोड़ रूपए के नोटों की गड्डियों संसद में दिखाई थी. इन सांसदों का आरोप था कि मनमोहन सरकार ने समाजवादी पार्टी के अमर सिंह के माध्यम से उनके मत को खरीदने की कोशिश की थी.

2011 में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर दिल्ली पुलिस इस मामले पर फिर से सक्रिय हुई और 6 सितंबर 2011 को अमर सिंह तथा भाजपा के दो सांसद तिहाड़ जेल भेज दिए गए.

 

Antrix मामला:

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचा है. जून 2011 में देवास मल्टीमीडिया ने हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट में केस फाइल कर मुआवजे की मांग की थी. भारतीय अंतरिक्ष संस्था्न इसरो की वाणिज्यिक शाखा एंट्रिक्स ने देवास मल्टीमीडिया के साथ जनवरी 2005 में डील की थी. इस डील के तहत दो सैटेलाइट बनाने, लॉन्च करने और ऑपरेट करने थे। इन सैटेलाइट्स पर स्पेक्ट्रम कैपेसिटी को लीज पर देना था.

फरवरी 2011 में एंट्रिक्स ने फैसला किया कि वह डील खत्म कर देगा. ऐसा इसलिए क्योंकि उसे सैटेलाइट लॉन्च और ऑपरेट करने के लिए ऑर्बिट में स्लॉट और फ्रिक्वेंसी नहीं मिल पा रही थी. कैबिनेट की कमेटी ने इसरो की वाणिज्यिक शाखा एंट्रिक्स के इस फैसले को मंजूरी दी. देवास ने एंट्रिक्स पर आरोप लगाया कि उसने सैटेलाइट और स्पेक्ट्रम को अलॉट करने से पहले बोली नहीं लगाई थी.

इधर, डील के मुताबिक पहले ऐंट्रिक्स एस-बैंड स्पेक्ट्रम में लंबी अवधि के दो सैटलाइट्स ऑपरेट करने पर राजी हो गया था. लेकिन, बाद में उसने डील रद्द कर दी. ट्रिब्यूनल ने कहा कि डील रद्द करके  सरकार ने उचित नहीं किया, जिससे देवास मल्टीमीडिया के निवेशकों को बड़ा नुकसान हुआ.

वर्ष 2005 में देवास से कहा गया था कि वह बेहद कम उपलब्धता वाले एस-बैंड का इस्तेमाल कर सकती है, और इसके लिए उसे दो भारतीय उपग्रहों पर स्थान उपलब्ध करवाया गया था. देवास मल्टीमीडिया की योजना इन उपग्रहों तथा स्पेक्ट्रम का प्रयोग कर देशभर में सस्ते मोबाइल फोनों पर ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध करवाने की थी. एंट्रिक्स इस बात पर भी सहमत हो गया था कि इसके लिए आवश्यक उपग्रहों का निर्माण इसरो ही करेगी.

एंट्रिक्स को इसके लिए 12 साल के भीतर 600 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाना था, लेकिन वर्ष 2011 में समझौता रद्द कर दिया गया. डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने कहा कि उसने इसरो की उपग्रहों का निर्माण करने की इसरो की योजनाओं पर मंजूरी नहीं दी है.

एन्ट्रिक्स पर यह भी आरोप था कि उसने देवास को उपग्रह तथा स्पेक्ट्रम का आवंटन करने से पहले बोली प्रक्रिया का पालन नहीं किया। इस फैसले को बहुचर्चित 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से प्रभावित माना गया था, जिसकी वजह से आखिरकार डॉ मनमोहन सिंह की सरकार को चुनाव में नुकसान हुआ। उनकी सरकार पर आरोप थे कि उन्होंने 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटित करने में फायदे के लिए टेलीकॉम कंपनियों से समझौते किए।

जांचकर्ताओं का कहना है कि देवास ने पूर्व इसरो अधिकारियों की सेवाएं ली थीं, और उन्होंने ही टेलीकॉम कंपनी के पक्ष में इस समझौते को करवाने में मदद की. देवास मल्टीमीडिया के साथ समझौता किए जाने वक्त इसरो प्रमुख रहे माधवन नायर को किसी भी सरकारी भूमिका निभाने के लिए ब्लैकलिस्ट भी कर दिया गया था, और भ्रष्टाचार के आरोपों में उनके खिलाफ जांच की थी.

एस बैंड स्पेक्ट्रम व्यावसायिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है. एस बैंड स्पेक्ट्रम ऐसी रेडियो तरंगें हैं जिनको 2.5 मेगाहट्र्ज बैंड भी कहा जाता है. इन तरंगों का उपयोग संचार उपग्रहों, मौसम संबंधी राडार और जलयान के राडारों द्वारा किया जाता है. इसका उपयोग चैथी पीढ़ी यानी 4 जी की मोबाइल सेवाओं के लिए किया जाता है.

इसरो की व्यवसायिक शाखा एंट्रिक्स और देवास मल्टीमीडिया के बीच हुए एस बैंड स्पेक्ट्रम सौदे को सरकार द्वारा रद्द किए जाने के बाद सवाल उठता है कि पहले चरण में ही इस सौदे पर हस्ताक्षर क्यों किए गए और फिर इसे रद्द करने में इतना समय क्यों लगा. देवास के साथ करार करने के पूर्व निविदा जारी न होने के बारे में उसका जवाब है कि उसने कोई सरकारी संसाधन खरीदा नहीं है, सिर्फ प्रयोग के आधार पर ट्रांसपोंडर किराये पर लिया है. उसके अनुसार जिस तकनीक का वह उपयोग कर रही है, वह नई है, इसलिए निविदा या अन्य को अवसर मिलने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता.

सच्चाई यह है कि एस बैंड स्पेक्ट्रम के 70 मेगा हर्ट्ज  को निजी कंपनी को देने का यह सौदा विवादों में घिर गया था जिसके बाद ही इसे रद्द कर दिया गया. पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा की अध्यक्षता  में गठित समिति  की रिपोर्ट के अनुसार  एंट्रिक्स-देवास सौदे में पारदर्शिता की कमी थी.  इस मामले में गंभीर प्रशासनिक और प्रक्रियागत गलतियांं भी थी.

 

अगर घोटालों की फेहरिस्त पर नज़र डालें, तो तस्वीर निराशाजनक है. 71 सालों में विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका के काम करने के तरीकों ने हमें निराश किया है. सिविल सोसाइटी ने कुछ सफलताएं हासिल किया है, पर सरकार के गलत कामों पर अंकुश लगाने में अभी इसे पर्याप्त सफलता नहीं मिली है. कम साक्षरता दर, रोजगार की कमी, बेरोजगार युवाओं की फ़ौज ने भ्रष्टाचार के प्रति एक सहनशीलता पैदा की है. ऐसे में अभी इन मोर्चों पर काम करना होगा, तभी आने वाले दशक में भारत की तस्वीर बदलेगी.

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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