भारतीय राजनीति की सबसे सुन्दर प्रेम कहानी: वाजपेयी और मिसेज कौल

Balendushekhar Mangalmurty. 

भारतीय राजनीति में भारतीय राजनेताओं के प्रेम सम्बन्ध शोध के विषय कम रहे हैं, और उत्सुकता के विषय ज्यादा रहे हैं. ये भारतीय जनता की जुवेनाइल मेंटालिटी है कि दो परिपक्व लोगों के प्रेम संबंधों का पोस्ट मोर्तेम करते हुए रस ढूंढने का प्रयास करती रही है. यही कारण है कि नेहरु के प्रेम सम्बन्धों को उनके चरित्र से जोड़कर देखा गया, और इस मुहीम में आरएसएस सबसे आगे रहा और नेहरु के प्रेम संबंधों पर चर्चा को उसने sleaze campaign में बदल कर रख दिया. पर इसी आरएसएस बैकग्राउंड से आने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने तमाम धारणाओं को धत्ता बताते हुए असाधारण रूप से  प्रेम किया और वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर को कहना पड़ा: “ये भारतीय राजनीति की सबसे सुन्दर प्रेम कहानी थी.” वाजपेयी राजनीति के क्षेत्र में अजातशत्रु थे, पर प्रेम संबंधों की आंच उनके राजनीतिक करियर पर पड़ सकती थी, खासकर जब बलराज मधोक ने उनके प्रेम सम्बन्ध को लेकर उनपर चारित्रिक आक्षेप लगाए. हालांकि बलराज मधोक सफल नहीं हो पाए और वक़्त के साथ खुद राजनीतिक हाशिये पर चले गए.

वाजपेयी ने पूरी गरिमा से अपना प्रेम सम्बन्ध निभाया और साथ ही राजनीति के शीर्ष पर भी पहुंचे, जब वे भारत के प्रधान मंत्री बने और भारत रत्न से भी नवाजे गए.

हालांकि, दोनों ( वाजपेयी और मिसेज कॉल) ने अपने रिश्ते को कभी कोई नाम नहीं दिया. लेकिन कुलदीप नैयर के अनुसार ये खूबसूरत प्रेम कहानी थी. अटल बिहारी वाजपेयी और राजकुमारी कौल के बीच चला वो रिश्ता खूबसूरत रिश्ते में बुनता चला गया. राजकुमारी कौल को दिल्ली के राजनीतिक हलकों में लोग मिसेज कौल के नाम से जानते थे. हर किसी को मालूम था कि वो अटलजी के लिए सबसे प्रिय हैं.

मई 2014 में जब मिसेज कौल का निधन हुआ तो अखबारों में पहली बार उनके बारे में खबरें छपीं, इसे थोड़ा विस्तार से पहले पेज पर छापा इंडियन एक्सप्रेस ने. जिसे पढ़कर पाठकों ने जाना कि वह अटल जी की जीवन की डोर थीं, उनके घर की सबसे महत्वपूर्ण सदस्य और उनकी सबसे घनिष्ठ भी.

पत्रकार कुलदीप नैयर ने टेलीग्राफ में लिखा, ‘संकोची मिसेज कौल अटल की सबकुछ थीं, जिस तरह उन्होंने उनकी सेवा की, वह शायद कोई कर पाए. वह हमेशा उनके साथ रहीं, जब तक उनका हार्ट अटैक से निधन नहीं हो गया.’

दक्षिण भारत के पत्रकार गिरीश निकम ने एक इंटरव्यू में अटल और श्रीमती कौल को लेकर अनुभव बताए. वह तब से अटल के संपर्क में थे, जब वो प्रधानमंत्री नहीं बने थे. उनका कहना था कि वह जब अटलजी के निवास पर फोन करते थे तब फोन मिसेज कौल उठाया करती थीं. एक बार जब उनकी उनसे बात हुई तो उन्होंने परिचय कुछ यूं दिया, “मैं मिसेज कौल, राजकुमारी कौल हूं. वाजपेयीजी और मैं लंबे समय से दोस्त रहे हैं. 40 से अधिक सालों से.” उन्होंने ये भी बताया कि किस तरह सालों से वाजपेयी जी उनके और उनके पति प्रोफेसर कौल के साथ रहते आए हैं.

एक बार संकोची मिसेज कौल ने एक महिला मैगजीन को 80 के दशक के मध्य में एक इंटरव्यू दिया. जब इंटरव्यू लेने वाले ने उनसे अटल और उनके बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बारे में कभी अपने पति को कोई स्पष्टीकरण देने की जरूरत ही नहीं पड़ी. उन्होंने कहा कि उनके और पति के रिश्ते समझबूझ के स्तर पर काफी मजबूत हैं.

अटल ने तब लव लेटर लिखा
अटलजी पर लिखी गई किताब “अटल बिहारी वाजपेयीः ए मैन ऑफ आल सीजंस” के लेखक और पत्रकार किंगशुक नाग ने लिखा : एक दिन मिसेज कौल कुछ उदास थीं, तब उन्होंने सुनीता से अटल के साथ रिश्तों के बारे में बताया. दोनों एक ही समय ग्वालियर के एक ही कॉलेज में पढ़े थे. ये 40 के दशक के बीच की बात थी.  आमतौर पर प्यार होने पर भी लोग भावनाओं का इजहार नहीं कर पाते थे. पर  युवा अटल ने लाइब्रेरी में एक किताब के अंदर राजकुमारी के लिए एक लेटर रखा.लेकिन उन्हें उस पत्र का कोई जवाब नहीं मिला. वास्तव में राजकुमारी ने जवाब दिया था. जवाब किताब के अंदर ही रखकर अटल के लिए दिया गया था लेकिन वह उन तक नहीं पहुंच सका. इस बीच राजकुमारी के सरकारी अधिकारी पिता उनकी शादी एक युवा कॉलेज टीचर ब्रिज नारायण कौल से कर देते हैं.

 
वह अटल से शादी करना चाहती थीं, लेकिन घर में इसका जबरदस्त विरोध हुआ. हालांकि अटल ब्राह्मण थे लेकिन कौल अपने को कहीं बेहतर कुल का मानते थे. मिसेज कौल की सगाई के लिए जब परिवार ग्वालियर से दिल्ली आया, उन दिनों यहां 1947 में बंटवारे के दौरान दंगा मचा हुआ था. इसके बाद शादी ग्वालियर में हुई.

 
अटल ने प्रणय प्रस्ताव के बाद कभी शादी नहीं की. उन्होंने सियासी दुनिया में कदम रखा. आगे बढ़ते चले गए. वो दोनों एक -डेढ़ दशक बाद फिर तब मिले जब अटल सांसद हो गए. राजकुमारी दिल्ली आ गईं. उनके पति दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में फिलॉस्फी के प्रोफेसर थे. बाद में वह इसी कॉलेज के हास्टल के वार्डन बन गए. बाद में अटल उनके साथ रहने आ गए थे.

उन दिनों के एक विद्यार्थी बताते हैं कि उन दिनों में हमें अंदाज नहीं था कि, अटल और राजकुमारी की दोस्ती है. बाद में कई सालों बाद हमने उन्हें लेकर बातें सुनीं. 1968 में दीन दयाल उपाध्याय के अचानक निधन के बाद जनसंघ के अध्यक्ष के पद के लिए अटल के नाम पर विचार किया गया. तब पार्टी में उनके मजबूत प्रतिद्वंद्वी बलराज मधोक थे. मधोक ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संरसंघ चालक एम एस गोलवरकर के साथ लाबिंग शुरू की. अन्य बातों के अलावा मधोक ने अटल की अनैतिक जीवनशैली पर आरोप लगाए. उन्होंने ये भी कहा कि ऐसी शिकायतें हैं कि एक महिला उनके पास आती है. ये मिसेज कौल की इशारा था, क्योंकि अटल को अक्सर ड्रॉप करने उनके घर आती थीं. हालांकि इन शिकायतों पर कुछ नहीं हुआ.

जिस दिन मिसेज कौल का निधन हुआ, उस दिन इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा. मिसेज कौल के निधन पर प्रेस के एक वर्ग ने उन्हें अटल का पारिवारिक सदस्य कहा.  हकीकत में वह अटल के जीवन का सबकुछ थीं. वह उन्हें भावनात्मक संबल देती थीं. राजनीतिक सर्किल भी मिसेज कौल के महत्व को हमेशा मानता आया है. उनका निधन जब हुआ, तब 2014 के आमचुनाव के अभियान जोरों पर था लेकिन तब भी मिसेज कौल के अंतिम संस्कार में लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज मौजूद रहे. सोनिया भी अटल के निवास पर पहुंचीं, यहां तक कि ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उनके अंतिम संस्कार में पहुंचे. मिसेज कौल के पिता सिंधिया रियासत में ही अफसर थे.

मिसेज कौल के निधन पर ओबिचूएरी लिखते हुए अटल के पूर्व सहायक सुधींद्र कुलकर्णी ने उन्हें यानि राजकुमारी कौल को अटल की दत्तक पुत्री नमिता की मां बताया. वास्तविकता ये है कि जब अटल ने कौल के साथ रहना शुरू किया तो उन्होंने परिवार की दोनों बेटियों नमिता और नम्रता को एडॉप्ट किया.

कुलदीप नैयर ने टेलीग्राफ में लिखा, आजादी के बाद जितने भी प्रधानमंत्री हुए, उनके घर में रहने वालों में आंटी सबसे शिष्ट और लोप्रोफाइल में रहने वाली महिला थीं, उनके बारे में वही लोग जानते थे, जो अटल जी की प्राइवेट लाइफ के बारे में जानते थे. उनके निधन के साथ ही भारतीय राजनीति की सबसे महान स्टोरी का अंत हो गया.

अटल की दत्तक पुत्री नमिता का रोमांस रंजन भट्टाचार्य से 80 के दशक में परवान चढ़ा, वैसे उनकी मुलाकात 1977 में यूनिवर्सिटी के दिनों में हो चुकी थी. रंजन ओबराय होटल में काम करते थे जबकि नमिता दिल्ली यूनिवर्सिटी के दौलत राम कॉलेज में पढ़ाई करने के बाद मौर्या होटल में काम करने लगी थीं. जब रंजन घर आने लगे तो शुरू में अटल उनसे दूरी बनाकर रखते थे लेकिन बाद में उन्होंने अटल का दिल जीत लिया और दोनों की शादी हो गई. शादी के बाद वह भी साथ रहने आ गए. वह अटल को बापजी कहते थे. जल्दी ही वह उनके बहुत करीब भी आ गए. जल्दी ही रंजन ने नौकरी छोड़ दी और खुद उद्यमी बन गए. उन्होंने मनाली में होटल बनवाया. उसके बाद कई व्यावसाय शुरू किए. कई शहरों में कार्लसन और चाणक्य होटलों के साथ संयुक्त उपक्रम शुरू किया. जब अटल की सरकार महज 13 दिनों तक चली थी, तब भी उन्होंने उसमें रंजन को ऑफिसर आन स्पेशल ड्यूटी (ओएसडी) नियुक्त किया. हालांकि जब अटल दोबारा पांच साल के प्रधानमंत्री बने तो रंजन को कोई आधिकारिक पोजिशन तो नहीं मिली लेकिन उनका प्रभाव राजनीतिक और कारोबारी सर्किल में बहुत ज्यादा था. वह प्रधानमंत्री हाउस में ही रहते थे.

मिसेज कौल की दूसरी बेटी नम्रता डॉक्टर बनीं और न्यूयार्क चली गई. वह वहीं रहती हैं. उनके पिता ब्रिज नारायण कौल ने अपने आखिरी दिन उसी के साथ गुजारे. वह वहां बेहतर ट्रीटमेंट के सिलसिले में गए थे. ये अटल के प्रधानमंत्री बनने से पहले की बात है. नैयर ने लिखा है कि बेशक जब अटल प्रधानमंत्री बने तो आधिकारिक कार्यक्रमों और विदेशी दौरों में मिसेज कौल का नाम प्रोटोकाल में नहीं होता था और वह कभी प्रधानमंत्री अटल के साथ विदेश दौरों में भी नहीं गईं लेकिन उनकी मौजूदगी हर ट्रिप में महसूस होती थी.

 

जिस वक्त मिसेज कौल का निधन हुआ, अटल बिहारी वाजपेयी अल्जाइमर रोग से ग्रस्त हो चुके थे. बावजूद इसके मिसेज कौल के अंतिम संस्कार में लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज मौजूद रहे. सोनिया भी अटल के निवास पर पहुंचीं, यहां तक कि ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उनके अंतिम संस्कार में पहुंचे.

2014 में मिसेज कॉल के देहांत के बाद वाजपेयी नितांत अकेले हो गए. अकेलेपन में वे अवसाद ग्रस्त रहने लगे. सार्वजनिक जीवन से किनारा करने लगे. और फिर वे अल्जेमर की गिरफ्त में आ गए. पिछले कई वर्षों से आम जनता वाजपेयी के बारे में अटकलें ही लगा रही थी. पर 16 अगस्त 2018 को पूर्व प्रधानमंत्री के देहांत के साथ ही भारतीय राजनीति के इस महान प्रेम कहानी का अंत हो गया. पर इसकी यादें हमेशा हमारे जेहन में रहेंगी.


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