शकीरा नमाजी खलीली मर्डर मिस्ट्री, जिसने 1990 के दशक में हिंदुस्तान का दिल दहला दिया था

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति.

1980 के दशक की बात है.शाकिरा नमाजी खलीली नाम था उसका. मैसूर राजघराने के दीवान की बेटी. वो बेहद खूबसूरत थी. मैसूर राजघराने के दीवान की बेटी. रिटायर्ड आईएफएस अफसर और ऑस्ट्रेलिया में हाई कमिश्नर रहे अकबर मिर्जा खलीली से शादी हुई.  उन दिनों ईरान में बतौर भारतीय राजदूत तैनात थे. शकीरा और अकबर की चार बेटियां थीं. यह परिवार हर तरह से संपन्न था लेकिन शकीरा के मन में एक टीस थी कि उनका कोई बेटा नहीं है. उन्हें एक बेटे की चाहत थी.

पहली बार स्वामी श्रद्धानंद और शकीरा 1983 में दिल्ली में मिले:

1983 में रामपुर के नवाब के बुलावे पर शकीरा एक आयोजन में शामिल होने दिल्ली आई थीं. यहां उनकी मुलाकात मुरली मनोहर मिश्रा उर्फ़ स्वामी श्रद्धानंद से हुई. श्रद्धानंद रामपुर के नवाब की संपत्ति की देखभाल करता था और ज़मीन संबंधी कानूनों का अच्छा जानकार था. शकीरा उन दिनों लैंड सीलिंग कानूनों के चलते कुछ परेशान थीं. लिहाजा उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद को बैंगलोर आकर उनकी समस्याएं सुलझाने को कहा.

इस मुलाकात के कुछ समय बाद ही स्वामी श्रद्धानंद बैंगलोर पहुंच गया. शकीरा का बैंगलोर के पॉश इलाके – रिचमंड रोड – पर करीब 38 हजार वर्गफुट में फैला एक आलीशान बंगला था.  उसने संपत्ति के मामलों में शकीरा की मदद करने के साथ ही उनसे व्यक्तिगत नजदीकियां बढ़ाना भी शुरू कर दिया.  शकीरा के मन में बेटा हासिल करने की गहरी चाहत है. उसने शकीरा को बहकाना शुरू किया कि वह परालौकिक शक्तियों के जरिये शकीरा की वर्षों पुरानी चाहत पूरी कर सकता है. धीरे-धीरे दोनों इतने करीब आ गए  कि 1985 आते-आते शकीरा ने अपने पति से तलाक ले लिया और फिर श्रद्धानंद से शादी कर ली. शादी के बाद के पांच साल रोमांस में गुजरे. दोनों बेहद खुश थे. पर स्वामी की अन्य महिलाओं के साथ प्रेम संबधों और फ़्लर्ट करने की आदत से दम्पत्ति के संबध में दरार आने लगी. श्रद्धानंद को हमेशा डर सताता था कि अगर शकीरा ने उसे तलाक दे दिया, और दौलत से बेदखल कर दिया, तो फिर वो ये ऐय्याशी की जिंदगी कैसे जियेगा. इसके लिए उसने चाल चलनी शुरू की.

शादी के कुछ ही सालों के भीतर श्रद्धानंद ने शकीरा की तमाम संपत्तियों की पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी अपने नाम करवा ली. साथ ही उसने शकीरा के साथ कई संयुक्त बैंक खाते और लॉकर भी खुलवा लिए. पर इतना उसे नाकाफी लगा. उसने शकीरा को हमेशा के लिए अपनी जिंदगी से हटा देने का फैसला कर लिया.

यह 1991 की बात है. श्रद्धानंद शकीरा के साथ उसके रिचमंड रोड स्थित बंगले में रहा करता था. एक दिन श्रद्धानंद ने अपने और शकीरा के बेडरूम से लगते लॉन में खुदाई करवाना शुरू किया. शकीरा के पूछने पर उसने बताया कि वह शौचालय के सोकपिट के लिए यह खुदाई करवा रहा है. शकीरा को इस बात का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि श्रद्धानंद के इरादे कुछ और ही हैं. वह नहीं जानती थी कि जिस व्यक्ति पर वो सबसे ज्यादा विश्वास करती हैं, वह उनके ही घर में, उसकी आंखों के सामने ही उसकी कब्र खुदवा रहा था.

और फिर एक दिन शकीरा अचानक गायब हो गयी. 

श्रद्धानंद से शादी करने पर शकीरा का अपने अधिकतर रिश्तेदारों से संपर्क टूट चुका था. लेकिन उसके माता-पिता और उसकी बेटियां हमेशा उनके संपर्क में बने रहे थे. खासकर शकीरा की दूसरी बेटी सबा, जो बॉम्बे रहती थी, लगभग हर रोज़ ही अपनी मां से बात किया करती थी. 28 मई के बाद जब सबा कई दिनों तक अपनी मां से संपर्क नहीं कर सकी तो उसने श्रद्धानंद से शकीरा के बारे पूछा. इस पर श्रद्धानंद ने बहाना बना दिया कि वह शहर से बाहर गई है.

कई दिन और महीने बीत गए लेकिन सबा का अपनी मां से कोई संपर्क नहीं हो सका. श्रद्धानंद के गोल-मोल जवाबों से हताश होकर आखिरकार सबा बैंगलोर आ पहुंची. लेकिन घर पर भी उसे शकीरा की कोई खबर नहीं मिली. इस बार श्रद्धानंद ने उससे एक नया झूठ बोला. उसने सबा को बताया कि शकीरा गर्भवती है और बच्चे को जन्म देने अमेरिका गई है. सबा ने श्रद्धानंद के बताए अमेरिकी अस्पताल फोन किया तो उसे मालूम हुआ कि शकीरा नाम की या सबा द्वारा बताए जा रहे हुलिए की कोई भारतीय महिला वहां कभी आई ही नहीं. इससे सबा का शक गहरा गया कि श्रद्धानंद उसकी मां के बारे में झूठ बोल रहा है. उसका यह शक तब यकीन में बदल गया जब कुछ ही दिनों बाद उसे अपनी मां का पासपोर्ट मिला. इससे साफ़ हो गया कि शकीरा विदेश नहीं गईं और श्रद्धानंद लगातार झूठ बोल रहा है.

शकीरा को गायब हुए अब तक एक साल से ज्यादा का समय बीत चुका था. 10 जून 1992 को सबा ने पहली बार बैंगलोर के अशोक नगर थाने में शकीरा के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज कराई. इस रिपोर्ट को भी कई साल बीत गए लेकिन शकीरा का कोई पता नहीं चला. इधर, श्रद्धानंद अब तक शकीरा की संपत्ति का अकेला मालिक होने के चलते बेहद रसूख वाला आदमी बन चुका था. उसने शकीरा की मौत के बाद से पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी के जरिये उसकी कई संपत्तियां बेच डाली थीं और लगभग सभी लॉकर खाली कर दिए थे. शकीरा के गायब होने के मामले में पुलिस को उस पर शक तो था लेकिन उसके रसूख के चलते पुलिस उस पर हाथ डालने से कतरा रही थी. लेकिन सबा ने हार नहीं मानी थी. आखिरकार उसी के प्रयासों के चलते मार्च 1994 में ‘गुमशुदा’ शकीरा को खोजने की जिम्मेदारी सेंट्रल क्राइम ब्रांच (बैंगलोर) को सौंप दी गई.

मर्डर मिस्ट्री की गुत्थी अचानक से सुलझी:

पुलिस को पहला शक स्वामी पर था. उससे पूछताछ भी की गई थी,. लेकिन उसका शहर में काफी रसूख था, लिहाजा पुलिस उससे सख्ती नहीं कर सकी. काफी पड़ताल के बाद भी कोई सुराग नहीं मिल रहा था.   ऐसे में नौबत केस बंद करने तक आ गई. लेकिन एक दिन ऐसा कुछ हुआ कि शाकिरा मिल गई. वो रात थी 29 अप्रैल 1994 की. बेंगलुरु क्राइम ब्रांच का कॉस्टेबल एक ठेके पर बैठा था. तभी शराब में धुत एक शख्स आया. वो कॉस्टेबल के सामने ही कहने लगा कि जिस शाकिरा को पुलिस ढूंढ रही है वो तो जिंदा ही नहीं है. पुलिस ने उस शख्स को कस्टडी में लेकर पूछताछ की. ये शख्स कोई और नहीं बल्कि स्वामी का नौकर था. उसने बताया कि स्वामी ने शाकिरा को जिंदा ही ताबूत में बंद कर दफना दिया.

नौकर से हुई पूछताछ के आधार पर स्वामी को हिरासत में लेकर कड़ी पूछताछ की गई. तब जाकर उसने सबकुछ उगला. उसने बताया कि उसने शाकिरा से उसकी दौलत के लिए प्यार और फिर शादी की थी. उसे वो दौलत मिलने भी वाली थी, लेकिन शाकिरा ने अपनी सारी दौलत और प्रापर्टी चारों बेटियों को देने का फैसला कर लिया. जिसके बाद उसने शाकिरा की हत्या का प्लान बनाया. 28 अप्रैल 1991 का दिन था. स्वामी ने घर के सारे नौकरों को छुट्टी दे दी, फिर खुद से चाय बनाई और उसमें बेहोशी की दवा मिला दी. चाय पीने के बाद शाकिरा बेहोश हुई तो उसे एक गद्दे में लपेटकर ताबूत में डाल दिया. फिर जिंदा दफना दिया. उसके ऊपर शानदार टाइल्स लगवा दिए. तीन साल तक वो उसी आंगन में अपनी बीवी की कब्र के ऊपर रात को पार्टी करता रहा. शराब पीकर दोस्तों के साथ नाचता रहा.

ताबूत के अंदर नाखून की खंरोच के निशान भी मिले. जिसे देखकर लगा कि होश में आने के बाद शाकिरा ने बाहर निकलने की काफी कोशिश की और अन्त में तड़पड़ते-तड़पते दम तोड़ दिया. ताबूत से बरामद अंगूठियों और चूड़ियों से शाकिरा की पहचान हुई.

 

जुडिशल इनोवेशन का मामला बना:

बैंगलोर जिला न्यायालय ने इस मामले में सजा सुनाने में लगभग 11 साल का समय लिया और अंततः स्वामी श्रद्धानंद को फांसी की सजा सुनाई. कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी जिला न्यायालय के फैसले को सही माना. उच्च न्यायालय ने माना कि जिस निर्दयता से श्रद्धानंद ने उस व्यक्ति की हत्या की जो उस पर सबसे ज्यादा विश्वास करती थी, उसे देखते हुए फांसी की सजा ही उसके लिए एक मात्र विकल्प है. साल 2006 में यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा. यहां जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस एसबी सिन्हा की पीठ ने इसकी सुनवाई की. इन दोनों ही जजों की इस मामले में अलग-अलग राय बनी. एक तरफ जस्टिस काटजू ने जिला न्यायालय और कर्नाटक उच्च न्यायालय की तरह ही इस मामले में फांसी की सजा को उचित समझा तो दूसरी तरफ जस्टिस सिन्हा ने माना कि यह मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर’ की उस श्रेणी में नहीं आता जिसमें फांसी ही एकमात्र सजा होती है. जस्टिस सिन्हा का मानना था कि इस मामले में फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया जाना चाहिए लेकिन इस शर्त के साथ कि श्रद्धानंद ताउम्र जेल में ही रहे और 14 साल की सजा पूरी करने पर उसे रिहा न कर दिया जाए.

दोनों जजों की अलग-अलग राय होने के चलते यह मामला तीन जजों की पीठ में पहुंचा. जस्टिस बीएन अग्रवाल, जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस आफ़ताब आलम की संयुक्त पीठ ने 22 जुलाई 2008 को इस मामले में अंतिम फैसला सुनाया. इस पीठ ने जस्टिस एसबी सिन्हा को सही मानते हुए श्रद्धानंद की फांसी को ऐसी उम्रकैद में बदल दिया जिसमें श्रद्धानंद को पूरी उम्र जेल में ही गुजारनी होगी और वह 14 साल सजा काटने के बाद भी माफ़ी के लिए आवेदन का हकदार नहीं होगा.

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने दंड प्रक्रिया की उस नई राह पर सहमति की मोहर लगा दी जो श्रद्धानंद के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ही खोजी थी. इस राह को ‘जुडिशल इनोवेशन’ भी कहा जाता है.


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