अपील: सरकार एनजीओ सेक्टर से दलालों और सोशलाइट को बाहर निकाले !!

एनजीओ सेक्टर में एक्टिव fly by night operators के खिलाफ बिहार सरकार एक्शन ले. पर टब वाटर के साथ बेबी को भी फेंक देना बुद्दिमानी नहीं. 
बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति. 
समय फिलहाल गैर सरकारी संस्थाओं के खिलाफ है. सरकार ने भी एक तरह से एनजीओ सेक्टर के खिलाफ witch hunting शुरू कर दी है. ताजा उदहारण, शेल्टर होम का संचालन एनजीओ के हाथ से लेकर सरकारी हाथों में केन्द्रित करना है.
पर यह समस्या का सही समाधान नहीं है. एनजीओ बदनाम हुए हैं ब्रजेश ठाकुर जैसे दलालों और मनीषा दयाल जैसे पेज थ्री सोशलाइट के इस सेक्टर में आने के चलते (ये तो fly by night operators हैं). पर शेल्टर होम की गड़बड़ी ब्रजेश ठाकुर और मनीषा दयाल जैसे लोगों ने सरकारी अधिकारीयों के साथ हाथ मिलाकर ही तो किया, तो फिर सरकारी अधिकारीयों के हाथ में आ जाने भर से ही शेल्टर होम भविष्य में सुरक्षित हो जायेंगे, ये मानना बिलकुल संदेह से भरा है.
 
अगर हम बिहार सरकार को देखें, तो सरकार खुद कई काम एनजीओ बनाकर कर रही है. वर्ल्ड बैंक का पंचायतों को मज़बूत करने का प्रोजेक्ट बिहार सरकार एनजीओ बना कर ही कर रही है. और बिस्कोमान भवन में स्थित बिहार राज्य पंचायती सोसाइटी क्या कर रहा है? जब बिहार में पंचायतों को ट्रेनिंग देने की बात होती है, तो फिर वो टेंडर निकालता है, और एनजीओ को काम सौंपता है, पर ये सरकारी एनजीओ टेंडर देने में पूरी तरह से ट्रांसपेरेंसी का उल्लंघन करता है. किन्हें मिला, कैसे मिला? कोई जानकारी नहीं. जो रिजेक्ट किये गए, उन्हें एक ईमेल तक नहीं. सब कुछ गुपचुप.
 
मै बता दूँ, कि बिहार में एनजीओ प्रोजेक्ट पाते हैं, नेताओं के साथ नेटवर्किंग के चलते नहीं. बल्कि सरकारी विभागों के बाबुओं के साथ गोरखधंधा करके. उन्हें कमीशन देकर. नेताओं की तो छोडिये, मंत्रियों की भी नहीं सुनते ये बाबू लोग.
 
आगे बढ़ें तो हम पाते हैं, कि पूरा जीविका प्रोजेक्ट एनजीओ मोड में चल रहा है. सरकार खुद एनजीओ बनाकर काम कर रही है, और गैर सरकारी एनजीओ के खिलाफ आग उगल रही है.
 
ये बेहद परेशां करने वाली तस्वीर है. सवाल ये है कि क्या सारा काम सरकार ही करेगी? सरकार क्या चाहती है कि फिर से लाइसेंस, कोटा, परमिट राज लाया जाए? क्या सरकार के पास इतना मैनपावर है कि वो हर काम कर सके? और अगर कर सकती है तो फिर उसका बजट कितना ऊपर भाग जाएगा? मै गया जिले में मोनिटरिंग के लिए गया था, वहां मैंने दो तालाब देखे. एक जो हमारी संस्था CWS ने ग्रामीणों के सहयोग से बनाया था, और बगल में ही सरकारी तालाब. सरकारी तालाब न केवल खर्चीला बना था, बल्कि सुखा हुआ था, जबकि एनजीओ के द्वारा ग्रामीणों के सहयोग से बनाया गया तालाब पानी से लबालब भरा हुआ था.
 
तो ऐसे में सरकारी तंत्र आम आदमी के हाथ में इनिशिएटिव नहीं आने देता. वो फाइल वर्क में कामों को उलझा देता है और कमीशन खोरी की आदत तो खैर मिथकीय स्तर तक पहुँच चुकी है.
 
एनजीओ क्या है? एनजीओ सरकार से परे आम आदमी, समाज के द्वारा समाज के लिए कुछ करने की चाह और प्रयास है, तो जब तक ये जज्बा रहेगा, एनजीओ रहेंगे.
 
ऐसे में जरुरत है कि सरकार वहां इलाज़ करे, जहाँ पर घाव है. फिलहाल घाव से एक फीट दूर इलाज़ चल रहा है. सडन बदस्तूर जारी है. कड़ी मोनिटरिंग कीजिये और दलालों और socialites को समाज सेवा के सेक्टर से बाहर कीजिये. छापा मारी चल रही है और प्रातः कमल के दफ्तर से कार्टन के कार्टन कंडोम निकल रहे हैं, सेक्स दवाएं और पोर्न सीडी निकल रही हैं, ये क्या है?
 
marginalised.in इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करता है. एनजीओ के संघर्ष, और समाजिक सेवा के क्षेत्र में योगदान का लंबा इतिहास रहा है. ऐसे में ये वेब पोर्टल सरकार और लोगों के मन में एनजीओ के प्रति नेगेटिव छवि को समाप्त करने के लिए एनजीओ की सक्सेस स्टोरीज पर एक सीरीज चलाएगा.
 
जिन संस्थाओं को कुछ कहना है, वे मुझसे bsmangalmurty@gmail.com पर संपर्क करें. संस्थाओं को मरना नहीं चाहिए और अच्छी संस्थाओं को बिना डर, भय के अपना काम करना चाहिए. समाज को उनकी बहुत जरुरत है.

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