तमिलनाडु की राजनीति का शर्मनाक दिन, जब डीएमके विधायकों ने जयललिता की साड़ी खोलने की कोशिश की

पांच बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और समर्थकों में ‘अम्मा’ के नाम से मशहूर जयललिता जयरामन के जीवन का सफरनामा बेहद रोमांच और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. फिल्मों से शुरुआत करने वाली जयललिता का अपना जीवन भी कम फिल्मी नहीं रहा. वे बहुत कामयाब वकील बनना चाहती थीं, लेकिन करियर शुरू किया फिल्मों से और अंतत: तमिलनाडु की सियासत के शिखर पा जा पहुंचीं.

उन्होंने कुल मिलाकर 140 फिल्मों में काम किया. एमजीआर ने 1972 में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) की स्थापना की थी. 1982 में जयललिता ने भी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करके अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की.

1983 में वे पार्टी की प्रचार प्रमुख बनीं और विधायक भी चुनी गईं. वे एक बार राज्यसभा के लिए मनोनीत हुईं और पांच बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी.

उनकी कल्याणकारी योजनाओं ने उनकी छवि मसीहा के रूप में गढ़ी है. उनके समर्थकों द्वारा पोस्टरों में उन्हें देवी के रूप में चित्रित किया जाता है. सस्ते खाने की कैंटीन, अम्मा रसोईं, सस्ता नमक, दवाखाना, पानी की बोतल, सीमेंट आदि के साथ जुड़े ‘अम्मा’ शब्द ने उनकी छवि गढ़ने और उन्हें लोकप्रिय बनाने में बेहद अहम रहे हैं.

उनके राजनीतिक करियर में मुश्किलों की शुरुआत उस समय हुई जब 1988 में एमजीआर का निधन हो गया. एमजीआर की शवयात्रा के समय एमजीआर की पत्नी ने समर्थकों के साथ जयललिता के साथ कथित दुर्व्यवहार भरा बर्ताव किया. एमजीआर के देहांत के बाद उनके परिवार वालों ने जयललिता को घर में नहीं घुसने दिया. जयललिता किसी तरह कोशिश करके एमजीआर के शव तक पहुंच गई तो उन्हें तरह तरह से अपमानित किया गया. उन पर हमला किया गया. इसके बाद जयललिता ने शव यात्रा में भाग नहीं लिया और वापस अपने घर आ गईं.

 

करूणानिधि और जयललिता की दुश्मनी:

नेताओं के बीच दुश्मनी तो अक्सर देखने को मिलती ही है, लेकिन करुणानिधि और जयललिता की दुश्मनी का स्तर अलग था.

दोनों ही ​दक्षिण भारत की राजनीति के मजबूत नेता थे और दोनों ने राजनीतिक दुश्मनी उस हद ​तक निभाई जैसी बहुत कम देखने को मिलती है और दक्षिण भारतीय राजनीति में तो और भी मुश्किल.

बाक़ी नेताओं से अलग ये दोनों विधानसभा में कभी ज़्यादा मुस्कुराए नहीं या संसदीय मज़ाक नहीं किया. वो एक ही जगह थी जहां वो बहुत कम ही सही पर एक-दूसरे के सामने आए.

तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि के बीच तनवापूर्ण रिश्तों के चलते स्थितियां दूसरे राज्यों जैसी नहीं थी.

यहां अन्य राज्यों की तरह एक मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता का एक ही मंच साझा करना या राष्ट्रीय नेताओं के स्वागत के लिए आधिकारिक लंच या डिनर में शामिल होने का चलन नहीं रहा.

जय​ललिता पर लिखी गई एक किताब की लेखिका और तमिलनाडु पर वरिष्ठ राजनी​तिक विश्लेषक वसंती कहती हैं, ”वो सिर्फ़ एक-दूसरे को नापसंद ही नहीं करते थे बल्कि दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह नफ़रत करते थे.”

वो घटना जो जयललिता के राजनीतिक उत्थान का सबब बनी:

जयललिता की जीवनी ‘अम्‍मा जर्नी फ्राम मूवी स्‍टार टू पॉलिटिकल क्‍वीन’ में लेखिका वासंती ने एक घटना का विस्‍तार से जिक्र करते इस ओर इशारा किया है कि आखिर कौन सी एक घटना जयललिता के लिए राजनीतिक उत्‍थान का सबब बनी और इसके चलते वह एक मजबूत नेता बनकर उभरीं और तमिलनाडु में ‘अम्‍मा’ के नाम  से मशहूर हुईं.

इस वाकये के मुताबिक 25 अगस्‍त 1989 के दिन जब मुख्‍यमंत्री एम करुणानिधि ने जब तमिलनाडु विधानसभा का बजट पेश करना शुरू ही किया था तभी विपक्ष की नेता जयललिता ने सदन में शिकायत करते हुए कहा कि सत्‍ता पक्ष के इशारे पर पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई कर रही है. उनके फोन को टैप किया जा रहा है. कांग्रेस के सदस्‍यों ने उनका समर्थन किया और बहस की मांग की. स्‍पीकर ने बजट पेश किए जाने का हवाला देते हुए कहा कि इसके चलते बहस की अनुमति नहीं दी जा सकती.

इससे जयललिता की पार्टी अन्‍नाद्रमुक के सदस्‍यों ने सदन में शोरशराबा शुरू कर दिया और वेल तक पहुंच गए. इसके एक सदस्‍य ने करुणानिधि को धक्‍का देने की कोशिश की, जिससे उनका संतुलन बिगड़ गया और उनका चश्‍मा जमीन पर गिरकर टूट गया. अन्‍नाद्रमुक के एक सदस्‍य ने बजट के पन्‍नों को फाड़ दिया.

बढ़ते हंगामे के बीच स्‍पीकर ने सदन को स्‍थगित कर दिया. जयललिता भी सदन से निकलने लगीं तभी सत्‍ताधारी डीएमके के एक सदस्‍य ने उन्‍हें रोकने की कोशिश की. उसने उनकी साड़ी इस तरह से खींची कि उनका पल्‍लू गिर गया. जयललिता भी जमीन पर गिर गईं.

इस घटनाक्रम के बीच अन्‍नाद्रमुक के एक सदस्‍य जयललिता की मदद के लिए लपके. डीएमके सदस्‍य की कलाई पर जोर से वार कर जयललिता को उनके चंगुल से छुड़वाया. इस अपमान से आहत हुई जयललिता ने पांचाली की तरह प्रतिज्ञा ली कि अब वो उस सदन में तभी फिर कदम रखेंगी जब वो महिलाओं के लिए सुरक्षित हो जाएगा. यानी एक तरह से उन्‍होंने अपने आप से वादा किया कि अब वो तमिलनाडु विधानसभा में मुख्‍यमंत्री के रूप में ही वापसी करेंगी.

इसके दो वर्षों के भीतर 1991 में हुए चुनाव के दौरान अपने अपमान का जिक्र बार-बार अभियान में किया. नतीजतन उपजी सहानुभूति का उनको लाभ मिला और वह चुनाव जीतकर पहली बार मुख्‍यमंत्री बनीं और राज्‍य में महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से कई उपाय किए. नतीजतन लोगों ने उनको ‘अम्‍मा’ कहना शुरू कर दिया.


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