गंगा मुक्ति आन्दोलन जिसने गंगा नदी पर ज़मींदारी को चुनौती दी और जलदारी को खत्म किया

Balendushekhar Mangalmurty, Editor-in-Chief of marginalised.in

सुनने में अजीब लगता है, पर सच यही है कि बिहार में एक समय नदी पर भी ज़मींदारी थी. भागलपुर के सुल्तानगंज से लेकर कटिहार के बरारी तक गंगा नदी पर जमींदारी थी. इलाके में इसे जल कर और पानीदारी के नाम से जाना जाता था.  इसी पानीदारी  के खिलाफ सिविल सोसाइटी के लोगों ने जो मुहीम चलाई, वो गंगा मुक्ति आन्दोलन के नाम से जानी गयी.  22 फ़रवरी, 1982 को शुरू हुआ आंदोलन ‘गंगा मुक्ति आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है, जिसे 9 साल के लम्बे और कई बार हिंसक संघर्ष के बाद 1991 में  सफलता मिली, जब लालू यादव की सरकार ने गंगा पर से जल कर ख़त्म कर दिया.

गंगा के इस हिस्से में ज़मींदारी उर्फ़ पानीदारी मुगलों के समय से चली आ रही थी और जब देश में ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया, तब भी पानीदारी बदस्तूर जारी रही. पूरा हिस्सा दो भागों में बाँट दिया गया था. एक एक हिस्सा एक एक जमींदार के हिस्से. सुल्तानगंज से बटेश्वर स्थान तक गंगा की ज़मींदारी श्रीराम घोष और बटेश्वर स्थान से बरारी तक की ज़मींदारी मुशर्रफ़ हुसैन प्रमाणिक के परिवारों के पास थी. जमींदार अपने अपने इलाकों में मछली मारने की ठेकेदारी ठेकेदारों को दे दिया करते थे, बदले में ठेकेदार मछुआरों को मछली मारने का पत्ता दिया करते थे और हर मछुआरे से सलाना 700 से 2000 रूपये तक वसूला करते थे.  ये एक बेहद शोषक व्यवस्था थी.  मछुआरे कई स्तर पर शोषण का शिकार होते थे. ठेकेदार तो उनका शोषण करते ही थे, इस इलाके में सक्रीय क्रिमिनल गैंग्स भी मछुआरोंसे पैसे वसूला करते थे और कई बार उनकी नाव और जाल भी जब्त कर लिया करते थे. कहने की जरुरत नहीं कि इन क्रिमिनल गैंग्स के सर पर किनका हाथ हुआ करता था.

मछुअरानों का बदस्तूर यौन शोषण:

इतना ही नहीं, मछुआरनें इन ज़मींदारों, ठेकेदारों और क्रिमिनल गैंग्स के हाथों यौन शोषण का शिकार हुआ करती थीं. इन दबंग लोगों की दहशत कुछ इतनी थी कि कागज़ी मोहल्ले ( जहाँ से आन्दोलन शुरू हुआ) में मछुआरे की बस्ती में अगर कोई दबंग चला जाता था इन मछुआरनों के साथ यौन सम्बन्ध बनाने के लिए, तो अगर मछुआरे घर आ रहे होते थे, और अगर उन्होंने अपने घर के बाहर नए चप्पलों और जूतों की जोड़ी देख लिया करते थे, तो वहीँ से वापस हो लिया करते थे, घर में घुसने की हिम्मत नहीं थी इनकी.

पर जैसा कि कहावत है कि हर चीज का अंत होता है. तो 1981 में जेपी के आदर्शों से प्रभावित होकर युवा, सामाजिक कार्यकर्ता भागलपुर के कागज़ी टोले में जुटने लगे. इस आंदोलन का केंद्र भागलपुर ज़िले के कहलगांव का काग़ज़ी टोला था. गंगा के किनारे बसा यह मोहल्ला मछुआरों की बस्ती है.

इस आंदोलन में महिलाओं की अहम भूमिका रही. दरअसल इस आंदोलन को गढ़ने और आगे बढ़ाने में लोकनायक जय प्रकाश नारायण स्थापित छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका रही है.

योगेंद्र सहनी कहते हैं: ”हम मछली का शिकार करते थे तो हम लोगों से कर वसूला जाता था. जाल की किस्म के हिसाब से पट्टा लिया जाता था. किसी साल पट्टा नहीं दे पाए तो नाव चलाना मुश्किल होता था.” छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की तरह ही इस आंदोलन में भी बड़े पैमाने पर महिलाओं ख़ासकर मछुआरा समुदाय की औरतों को, शामिल किया गया. संघर्ष वाहिनी से जुड़े पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अनिल प्रकाश गंगा मुक्ति आंदोलन के संयोजक थे. उन्होंने कहा, ”जमींदारी में महिलाओं का भी शोषण होता था. एक लंबी प्रक्रिया के बाद महिलाओं को जगाना और उनको संगठित करना मुमकिन हुआ. बाद में वह नेतृत्व की भूमिका में भी आईं.”

भागलपुर के रहने वाले अर्धेन्दु घोष उर्फ़ पलटन घोष श्रीराम घोष के परिवार की चौतीसवीं पीढ़ी के सदस्य हैं. उन्होंने कहा, ”अकबर के ज़माने में हमारे पूर्वज श्रीराम घोष क़ानूनगो बनाए गए थे. तब उन्हें यह जल कर और दूसरी जायदाद मिली थी.” पलटन घोष का कहना है कि साल 1930 के बाद उनका परिवार इन संपत्तियों का महज़ सेवायत यानी देखभाल करने वाला रह गया था. यह संपत्ति क़ानूनी रूप से पारिवारिक देवी-देवताओं के नाम कर दी गई थी. श्रीराम घोष परिवार की पुरानी संपत्ति का एक हिस्सा आज भी भागलपुर के चंपानगर इलाके में महेश ड्योढी में मौजूद है. गंगा मुक्ति आंदोलन के बारे में उन्होंने कहा, “जल कर ख़त्म होने के पहले तक हम मंदिर और पुजारियों के खर्च के लिए नदी के अलग-अलग हिस्से लीज़ पर देते थे.” पलटन इससे इंकार नहीं करते कि लीज़ के पैसों का कुछ हिस्सा उनके परिवार के पास भी आता था.

इस आन्दोलन के दौरान कई शानदार वाकिये हुए. शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुआ अन्दोलन कई बार हिंसक झड़प की शक्ल भी अख्तियार कर लिया करता था. ज़मींदारों के लठैत लाठियों और गोली बंदूकों का सहारा भी लेते थे. एक बार इन लठैतों  ने मछुआरों का जाल-मछली लूट लिया. तो इस बार पुरुष नहीं  महिलाएं सुबह-सुबह उनके पास पहुँच गयीं. उन पर बंदूक तान दी गई. आसमानी फायरिंग की गई. लेकिन महिलाएं डरी नहीं. और वे अपनी मांग पर  डटी रहीं. अंत में उन लठैतों को झुकना पड़ा. ये बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत थी.

इसी क्रम में एक बार ज़मींदारों और उनके ठेकेदारों ने तय किया कि गंगा मुक्ति आन्दोलन से जुड़े नेताओं का अपहरण करके ह्त्या कर दी जाए. इसी क्रम में पटना की ओर जाते समय इन कार्यकर्ताओं का अपहरण कर लिया गया और उन्हें दियारा इलाके में ले जाया गया. एक दिन से अधिक समय तक वे इन हत्यारों की कैद में रहे, पर जेपी के चेलों ने हिम्मत नहीं हारी. बातचीत जारी रही. अंत में उन बदमाशों ने न केवल उन्हें रिहा किया बल्कि आगे की यात्रा के लिए खाने पीने का भी सामान दिया.

आन्दोलन लम्बे समय तक चलना था, तो ऐसे में पैसे की समस्या भी आई. शुरुआत में तय किया गया कि  हर परिवार एक रुपया रोज चंदा देगा.  लेकिन इतना चंदा देना भी मुश्किल होता था. ऐसे में हर परिवार के लिए महीने में पंद्रह रुपये का चंदा तय किया गया. ठीक इसी तरह आन्दोलन से जुड़े बाहर के साथियों के लिए भोजन की समस्या भी सामने आई.  ‘काग़ज़ी टोला में कभी-कभी बीस-पच्चीस की तादाद में बाहर के साथी पहुंचते थे. आंदोलन के पास पैसा बहुत था नहीं. ऐसे में मछुआरों ने ये रास्ता निकाला कि बाहर से आने वाले साथी एक-एक कर अलग-अलग परिवारों में खाना खाएंगे. इसका एक फ़ायदा यह भी हुआ कि खाने के समय की बातचीत से आंदोलन को आगे बढ़ाने में मदद मिली.

लालू यादव की सरकार के दौरान 1991 में जल कर ख़त्म किया गया था. आन्दोलनकर्ताओं को  अख़बारों के ज़रिए यह ख़बर मिली. ख़बर मिलने के बाद उन्होंने  काग़ज़ की नाव बनाई और उसे ठेले पर सजाकर कहलगांव की सड़कों पर अपनी आज़ादी का जुलूस निकाला.

 

सफलता के बाद भी चुनौतियाँ पूरी तरह ख़त्म नहीं हुईं:

लेकिन जल कर ख़त्म होने से मिली आज़ादी बहुत जल्दी ही छिन’ भी गई. कुछ ही दिनों बाद सुल्तानगंज से कहलगांव तक के गंगा की करीब अस्सी किलोमीटर लंबी पट्टी को विक्रमशिला गांगेय डॉल्फ़िन आश्रयणी घोषित कर दिया गया. इससे मछुआरों की रोज़ी रोटी के सामने एक बार फिर चुनौती आ गई.

गंगा मुक्ति आंदोलन में सक्रिय रुप से शामिल रहे रंगकर्मी उदय बताते हैं, ”आश्रयणी बनने से मछुआरों के मछली मारने पर रोक नहीं लगी है. लेकिन अब जमींदारों के बाद यहां के मछुआरों को आश्रयणी के बहाने प्रशासन परेशान करता है.”


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