साल 1971 जब सुनील दत्त दिवालिया होने के कगार पर पहुँच गए थे

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति 

सुनील दत्त, जिनका असली नाम बलराज दत्त था, का जन्म पाकिस्तानी पंजाब के खुर्द गाँव में 1929 में हुआ था. पिता गाँव के जमींदार थे, तो जिंदगी अच्छी चल रही थी, लेकिन कम उम्र में पिता की असमय मौत और फिर बंटवारे ने उन्हें घर से बेघर कर दिया. अपने परिवार के साथ वे भारत आ गए. फिर किस्मत आजमाने मायानगरी बम्बई निकल पड़े. वहां 1955 में उन्हें पहली फिल्म रेलवे प्लेटफार्म करने को मिली. इससे पहले वे रेडियो सीलोन पर रेडियो एनाउंसर का काम कर रहे थे और बॉम्बे के एक्टर्स का इंटरव्यू करते थे. रेडियो सीलोन पर उनका शो ” लिप्टन के सितारे” काफी चर्चित था. बलराज की दमदार आवाज इस शो की जान थी.  इसी सिलसिले में जब वे 1953 में शूट हो रही फिल्म शिकस्त के सेट पर दिलीप कुमार का इंटरव्यू करने पहुंचे, तो फिल्म के डायरेक्टर रमेश सैगल उनकी दमदार शख्सियत और बुलंद आवाज से काफी प्रभावित हुए और उन्हें 1955 की फिल्म ” रेलवे प्लेटफार्म” में बतौर हीरो लांच किया.

साथ ही उनका नाम भी बदल कर बलराज दत्त से सुनील दत्त कर दिया गया. चूँकि इंडस्ट्री में दो दो बलराज नहीं हो सकते थे, और पहले से इस नाम पर प्रसिद्द बलराज साहनी ने अपना अधिकार कर रखा था, तो लिहाजा नए एक्टर बलराज दत्त को सुनील दत्त का नाम दिया गया.

“मदर इंडिया” ने सुनील दत्त की जिन्दगी बदल दी:

1957 में सुनील दत्त और नर्गिस साथ आये महबूब खान की फिल्म “मदर इंडिया” में. इस समय तक नर्गिस और राजकपूर अलग हो चुके थे. नर्गिस समझ गयी थीं कि राजकपूर उनके साथ विवाह नहीं करेंगे, और इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है, तो उन्होंने न केवल राजकपूर के साथ काम करना बंद कर दिया ( दोनों की अंतिम फिल्म 1956 में जागते रहो थी.), बल्कि राजकपूर से बिना सलाह लिए ( जैसा कि अब तक वे करती आई थीं), उन्होंने महबूब खान की फिल्म “मदर इंडिया” के लिया हाँ कह दी थी. जैसा कि दुनिया जानती है, इस फिल्म के सेट पर आग लग गयी, और नर्गिस को बचाने में सुनील दत्त ने जान की बाज़ी लगा दी. सुनील दत्त अस्पताल में जितने दिन रहे, नर्गिस ने उनका पूरा ख्याल रखा. और इस दौरान दोनों के बीच प्रेम पनपा. कुछ सप्ताह के बाद सुनील दत्त ने नर्गिस के सामने शादी का प्रस्ताव रखा, जिसे नर्गिस ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. और 11 मार्च 1958 को बॉलीवुड की क्वीन पद्मश्री नर्गिस और उभरते स्टार सुनील दत्त का विवाह हो गया.

अपनी प्रोडक्शन कंपनी “अजंता आर्ट्स” खोली:

1960 का  दशक सुनील दत्त के करियर के लिहाज से बेहतर साबित हुआ. उन्हें लगातार फ़िल्में मिलने लगीं. वे फिल्मों में व्यस्त होते चले गए और नर्गिस ने घर की जिम्मेवारियों और साथ ही समाज सेवा में खुद को व्यस्त कर लिया. सुनील दत्त ने इसी दौरान अजंता आर्ट्स नाम का अपना प्रोडक्शन हाउस खोल लिया. और इसके बैनर तले उन्होंने 1963 में उन्होंने ” मुझे जीने दो” फिल्म बनायी. ये फिल्म डाकुओं की ज़िन्दगी पर आधारित थी. फिल्म ने न केवल व्यवसायिक सफलता हासिल की, बल्कि सुनील दत्त को बेस्ट एक्टर का फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला. इस फिल्म को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में भी काफी प्रशंसा मिली.

रेशमा और शेरा फिल्म ने उन्हें कंगाल कर दिया: 

इसके बाद सुनील दत्त ने 1971 में वहीदा रहमान और स्वयं को लीड रोल में रखकर रेशमा और शेरा फिल्म के लांच का एलान कर दिया. तय ये हुआ कि फिल्म को 15 दिनों में छोटे बजट में बनायी जायेगी, और सारे एक्टर, एक्ट्रेस जैसलमेर से 80 किलोमीटर दूर एक गाँव पोचिना में टेंट में रहेंगे और फिल्म को पूरी करेंगे. सारे एक्टर्स, जिसमे राखी, विनोद खन्ना, अमिताभ बच्चन आदि थे, सभी टेंट में रहकर फिल्म की शूटिंग करने लगे. सारे अभिनेता नए ही थे. इसलिए समय का कोई मामला नहीं था. एस सुखदेव को फिल्म के निर्देशन की जिम्मेवारी दी गयी. लेकिन जब सुनील दत्त ने फिल्म के रशेज देखे, तो उन्हें बहुत निराशा हुई. उन्होंने सुखदेव से फिल्म के निर्देशन का जिम्मा अपने हाथों में ले लिया और पूरी फिल्म को फिर से शूट किया गया. ऐसे में 15 दिन ठहरने के बजाय पूरी टीम को रेगिस्तान में तीन महीने रहना पड़ गया.  सुनील दत्त कहते हैं:” जब फिल्म पूरी हुई, तो मुझ पर 60 लाख का कर्ज हो गया. उस फिल्म के निर्माण के दौरान मैंने पांच फ़िल्में छोड़ दी थीं.”

1971 में रेशमा और शेरा रिलीज़ हुई और हालांकि इसे तीन नेशनल अवार्ड मिले, पर व्यवसायिक तौर पर डिजास्टर साबित हुई. 42 साल की उम्र में तीन बच्चे और एक पत्नी की जिम्मेवारी और पैसे एकदम ख़त्म !! सुनील दत्त पशोपेश में पड़ गए. उनके पास 7 गाड़ियाँ थीं, छह गाड़ियों को बेचना पड़ गया, एक कार रख लिया ताकि बच्चों को स्कूल आने जाने में दिक्कत न हो. वे खुद बस से चलने लगे. लोगों ने साथ छोड़ दिया. जो पहले हितैषी थे, वे अब उनसे दूरी बनाकर चलने लगे. लोगों के व्यंग बाण सुनने को मिलने लगे: क्यों सुनील दत्त? सब ख़त्म हो गया तेरा? अभी बस में जाना शुरू कर दिया है?

नर्गिस के वित्तीय प्रबंधन ने जान बचाई: 

इस दौरान एक अच्छी बात हुई थी कि नर्गिस ने घर परिवार को संभालते हुए घर के कंपाउंड में एक थिएटर बनाया था, जिसे उन्होंने निर्माताओं को फिल्म को देखने, डबिंग आदि करने के लिए किराए पर देना शुरू किया. ऐसे में घर किसी तरह चलने लगा. पर वो घर भी गिरवी था.

दत्त निराश थे, बच्चों के स्कूल फीस भरने में दिक्कत आ रही थी. एक दिन दत्त ने घर पर बच्चो को बता दिया कि आज तो खाना खाने के लिए भी पैसे नहीं हैं. ऐसे में नर्गिस ने गुल्लक फोड़ा, जिसमे वे खुदरा पैसा रखा करती थीं. जब उन पैसों को सबने मिल कर जोड़ा, तो एक उम्मीद की किरण जगी. क्योंकि एक महीने तक भोजन का प्रबंध हो गया था.

अब संघर्ष को पंख लग आये. संघर्ष था, पर साथ में हौसला भी था. परिवार एक जुट था. अंततः दो साल के बाद दत्त परिवार की किस्मत फिर से चमकने लगी. राजेश खन्ना का चमत्कारी दौर पतन पर था और सुनील दत्त को भी फ़िल्में मिलने लगीं. 1973 से  उनकी कई फिल्मों- हीरा, गीता मेरा नाम, प्राण जाए पर वचन न जाए, नहले पर दहला  आदि ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा व्यवसाय किया और जिंदगी फिर से पटरी पर आ गयी.


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