जब राजीव ने पेपर नैपकीन पर सोनिया के नाम लिखा था ‘लवलेटर’

भारतीय राजनीति की सबसे चर्चित प्रेम कहानी में से एक है पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और सोनिया गांधी का प्रेम. जो ना सिर्फ दो दिलों में पला बल्कि अपने मुकाम तक भी पहुंचा. सोनिया गांधी एक विदेशी महिला हैं और हमारे देश में ऐसी सोच है कि गोरी चमड़ी के लिए प्रेम बस रात गयी बात गयी, जैसा है, लेकिन सोनिया ने जिस तरह अपना प्रेम निभाया, वह यह साबित करता है कि प्रेम तो बस प्रेम है उसे जाति, धर्म और वर्ण में बांटा नहीं जा सकता. ना ही कोई इस बात का दावा कर सकता है कि उससे बेहतर प्रेम तो कोई कर ही नहीं सकता.

खैर, क्या आप जानते हैं कि राजीव और सोनिया के बीच प्रेम कब पनपा? अगर नहीं , तो आइए हम आपको बताते हैं कि कब इन दोनों की नजरें टकराईं और कब इन दोनों के दिल धड़के. राजीव ने सोनिया गांधी को सबसे पहले इग्लैंड के एक रेस्टोरेंट में देखा था. राजीव के लिए यह ‘लव एट फर्स्ट साइट’ था. सोनिया एक ग्रीक रेस्टोरेंट में बैठी थीं, राजीव, जिन्होंने पहली ही नजर में सोनिया को अपना दिल दे दिया था, रेस्टोरेंट के मालिक चार्ल्स एंटोनी से रिक्वेस्ट किया कि वे उनकी बैठने की व्यवस्था उस लड़की के पास करा दें. चार्ल्स ने भरसक यह कोशिश की, जिससे राजीव ने सोनिया को नजदीक से देखा. राजीव ने रेस्टोरेंट के पेपर नैपकीन पर एक कविता लिखी और उसे एक बेहतरीन शराब की बोतल के साथ सोनिया के पास पहुंचाया. एक टीवी शो (सिम्मी ग्रेवाल) के दौरान राजीव ने कहा था- जब मैंने सोनिया को पहली बार देखा था, तब ही मुझे यह लग गया था कि यह लड़की मेरे लिए है. मैंने पाया सोनिया बहुत ही सीधे तरीके से अपनी बातें रखती थीं और कभी कुछ छिपाती नहीं थी. वह बेहद शानदार व्यक्तित्व की मालिक थीं. वे दोनों अक्सर साथ घूमते थे और सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली ऐसी मूवी थी जिसे दोनों ने साथ देखा था.

राजीव ने इंदिरा को लिखा पत्र


यह सच है कि राजीव गांधी कैम्ब्रिज में आम विद्यार्थी की तरह रहते थे, लेकिन यह भी एक सच था कि वे भारत की दिग्गज राजनेता और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे थे. राजीव ने अपनी मां इंदिरा को सोनिया के बारे में लेटर लिखकर बताया. जब इंदिरा को पत्र मिला तो उन्होंने अपनी बुआ विजयालक्ष्मी पंडित से सलाह की और सोनिया से मिलने की इच्छा जतायी. इसके बाद 1965 में इंदिरा गांधी लंदन के लिए रवाना हो गयी और नेहरु एक्जीवेशन में राजीव ने सोनिया से उन्हें मिलवाया. दोनों तबतक शादी का मन बना चुके थे. इंदिरा ने दोनों के फैसले का सम्मान किया, पर सोनिया से कहा कि अंतिम फैसला करने से पहले वे एकबार भारत आकर देख लें.

सोनिया के पिता को नहीं पसंद थी यह शादी
राजीव और सोनिया की शादी पर इंदिरा गांधी ने तो एतराज नहीं जताया, लेकिन सोनिया के पिता इस शादी के खिलाफ थे. स्टेफीनो मानियो को अपनी बेटी के निर्णय पर भरोसा नहीं था. वे राजीव को तो पसंद करते थे लेकिन अपनी बेटी को भारत नहीं भेजना चाहते थे. जब 2004 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी चुनाव जीतकर आयी थीं, उस वक्त सोनिया गांधी का एक साक्षात्कार दूरदर्शन पर दिखाया जा रहा था, जिसमें वो बता रही थीं कि उनके पिता के कैसे उनके लिए भारत से वापसी का टिकट देकर उन्हें भेजा था और वह टिकट आज भी कहीं उनके पर पड़ा होगा.

शादी से पहले भारत आने पर बच्चन परिवार के साथ रहीं थीं सोनिया
1967 में राजीव कैम्ब्रिज से वापस लौट आये, उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी नहीं की, लेकिन वे पायलट बन गये थे. सोनिया भी उनके साथ थीं. जब इंदिरा ने देखा कि दोनों अपने रिश्ते को लेकर गंभीर हैं, तो इन दोनों की शादी तय कर दी. शादी की रस्मों से पहले सोनिया अमिताभ बच्चन के घर पर रहती थीं और वहीं से शादी की रस्में भी पूरी हुई थीं. जनवरी 1968 में राजीव और सोनिया की सगाई इंदिरा ने करवा दी ताकि राजनीतिक हलकों में गाॅसिप ना बने. इनकी शादी में मेहंदी की रस्म बच्चन परिवार के दिल्ली निवास से हुई थी. 25 फरवरी 1968 को सोनिया और राजीव एक दूसरे के हो गये. प्रधानमंत्री आवास के गार्डन में इनकी शादी हुई. इस शादी में बड़े राजनेता, बिजनेस मैन और सेलिब्रेटी पहुंचे. इस शादी में सबकुछ बढ़िया था सजावट, रंगोली फूल बस कमी थी तो पंडित जवाहरलाल नेहरू की जिन्हें राजीव बहुत प्रिय थे. हैदराबाद हाउस में भव्य रिस्पेशन का आयोजन भी हुआ पर पंडित नेहरू की कमी इंदिरा और राजीव की आंखों में साफ दिख रही थी.


राहुल और प्रियंका का परिवार में शामिल होना
राजीव और सोनिया की शादी के बाद उनके जीवन में पहले बच्चे के रूप में 1970 में राहुल गांधी आये और 1972 में प्रियंका आयीं. सोनिया के लिए उनका पति और यह दोनों बच्चे ही पूरी दुनिया थे. राजनीति में उनकी रुचि नहीं थी और वह राजीव को भी इससे दूर ही रखना चाहती थीं.
संजय गांधी की मौत और सोनिया-राजीव के रिश्ते संजय गांधी की आकस्मिक मौत के बाद राजीव को मजबूरी में राजनीति में आना पड़ा यह सोनिया को बिलकुल पसंद नहीं था, जब राजीव ने सोनिया से किया अपना वादा तोड़ा, तो वह बहुत दिनों तक रोती रहीं और दोनों के बीच विवाद की खबरें भी आयीं, लेकिन फिर भी इनके बीच के प्रेम ने इन्हें एक रखा. दो अलग देश, पारिवारिक पृष्ठभूमि और संस्कृति के होने के बावजूद इन दोनों ने हमेशा एक दूसरे का साथ दिया, भले ही मतभेद हुए हों. बाद में सोनिया ने यह समझा कि राजनीति में आना राजीव का कर्तव्य था, तो वह उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलीं.

1991 में छूट गया लवबर्ड सोनिया-राजीव का साथ
राजीव और सोनिया की यह जोड़ी तब जाकर टूटी जब 1991 में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव की हत्या एक आत्मघाती हमले में कर दी गयी. राजीव की मौत से सोनिया टूट गयीं, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों और राजीव के प्यार के सहारे इस दुख को झेल लिया. जब उनके पति की पार्टी पूरी तरह बिखर गयीं तो अंतत: सोनिया ने राजनीति से नफरत छोड़ी और कांग्रेस पार्टी की कमान संभाली और अपने प्यार के कर्तव्य को पूरा किया. सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी दो बार लोकसभा का चुनाव जीतकर आयी. इस बीच सोनिया पर उनके विदेशी होने के कारण कई हमले हुए लेकिन सोनिया ने अपने प्यार के खातिर सबकुछ झेला और राजीव के रंग में ही आज भी जी रहीं हैं.

 

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