संजय दत्त जब अमेरिका जाकर बसना चाहते थे, पर जा न सके

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति 

1980 का दशक स्टार पुत्रों के लांच का दशक था. जहाँ धर्मेन्द्र ने अपने बेटे सन्नी देओल को बेताब फिल्म से लांच किया, वहीँ बीते समय के जुबली कुमार राजेन्द्र कुमार ने अपने बेटे कुमार गौरव को लव स्टोरी फिल्म से लांच किया. कुमार गौरव रातों रात हॉट स्टार बन गये. नेक्स्ट बिग थिंग. नेक्स्ट अमिताभ बंच्चन. बेताब ने भी सनी देओल को हित फिल्म दिया. इन दोनों से पहले संजय दत्त के बॉलीवुड करियर का आगाज़ रॉकी फिल्म से 1980 में हुआ. पर उम्मीद के विपरीत रॉकी बॉक्स ऑफिस पर धमाल नहीं कर पायी. फिल्म के प्रीमियर से पांच दिन पहले ही नर्गिस की कैंसर से मौत हो गयी थी. और फिल्म के निर्माण के दौरान संजय दत्त ड्रग्स की गिरफ्त में आ गए थे. और पूरी फिल्म में वे खोये खोये लगे.

इस निराशाजनक लॉन्चिंग  के बाद उनका करियर को बूस्ट मिला विधाता फिल्म से. दिलीप कुमार, शम्मी कपूर और संजीव कुमार जैसे दिग्गज कलाकारों के बीच संजय दत्त ने अपनी पहचान बनायी पर ड्रग्स उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था. 1984 में सुनील दत्त उन्हें इलाज़ के लिए अमेरिका लेकर चले गए.

यूएस में बसने की प्लानिंग कर रहे थे संजय दत्त 

अमेरिका में इलाज़ के दौरान उन्हें अमेरिका में ही बस जाने का ख्याल आया. उनका फ़िल्मी करियर कहीं बढ़ नहीं रहा था. और अमेरिका में उन्हें अपने अकाउंट में तब बचे 50 लाख का निवेश करके मांस के व्यवसाय में भाग्य आजमाने का फैसला कर लिया था. पर सुनील दत्त ने उन्हें संघर्ष करने की सलाह दी. संजय दत्त इंडिया लौट आये इस शर्त पर कि वे एक साल संघर्ष करेंगे और अगर कुछ ख़ास नहीं कर पाये तो अमेरिका लौट जायेंगे.

संजय दत्त ऐसे लोगों में नहीं थे, कि हर निर्माता निर्देशक के दरवाजे पर काम मांगने के लिए जाते. अपने पाली हिल के बंगले में रोज सुबह वे उठते और फिर ओबेरॉय होटल चले जाते जहां वे स्क्वाश खेला करते. समय कट रहा था, देखते देखते आठ महीने बीत गए. बस चार महीने और… संजय दत्त ने सोचा कि फिर यूएस में ही किस्मत का दरवाजा खटखटाया जाये.

पर किस्मत चार ऐसे लोगों को एक साथ लेकर आई, जिन्हें सफलता की चाह थी.

एक महेश भट्ट थे. महेश भट्ट ने फिल्म निर्देशन में 1974 में ही कदम रखा था, जब उनकी फिल्म मंजिलें और भी हैं रिलीज़ हुई थी. फिल्म अपने विषय वस्तु में बोल्ड थी और अपने समय से आगे थी. जाहिर है फिल्म नहीं चली. हालांकि बाद में उनकी दो फिल्मों अर्थ (1982) और सारांश (1984) ने काफी ख्याति अर्जित की और उन्हें उभरते हुए डायरेक्टर का रूतबा दिया. पर महेश एक पूरी तरह से कमर्शियल फिल्म बनाना चाहते थे जो उन्हें बॉक्स ऑफिस पर सफल डायरेक्टर का रूतबा दे.

एक स्टोरी पर वे पिछले ढाई साल से काम कर रहे थे, जो दो भैयियों की कहानी थी. एक अच्छा और एक बुरा. बुरा भाई किसी भी कीमत पर पैसे कमाना चाहता है, और इसी लालच में ड्रग माफिया के चंगुल में फंस जाता है. और फिर उसका अच्छा भाई उसे इस चंगुल से निकालने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है.

महेश ने अपना आईडिया कुमार गौरव के साथ शेयर किया. कुमार गौरव को ये स्टोरी आईडिया बहुत पसंद आया. और वे इस फिल्म को अपने बैनर तले बनाने के लिए राजी हो गए. कुमार गौरव भी लव स्टोरी की असाधारण सफलता के बाद लो चल रहे थे और उन्हें एक हिट फिल्म की दरकार थी.

उसके बाद महेश स्क्रिप्ट राइटर सलीम खान से मिले. सलीम खान भी सलीम जावेद की प्रसिद्द जोड़ी टूटने के बाद से लो चल रहे थे. उस पर से लोगों के ताने कि सलीम जावेद की जोड़ी में जावेद ही असली खिलाड़ी थे और सलीम उनकी पूँछ पकड कर आगे बढ़ रहे थे. वे भी अपने विरोधियों को जवाब देना चाहते थे. ऐसे में सलीम एक ऐसी फिल्म की तलाश में थे, जिसकी सफलता का श्रेय पूरी तरह से उन्हें मिले. उन्हें ये मौका महेश भट्ट की कहानी में नज़र आया.

इन तीनों को अब चौथे का साथ मिला, जिसने अपने संघर्ष के एक साल का आठ महिना यूं ही बर्बाद कर दिया था. वे भी अमेरिका जाने के पहले खुद को प्रूव करना चाहते थे. कुमार गौरव और महेश भट्ट दोनों को यकीन था कि संजय दत्त बुरे भाई की भूमिका के साथ पूरा न्याय कर सकते हैं.

चारो लोग पूरी ताकत और उत्साह के साथ फिल्म में लग गए. चारों को सफलता की दरकार थी. लेकिन इंडस्ट्री में किसी को नाम ( जो कि फिल्म का नाम रखा गया) से ख़ास उम्मीद नहीं थी. इंडस्ट्री की नज़र में चारो चूके हुए खिलाड़ी थे. समय ने साबित किया कि इंडस्ट्री कितना गलत सोच रही थी !!

संजय दत्त ने भी अल्कोहल और ड्रग के दिनों को पीछे छोड़ते हुए अपना सब कुछ इस फिल्म में लगा दिया. महेश भट्ट कहते हैं, “ संजय दत्त से एक्टिंग के प्रति इंटेलेक्चुअल एप्रोच की उम्मीद मत कीजिये. वो इमोशनल है और अपनी एक्टिंग में इंस्टिंक्ट पर भरोसा करता है. पहले के फिल्मकारों ने उसके नेचुरल इंस्टिंक्ट को दबाने की कोशिश की. मैंने इस फिल्म में उसे अपने आप को स्वाभाविक तरीके से व्यक्त करने का मौका दिया. संजय दत्त संजय दत्त बन पाया इस फिल्म में.”

12 सितम्बर 1986 को फिल्म ‘नाम” रिलीज़ हुई

12 सितम्बर 1986 को फिल्म ‘नाम” रिलीज़ हुई. फिल्म के रिलीज़ होने के पहले ही इसका संगीत सुपरहिट हो चुका था. तेरे दिल की तू जाने, वैरिया बे, तू कल चला जाएगा तो मै क्या करूँगा, और सबसे ज्यादा पंकज उधास का गाया चिट्ठी आई है, आई है”. ये गाना खासकर प्रवासी भारतीयों के बीच नास्टैल्जिया क्रिएट करने में सफल रहा.

नाम फिल्म महेश भट्ट की पहली गोल्डन जुबली थी. सलीम खाना का पहला सोलो हिट था. कुमार गौरव का “लव स्टोरी” के बाद पहला हिट. पर सबसे बड़ी बात, लोगों ने एक अच्छे एक्टर और एक स्टार को उभरते हुए देखा. संजय दत्त, जिन्हें इस फिल्म की सफलता के लिए सबसे ज्यादा क्रेडिट मिला. उस साल की सबसे ज्यादा बिज़नस करने वाली फिल्मों में नाम तीसरे स्थान पर रही.

इस फिल्म के बाद संजय दत्त ने महेश भट्ट को गले से लगाते हुए कहा: “थैंक यू वैरी मच. अब मै अपनी आँखों में झाँक सकता हूँ.”

संजय दत्त इंडिया छोड़ कर यूएस में सेटल नहीं हो सकते. कई फ़िल्में अब उनका इन्तजार कर रही थी. और वे भी अपनी सेकंड इनिंग खेलने के लिए तैयार थे.


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