उस रात जब जहानाबाद शहर की बिजली काट दी गयी और 200 माओवादी जेल तोड़ कर फरार हुए थे

Balendushekhar Mangalmurty

13 नवंबर 2005  की रात थी वो. जहानाबाद शहर बिहार के अन्य शहरों की तरह अँधेरे में डूबा हुआ था. एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था. पर सब कुछ शांत नहीं था. बल्कि ये तूफ़ान के पहले की शांति थी. लगभग एक हज़ार पैर ख़ामोशी के साथ एक लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे, अचानक पूरा शहर गोली और बम के धमाकों से गूंज उठा और उनकी रौशनी से जहानाबाद जेल नहा उठा. नक्सलियों ने एक साथ जेल और पुलिस थाना पर हमला बोलकर 200 नक्सलियों को छुड़ा लिया था. पूरी प्लानिंग के साथ हमले के कारण पुलिस और प्रशासन को संभलने तक का मौका तब नहीं मिला था. माओवादियों द्वारा अपने साथियों को छुड़ाने के लिए किए गये हमले में एक कैदी और दो सुरक्षाकर्मी की मौत हो गयी.  माओवादियों का नेता अजय कानू जेल से उड़ चुका था और साथ में दो लाशें और बिछी थीं, रणवीर सेना के दो प्रमुख नेता.

 

सात वर्ष पहले क्या हुआ था

ये माओवादियों के द्वारा राज्य के खिलाफ अबतक का सबसे साहसिक और सबसे बड़ा हमला था. रात के करीब 9 बजे करीब 1000 माओवादियों के द्वारा शहर के मध्य में स्थित जेल और ( जेल तक कुमुक पहुँचने से रोकने के लिए) पुलिस बैरकों पर एक साथ हमला किये जाने से आधा घंटा पहले मोटर सायकिलों पर सवार कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं ने जहानाबाद में घूम घूम कर लोगों को चेतावनी डी कि कुछ देर में होने वाली कार्यवाही से खुद को बचाने के लिए घरों के भीतर ही रहें.

अपने उस दस्ते, जिसे जेल पर कब्ज़ा करने की जिम्मेवारी दी गयी थी, को सुरक्षा प्रदान करने के लिए माओवादियों ने जल्द ही बिजली काट दी और शहर के कई हिस्सों में फायरिंग शुरू कर दी. दो घंटे से ज्यादा समय तक पूरा शहर उनके नियंत्रण में रहा. अंत में, जेल में बंद रणवीर सेना के दो प्रमुख नेताओं, विशेश्वर राय और बड़े शर्मा को मार डालने के बाद पार्टी के राज्य सचिव अजय कानू, सहित जेल में बंद अपने करीब दो सौ कामरेडों के साथ वे वहां से निकल लिए.

जहानाबाद जेल ब्रेक के पंद्रह दिन पहले माओवादियों ने शहर की दीवारों पर अपनी मंशा जाहिर कर दी थी, जगह जगह पोस्टर सटे हुए थे, जो चीख चीख कर कह रहे थे:

चेतावनी जान हो !! सामंती सरकार के चंगुल से अपने कामरेडों को मुक्त करने आयेंगे ! जल्द ही ! लाल सलाम !

जिला प्रशासन या पुलिस में किसी ने इस चेतावनी पर गौर नहीं किया. माओवादी तो  हर दुसरे दिन किसी न किसी बात की चेतावनी जारी किया करते थे, इसमें नया क्या था? पुलिस प्रशासन मानो अफीम खाकर बेसुध थी.

हमले के तीन दिन पहले भी मुखबिरों ने पुलिस अधिकारीयों को माओवादियों के छोट छोटे हथियारबंद टुकड़ी में शहर में घुसने की चेतावनी दे रहे थे. कई जगहों को छोटे छोटे हथियार्बंद दस्तों को देखा गया था. बाजार में चर्चा गर्म थी, चाय की दूकान, पान की दूकान हर जगह लोग दबी जबान से एक ही चर्चा कर रहे थे कि कुछ होने वाला है.

जेलब्रेक की घटना के दिन आई जी ऑपरेशन, बिहार ने जहानाबाद के एसपी को एक फैक्स किया. फैक्स के अनुसार:

”  डिस्पैच नंबर 1958. ऑपरेशन

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, लगभग एक सौ माओवादी जहानाबाद के उत्तर में नदौल और काको एरिया में देखे गये. जानकारी मिली है कि जहानाबाद से भी एक यूनिट उन्हें ज्वाइन कर सकती है. उनमे से कुछ ६-७ मोटरसाइकिल पर मूव करते हुए और लोकल लोगों से जानकारी जुटाते हुए पाए गए हैं.

इंटेलिजेंस के अनुसार, नदौल रेलवे स्टेशन, काको पुलिस स्टेशन या कुछ मोबाइल पुलिस यूनिट पर हमला हो सकता है. सारे रेलवे स्टेशन, पुलिस स्टेशन, पिकेट्स और क्षेत्र के ब्लाक ऑफिस को बिना देरी किये अलर्ट कर दें. अपने स्तर पर फ़ोर्स को तैयार करें. चूँकि माओवादियों का ये गैंग गाड़ी से मूव कर रहा है, ऐसे में ये दुसरे एरियाज में भी मूव कर सकते हैं. इसलिए पुरे जिले की पुलिस को अलर्ट कर दें. साथ ही गया के DIG अपने स्तर से खतरे का मुआयना करें और सुरक्षा के उचित इंतजाम करें.

आर आर वर्मा, IG Operations, Patna.

पर एक बार फिर लापरवाही बरती गयी. जहानाबाद एस पी सुनील कुमार ऑफिस से साढ़े पांच बजे अपने आवास के लिए निकल पड़े. गया रेंज के DIG सुनील कुमार ( दुसरे) गया से हज़ार किलोमीटर दूर अजमेर में थे. डीएम राणा अवधेश पटना में थे; बल्कि हमले के ऐन मौके पर पटना रेलवे स्टेशन पर अपनी बहन को विदा कर रहे थे. जहानाबाद जेल में कोई जेलर नहीं था. ये पोस्ट पिछले छह महीने से खाली पड़ा था. असिस्टेंट जेलर अरुण सिन्हा छुट्टी पर थे. पुलिस लाइन्स के सार्जेंट नवल चंद्रा, अपने बैरक में आल इंडिया रेडियो सुन रहे थे और रात के भोजन का इन्तजार कर रहे थे; जब उनकी बेटी ( जो सहारा टीवी में दिल्ली में काम करती थी) ने उन्हें फ़ोन किया: टीवी चलाओ पापा, नक्सली लोग जहानाबाद जेल पर हमला किया है. बम फटा, सुनाई नहीं दिया क्या? सब टीवी पर आ रहा है…

जब तक चंद्रा कुछ सोच पाते और अपने होशोहवाश में आ पाते, तब तक माओवादी तो कारनामे को अंजाम देकर फरार हो चुके थे. जब चंद्रा जेल पहुंचे, तो देखा एसपी और डीएम दोनों झाड़ियों में छूपे हुए हैं और खतरे के टलने के संकेत का इन्तजार कर रहे हैं.

हमला नौ बजे रात के करीब शुरू हुआ:

हमला रात के नौ बजे शुरू हुआ. हमले से पहले जहानाबाद शहर की बिजली काट दी गयी. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लगभग एक  हज़ार माओवादियों ने चारो तरफ से जहानाबाद पर हमला किया. पुलिस लाइन, पुलिस थाणे, सरकारी दफ्तर, और जेल, सब पर एक साथ हमला किया गया. हमला दो तीन घंटे तक चला. जेल पर हमले का लाभ उठाकर कुल 341 लोग पीछे हट्ते हुए माओवादियों के साथ भाग लिए. जाते जाते वे अपने नेता अजय कानू को तो छुडा ही ले गए, रणवीर सेना के दो प्रमुख नेताओं को भी वहीँ गोली से मार गिराया.

यद्यपि जहानाबाद एक मैदानी इलाका है और आसपास पहाड़ या जंगल भी नहीं हैं, फिर भी नक्सालियों ने जिस कुशलता और मिलिट्री प्रिसिशन के साथ हमले को कार्यरूप दिया, उसने राज्य प्रशासन के होश उड़ा दिए. हमले के दो दिन पहले ही नक्सालियों ने गिरिडीह में होम गार्ड ट्रेनिंग सेंटर पर हमला करके 185 राइफल और काफी मात्रा में गोला बारूद जब्त कर लिया था.

गृह विभाग ने तुरंत नेशनल सिक्यूरिटी गार्ड्स की दो कंपनी बिहार भेजी. काम्बिंग ऑपरेशन शुरू हुआ, हेलीकाप्टर भी लगाए गए. न्यूज़ को दबाने के लिए पत्रकारों को दबाया गया. उनपर लाठी चार्ज किये गए. एसपी को सस्पेंड कर दिया गया.

कैदियों को लौटने की मोहलत प्रशासन की तरफ से दी गई.इसके बाद भी 130 कैदी वापस नहीं लौटे.

जहानाबाद जेल ब्रेक के कौन थे सूत्रधार?

सूत्रों की माने तो जहानाबाद जेल ब्रेककांड की घटना को मुकेश, अरविन्द, बाल्मीकि पासवान जैसे माओवादी नेताओं ने अंजाम दिया था. सूत्रों की मानें तो बिहार-झारखंड प्रभारी रहे अरविन्दजी की जब जमानत हो गई तो अजय कानू को उसने जेल से बाहर निकालने का वचन दिया था। कानू  ने जेल के अंदर ही अरविन्दजी की काफी सेवा की थी. बाद में जहानाबाद जेल ब्रेक कांड की घटना को अंजाम दिया गया.सूत्रों की मानें तो पूरे जेल परिसर का नक्शा बेउर जेल के अंदर से ही बनाकर भेजा गया था. बाद में इस नक्शे की सत्यता इंटरनेट के गुगल मैप के जरिये जांच की गई थी.

जिस नक्सली अजय कानू को छुड़ाने के लिए ऑपरेशन जेलबेक्र की साजिश रची गई. उसे बाद में गिरफ्तार कर लिया गया। पटना के केन्द्रीय कारा बेऊर में उसे रखा गया है. सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अजय कानू के विभिन्न मामलों की सुनवाई जेल परिसर में ही करने का आदेश जारी हुआ है.

बदले की भावना से नक्सली बना था अजय कानू

एक असाधारण छात्र से अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए अजय कानू उर्फ रवि जी नक्सली संगठन से ऐसे जुड़ा कि नक्सलियों का भी नेता बन गया. एक समय था जब अजय कानू पूरे बिहार के लिए नक्सली के रुप में चर्चित हो गया था.

वर्ष 1994 की बात है जब इसके पिता फागु कानू अपने अन्य साथियों के साथ जोन्हा गांव में मजदूर किसान संग्राम समिति के प्रचार के लिए दीवार पर लेखन करने गये थे, जिसका विरोध कुछ ग्रामीणों ने किया. फिर क्या था दोनों पक्ष उलझ गये एवं ग्रामीणों ने दिन दहाड़े लाठी डंडे से पीट पीट कर अजय कानू के पिता एवं एक अन्य व्यक्ति की हत्या कर दी थी. उस समय अजय कानू जहानाबाद एसएस कालेज का छात्र हुआ करता था. अजय एक अच्छा विद्यार्थी हुआ करता था. पर अपने पिता की हत्या से वह इस कदर टुट गया कि माओवाद का दामन थाम लिया. नक्सली बनने के बाद पीछे मुड़कर उसने नहीं देखा और नक्सलियों का बेताज बदशाह बन संगठन के ओहदे पद पर विराजमान हो गया और वह कलम को फेंक बंदूक का दामन ऐसा थामा कि पुलिस के लिए सिर दर्द बन गया था. काफी हाथ पाँव  मारने के बाद पुलिस ने पटना के शास्त्री नगर से उसे गिरफ्तार करने में सफलता पायी. नक्सलियों के नेता होने के कारण नक्सली इसे जहानाबाद जेल से भगाने के लिए जेल ब्रेक कांड का अंजाम वर्ष 2005 में दिया और रणवीर सेना समर्थक व गनियारी गांव निवासी बड़े शर्मा एवं एक अन्य कैदी की हत्या कर नक्सली अजय कानू को भगाने में सफल रहा. पुन: पुलिस के लिए इसकी गिरफ्तारी सिर दर्द बन गया और पुलिस को गया से गिरफ्तार करने में सफलता मिली जो वर्तमान में बेउर जेल में बंद है.

 

21 सितंबर 2004 को जब एमसीसी और पीडब्ल्यूजी का विलय हुआ और ताजा संगठन भाकपा (माले) अस्तित्व में आया तो उसे चार जोन में बांट दिया गया था. जोन के नाम दिये गये-इआरबी, सीआरबी, एनआरबी और साउथ वेस्ट आरबी. इआरबी जोन में बिहार, झारखंड, उड़ीसा और बंगाल को शामिल किया गया और इसकी कमान किशन दा को सौंपी गयी. जहानाबाद जेल ब्रेक के समय माओवादियों की संयुक्त ताकत पुलिस के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गयी थी.

जहानाबाद जेल ब्रेक के कई मास्टर माइंड जिन्दा नहीं रहे या  उन्होंने सरेंडर कर दिया:

बिहार के बहुचर्चित जहानाबाद जेल ब्रेक कांड के मुख्य आरोपी बाल्मिकी पासवान को दो गुर्गों के साथ गिरफ्तार किया गया.  उसकी गिरफ्तारी उस वक्त हुई जब वो रंगदारी वसूलने के लिए अपने दो अन्य सहयोगियों के साथ रानीतालाब पहुंचा था. इसी दौरान पुलिस ने उसे धर दबोचा. बाल्मीकि रानीतालाब थाना क्षेत्र के ईंट भट्टा मालिकों से लगातार रंगदारी की मांग कर रहा था.

एक करोड़ के इनामी नक्सली  देव् कुमार सिंह उर्फ अरविंद का हार्ट अटैक से मौत होने की खबर छन छन कर आई. बताया गया कि छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्र बूढ़ा पहाड़ के इलाके में उसकी मौत हुई है.अरविंद पिछले कुछ वर्षों से इसी इलाके में रहकर नक्सली गतिविधियों को संचालित कर रहा था. विदित हो कि सीपीआई माओवादी  के केंद्रीय कमेटी  का सदस्य अरविंद झारखंड बिहार उतरी छतीसगढ़ का टॉप माओवादी कमांडर था.  50 से 60 वर्ष के बीच  का अरविंद जहानाबाद का रहने वाला था.

दो हार्डकोर नक्सली  कवि जी उर्फ केवी लाल उर्फ अमरेश कुमार सिन्हा और संजय कुमार तिवारी ने हथियारों के साथ पटना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.  कवि और संजय जहानाबाद जेल ब्रेक कांड में भी शामिल थे. आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के काफिले पर हमला औऱ जहानाबाद जेल ब्रेक कांड समेत अलग-अलग 21 मामलों के आरोपी रहे माओवादी नेता नारायण सान्याल का कोलकाता में निधन हो गया. 83 साल के सान्याल कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे  और लगातार अस्वस्थ थे. नारायण सान्याल माओवादी की पोलित ब्यूरो के सदस्य रहे हैं. उन पर राजद्रोह, होमगार्ड राइफल लूटकांड, आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे चंद्रबाबू नायडू के काफिले में हमला करने,जहानाबाद जेल ब्रेक कांड समेत 21 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए थे. आंध्रप्रदेश सरकार ने नारायण सान्याल तब 12 लाख रूपए का इनाम भी रखा था.

जहानाबाद जेल ब्रेक की दुस्साहसी घटना के समय बिहार चुनाव के दौर से गुजर रहा था. इस विधान सभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन कर आये. और फिर उन्होंने नक्सल समस्या की गंभीरता को देखते हुए पुलिस तंत्र के आधुनिकीकरण की ओर ध्यान दिया, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे.

 


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