मोदी सरकार के निशाने पर आये ये बुद्धिजीवी; जाने इनके बारे में, इनके काम के बारे में.

पुणे पुलिस ने मंगलवार को देश के अलग-अलग हिस्सों से माओवादियों से संपर्क रखने के आरोप में पांच एक्टिविस्ट गिरफ्तार किए. इनमें से एक मानवाधिकारों की कानूनी लड़ाई लड़ने वाली एक्टिविस्ट सुधा भारद्वाज भी हैं. पुलिस ने सुधा को फरीदाबाद में सेक्टर 39 स्थित आवास से गिरफ्तार किया. हालांकि, पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने उनकी ट्रांजिट रिमांड पर 30 अगस्त तक रोक लगा दी है.

कौन हैं सुधा भारद्वाज
सुधा भारद्वाज एक मानवाधिकारों की कानूनी लड़ने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. सुधा करीब तीन दशक से छत्तीसगढ़ में काम कर रही हैं। वह छत्तीसगढ़ में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिब्रेशन (पीयूसीएल) की महासचिव भी हैं. इन्होंने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बड़े पैमाने पर काम किया है.

सुधा ने मजदूरों के अधिकार के लिए भी काम किया है. वह जनजातियों और दलितों के अधिकार की वकालत करती रही हैं और इन समुदायों के बीच उनकी अच्छी-खासी पहचान है. वह वर्ष 2000 में वकील बनीं. तब से वह किसानों, आदिवासियों और श्रम के क्षेत्र में गरीब लोगों, भूमि अधिग्रहण, वन अधिकार एवं पर्यावरण अधिकार के लिए काम करती आयी हैं. वह 2007 से छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में वकालत करती हैं.

सुधा नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली में गेस्ट प्रोफेसर भी हैं. यहां वह भूमि अधिग्रहण, जनजातियों के अधिकार पर सेमिनार कोर्स और कानून एवं गरीबी विषयों पर पढ़ाती हैं. पुणे पुलिस ने उन्हें धारा 153ए, 505, 117 और 120 के तहत गिरफ्तार किया है. वह फरीदाबाद के सूरजकुंड से गिरफ्तार की गईं.

सुधा का जन्म अमेरिका में हुआ लेकिन 11 साल की उम्र में वह भारत लौट आईं और 18 साल की अवस्था में पहुंचने पर उन्होंने अपनी अमेरिकी नागरिकता छोड़ दी. सुधा ने आईआईटी कानपुर से गणित की पढ़ाई की. उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में मजदूरों की भयावह दशा देख उन्होंने श्रमिकों के लिए काम करने का मन बना लिया और वह 1986 में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा से जुड़ गईं. सुधा ने रायपुर एक कॉलेज से कानून की पढ़ाई 2000 में पूरी की. तब से वह मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ती आ रही हैं.

पुलिस ने सुधा के घर से दो लैपटॉप, दो मोबाइल फोन और एक पेन ड्राइव अपने कब्जे में लिया है. सुधा पर कथित रूप से माओवादियों से संपर्क रखने का आरोप है. सुधा बीते 30 वर्षों से ट्रेड यूनियनों एवं श्रमिकों के लिए काम करती आ रही हैं.

 

 वरवर राव : हैदराबाद से गिरफ्तार राव कवि, वामपंथी विचारक और एक्टिविस्ट हैं. नक्सलियों से जुड़े होने का आरोप है. इन्हीं आरोपों में उन्हें 1973 से 1975 के दौरान जेल हुई थी. राव 1957 से कविताएं लिख रहे हैं. वीरासम (क्रांतिकारी लेखक संगठन) के संस्थापक सदस्य राव को अक्तूबर 1973 में आंतरिक सुरक्षा रखरखाव कानून (मीसा) के तहत गिरफ्तार किया गया था. साल 1986 के रामनगर साजिश कांड सहित कई अलग-अलग मामलों में 1975 और 1986 के बीच उन्हें एक से ज्यादा बार गिरफ्तार और फिर रिहा किया गया. करीब 17 साल बाद 2003 में राव को रामनगर साजिश कांड में बरी कर दिया गया. राव को एक बार फिर आंध्र प्रदेश लोक सुरक्षा कानून के तहत 19 अगस्त 2005 को गिरफ्तार कर हैदराबाद के चंचलगुडा सेंट्रल जेल में भेज दिया गया. 31 मार्च 2006 को लोक सुरक्षा कानून के तहत चला मुकदमा निरस्त कर दिया गया और राव को अन्य सभी मामलों में जमानत मिल गई.

 

गौतम नवलखा : मानव अधिकार कार्यकर्ता व पत्रकार गौतम नवलखा को भी दिल्ली से पुलिस ने हिरासत में लिया है. उन पर भी नक्सलियों से जुड़े होने के आरोप लगते आए हैं. नवलखा दिल्ली में रहने वाले पत्रकार हैं और पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) से जुड़े रहे हैं. वह प्रतिष्ठित पत्रिका ‘इकनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ के संपादकीय सलाहकार हैं. उन्होंने सुधा भारद्वाज के साथ मिलकर गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून 1967 को निरस्त करने की मांग की थी. उनका कहना है कि गैरकानूनी संगठनों की गतिविधियों के नियमन के लिए पारित किए गए इस कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है. पिछले दो दशकों से अक्सर कश्मीर का दौरा करते रहे नवलखा ने जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर काफी लिखा है.

 

अरुण फरेरा : मुंबई से गिरफ्तार स्थित सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा भाकपा (माओ) की संचार और प्रचार ईकाई के प्रमुख है. उन्हें वर्ष 2014 में सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था. मुंबई में रहने वाले नागरिक अधिकार कार्यकर्ता फेरेरा  ने अपनी किताब ‘कलर्स ऑफ दि केज: ए प्रिजन मेमॉयर’ में फेरेरा ने जेल में बिताए करीब पांच साल का ब्योरा लिखा है.

 

वर्णन गोंजाल्विस : मुंबई से गिरफ्तार गोंजाल्विस मुंबई विवि के गोल्ड मेडलिस्ट और रूपारेल और एचआर कॉलेज के पूर्व प्रवक्ता रहे हैं. छह साल जेल में रहने के बाद सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था. मुंबई यूनिवर्सिटी से स्वर्ण पदक विजेता और रूपारेल कॉलेज एंड एचआर कॉलेज के पूर्व लेक्चरर वर्नोन के बारे में सुरक्षा एजेंसियों का आरोप है कि वह नक्सलियों की महाराष्ट्र राज्य समिति के पूर्व सचिव और केंद्रीय कमेटी के पूर्व सदस्य हैं. उन्हें करीब 20 मामलों में आरोपित किया गया था और साक्ष्य के अभाव में बाद में बरी कर दिया गया. उन्हें छह साल जेल में बिताने पड़े.


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.