जयंती पर विशेष : अमृता प्रीतम, जिन्होंने स्त्री मन के भावों को अपनी रचनाओं में बखूबी उकेरा

आज मशहूर साहित्यकार अमृता प्रीतम की जयंती है. अमृता पहली महिला साहित्यकार थीं, जिन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. अमृता ने अपने लेखन की शुरुआत भले ही प्रेम कविताओं से की थी, लेकिन बाद में उनकी रचनाओं में प्रगतिशील चिंतन उभरा. उन्होंने अपनी रचनाओं में महिला अधिकारों की बातों को बखूबी उभारा.

अमृता की रचनाओं में जहां प्रेम प्रस्फुटित होता है , वहीं उन्होंने जो झेला वह भी दिखता है. अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ और पिंजर जैसी रचनाओं में भारत-पाकिस्तान विभाजन का दर्द बखूबी उभरता है. अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ विभाजन पर रची गयी सबसे बेहतरीन रचनाओं में से एक मानी जाती है. उन्हें साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार 1982 में उनकी रचना ‘कागज ते कैनवास’ के लिए दिया गया. उन्हें भारत सरकार सरकार ने पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया था.

प्रमुख रचनाएं :
उपन्यास- पांच बरस लंबी सड़क, पिंजर, अदालत, कोरे कागज़, उन्चास दिन, सागर और सीपियां
आत्मकथा-रसीदी टिकट
कहानी संग्रह- कहानियाँ जो कहानियाँ नहीं हैं, कहानियों के आँगन में
संस्मरण- कच्चा आंगन, एक थी सारा
कविता संग्रह- लोक पीड़ (1944), मैं जमा तू (1977), लामियाँ वतन, कस्तूरी, सुनहुड़े (साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कविता संग्रह तथा कागज़ ते कैनवस ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त कविता संग्रह.
उनकी जयंती पर उन्हें उनकी चर्चित रचना के जरिये श्रद्धांजलि-

आज वारिस शाह से कहती हूँ
अपनी कब्र में से बोलो
और इश्क की किताब का
कोई नया वर्क खोलो
पंजाब की एक बेटी रोई थी
तूने एक लंबी दास्तान लिखी
आज लाखों बेटियाँ रो रही हैं,
वारिस शाह तुम से कह रही हैं
ऐ दर्दमंदों के दोस्त
पंजाब की हालत देखो
चौपाल लाशों से अटा पड़ा हैं,
चिनाव लहू से भरी पड़ी है
किसी ने पाँचों दरिया में
एक जहर मिला दिया है
और यही पानी
धरती को सींचने लगा है
इस जरखेज धरती से
जहर फूट निकला है
देखो, सुर्खी कहाँ तक आ पहुँची
और कहर कहाँ तक आ पहुँचा
फिर जहरीली हवा वन जंगलों में चलने लगी
उसमें हर बाँस की बाँसुरी
जैसे एक नाग बना दी
नागों ने लोगों के होंठ डस लिये
और डंक बढ़ते चले गये
और देखते देखते पंजाब के
सारे अंग काले और नीले पड़ गये
हर गले से गीत टूट गया
हर चरखे का धागा छूट गया
सहेलियाँ एक दूसरे से छूट गईं
चरखों की महफिल वीरान हो गई
मल्लाहों ने सारी कश्तियाँ
सेज के साथ ही बहा दीं
पीपलों ने सारी पेंगें
टहनियों के साथ तोड़ दीं
जहाँ प्यार के नगमे गूँजते थे
वह बाँसुरी जाने कहाँ खो गई
और रांझे के सब भाई
बाँसुरी बजाना भूल गये
धरती पर लहू बरसा
क़ब्रें टपकने लगीं
और प्रीत की शहजादियाँ
मजारों में रोने लगीं
आज सब कैदो बन गए
हुस्न इश्क के चोर
मैं कहाँ से ढूँढ के लाऊँ
एक वारिस शाह और…


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