आखिर क्यों नौ माह कोख में पालने के बाद भी बच्चे को मरने के लिए छोड़ जाती हैं माएं? आंकड़ों की नज़र से ….

नोएडा (उत्तर प्रदेश) कर्मचारी राज्य बीमा निगम के अस्पताल में एक महिला जन्म देने के बाद अपनी नवजात बिटिया को लावारिस छोड़कर चली गयी. घटना की सूचना अस्पताल ने पुलिस को दी. मौके पर पहुंची पुलिस ने नवजात बच्ची को चाइल्ड लाइन के सुपुर्द कर दिया है. पुलिस उपाधीक्षक नगर राजीव कुमार सिंह ने बताया कि सेक्टर 24 स्थित ईएसआईसी अस्पताल के बाल चिकित्सालय वार्ड में बीती रात एक नवजात बच्ची बाथरूम में खून से लथपथ मिली.

रांची (झारखंड) : राजधानी के डोरंडा इलाके में एक घर के सामने बैग पड़ा जिसमें से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी. आसपास के लोगों ने बैग खोला, तो उससे एक दो-तीन माह का बच्चा निकला, जिसे उसके परिजन छोड़ गये थे. यह दोनों घटनाएं बमुश्किल दो-तीन दिन पुरानी है. लेकिन सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. आखिर कैसे एक मां अपने बच्चे को दर-दर की ठोकर खाने को छोड़ सकती है? चाहे कितनी भी बड़ी मजबूरी हो, लेकिन क्या एक अबोध बालक/बालिका को ऐसे छोड़ा जाना चाहिए? ऐसे सवाल हमारे समाज के सामने उभरते तो हैं,लेकिन सच्चाई यह है कि इन्हें दरकिनार कर हमारे समाज में आये दिन बच्चों को सड़क पर छोड़े जाने की घटनाएं होती रहती हैं.


भारत में 31 मिलियन से ज्यादा बच्चे हैं अनाथ

संयुक्त राष्ट्र संघ अनुसार भारत में कुल 31 मिलियन अनाथ बच्चे हैं. लेकिन इन्हें गोद लिये जाने की दर बहुत कम है. कुल मिलाकर एक वर्ष में मात्र 800-1000 बच्चों को गोद लिया जाता है.

बच्चों को छोड़ने के मामले में महाराष्ट्र है नंबर वन

महाराष्ट्र में बच्चों को छोड़े जाने की घटनाएं सर्वाधिक होती हैं. वर्ष 2011 से 2015 तक में कुल 1,093 केस बच्चों को छोड़े जाने के दर्ज हुए. राष्ट्रीय अपराध आंकड़े के अनुसार औसतन प्रतिवर्ष बच्चों को छोड़े जाने की 219 दर्ज होते हैं. जन्म के बाद तुरंत हत्या के आठ मामले और भ्रूण हत्या की 14 केस दर्ज होती है. बच्चों को छोड़ने के मामले महाराष्ट्र के बाद राजस्था (851), मध्यप्रदेश में 641, गुजरात में 445 दर्ज हुए.

 

बिना शादी के जन्मे बच्चे सबसे ज्यादा छोड़े जाते हैं
आंकड़ों की मानें तो वही बच्चे सबसे ज्यादा छोड़े जाते हैं, जो दो लोगों की सहमति से बने संबंध से जन्म लेते हैं, लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया जाता है और नाजायज औलाद का नाम दिया है. जिसपर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने पहले ही कहा है कि संबंध जायज और नाजायज हो सकते हैं बच्चे नहीं. बावजूद इसके लोग अपने बच्चों को छोड़कर चले जाते हैं.

छोड़े गये बच्चों में से 90 प्रतिशत लड़कियां
आंकड़ों की मानें तो छोड़े गये बच्चों में से 90 प्रतिशत लड़कियां होती हैं. यह बच्चियां शादीशुदा जोड़ों की भी संतान होती हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाता है क्योंकि वे लड़कियां हैं. लड़कियों की तो भ्रूण में हत्या की खबर भी आती है. वर्ष 2015 में 221 मादा भ्रूण मारे जाने की सूचना पुलिस के पास थी.

एडॉप्शन है समाधान
अपने माता-पिता द्वारा छोड़े गये बच्चों को एक खुशहाल जिंदगी देने के लिए यह जरूरी है कि उनका एडॉप्शन  हो. हमारे देश में एडाप्शन के नियम भी स्पष्ट हैं. गोद दिये जाने से पहले एडाप्शन करने वालों को पूरा समय दिया जाता है कि वे ठीक से सोच सकें, ताकि बच्चे का भविष्य सुरक्षित हो सके.


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