भोपाल गैस त्रासदी: जब एक ठंड भरी रात मौत का पैगाम लेकर आई

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति 

1969 में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनी यूनियन कार्बाइड ने भोपाल शहर में कीटनाशक दवाइयां बनाने के लिए एक फैक्ट्री लगाई. भोपाल शहर के बीचो बीच घनी आबादी के बाद फैक्ट्री लगा दी गयी, तमाम नियम कानून को ताक पर रख कर. फैक्ट्री में कई टन जहरीली गैस का स्टॉक हर घडी रहता था. डिजास्टर मैनेजमेंट के बारे में कुछ नहीं सोचा गया. सरकार या कम्पनी ने जनता को संभावित खतरे के बारे में आगाह करना जरुरी नहीं समझा. लाखों की आबादी अपने साथ टाइम बम लेकर सो रही थी. गहरी नींद में थे. बम कभी भी फट सकता था. पूरा शहर एक टिक टिक करते टाइम बम पर सोया हुआ था. बम कभी भी तबाही ला सकता था. ये बम आखिरकार फट ही गया 3 दिसंबर 1984 की रात को. जब महज आधे घंटे में 30 मीट्रिक टन मिथाइल आइसोसाइनाइट भोपाल की हवाओं में घुल गया. करीबन आठ किलोमीटर वर्ग के क्षेत्रफल में 2500 लोग काल के गाल में समा गए और 4500 से ज्यादा लोग अपंग हो गए. ये आधिकारिक आंकडें थे, गैर आधिकारिक आंकड़ों में मौत को तीन चार गुना ज्यादा दिखाया गया. दुनिया ने उस रात सबसे खतरनाक औद्योगिक दुर्घटना  देखी थी.

तीन दिसंबर की वो मनहूस रात:

यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री

रोज की तरह 3 दिसम्बर को भी फैक्ट्री अपने समय से खुली. शाम तक सबकुछ ठीक था. काम के दौरान रात के करीब 11 बजे फैक्टरी में जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनाइट के लीक होने की सुगबुगाहट होने लगी. सबसे पहले यह खबर ऑपरेटर ‘सुमन डे’ को मिली. उन्होंने तुरंत उस जगह का पता लगा लिया, जहां से गैस लीक हो रही थी. गैस स्टोर रूम में मौजूद एक पाइप से लीक हो रही थी. इस स्टोर रूम में खतरनाक केमिकल्स के अलावा सीमेंट की मोटी परत के नीचे मिथाइल आइसोसाइनाइट के तीन टैंक भी मौजूद थे. सुमन को लगा यह मामूली रिसाव है, इसलिए उन्होंंने उसे गंभीरता से नहीं लिया और लीकेज वाले पाइप को जुगाड़ टेक्नोलॉजी से ठीक कर दिया. पर उन्हें सपने में भी ये उम्मीद नहीं थी कि यह ज्यादा देर तक गैस के इस रिसाव को बांध कर नहीं रख पायेगा.

सुमन के जाने के कुछ देर बाद ही गैस का रिसाव बढ़ गया. फैक्टरी के कर्मचारियों ने तुरंत सुमन को इसकी जानकारी दी. सुमन मौके पर पहुंचे और स्टोरेज रूम का प्रेशर चेक किया. वह हैरान थे. गैस का प्रेशर बेहद खतरनाक ढंग से  बढ़ गया था.  उन्होंंने तुरंत आपात्कालीन गैस कण्ट्रोल प्रक्रिया को शुरू कर दिया परन्तु सब बेकार. गैस का दबाव बढ़ता जा रहा था. कुछ ही देर में गैस का रिसाव इतना बढ़ गया कि ‘मिथाइल आइसोसाइनाइट’ फैक्टरी के पाइप्स से होती हुई चिमनी के रास्ते शहर की हवा में पहुंच गई.

फैक्टरी के कर्मचारी गैस को रोकने के लिए चिमनी और गैस कंटेनर्स पर पानी डाल कर दबाव को कम करने की कोशिश कर रहे थे. करीब आधे घंटे तक लगातार पानी की बौछार मारी गयी. बावजूद इसके गैस लगातार चिमनी से होकर बाहर निकलती रही. अगले कुछ ही घंटों में गैस ने लगभग आठ किलोमीटर के क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया. करीबन 2500 लोग इस रात काल के गाल मे समा गये. जबकि 4500 से अधिक लोग अपंग हो गये.

डॉक्टर समझ नहीं पा रहे थे ये क्या है?

जहरीली गैस से मरने में महज तीन मिनट लगे.

महज आधे घंटे में भोपाल शहर में 30 मीट्रिक टन जहरीली गैस फ़ैल गयी. सबसे बुरी तरह से प्रभावित हुए कारखाने के पास झुग्गी झोपडी में रहने वाले गरीब लोग. अधिकांश लोग नींद में ही काल के गाल में समा गए. कुछ सोचने, करने का समय ही नहीं मिला. औसतन तीन मिनट जहरीली गैस ने उन्हें दिया.

इस हादसे के लिए कोई तैयार नहीं था. न आम लोग, न सरकार, न यूनियन कार्बाईड का कारखाना. और तो और कारखाने का अलार्म सिस्टम भी ऐसे मौके पर बेअसर रहा. कोई चेतावनी नही मिली.

जो लोग मरने से बच पाए, उन्होंने हाँफते, दौड़ते अस्पताल का रुख किया. पर यहाँ भी डॉक्टर्स को मालूम ही नहीं था कि ऐसी स्थिति में क्या इलाज किया जाए? अचानक लोगों की बाढ़ थामने के लिए शहर के दो अस्पतालों में जगह ही नहीं थी. एकदम क्राइसिस की स्थिति बन गयी थी. कुछ लोग अस्थायी अंधेपन का शिकार हो गए थे, कुछ को चक्कर आ रहा था, सांस की तकलीफ से हर कोई गुज़र रहा था. पहले दो दिनों में लगभग 50,000 लोगों का इलाज किया गया. हालाँकि आज तक मौत, अपंगता, मरीजों के इलाज पर प्रशासन संतोष जनक आंकडें नहीं जुटा पाया है.  पर प्रशासन ने ये जरुर किया कि गैस रिसाव के आठ घंटे बाद भोपाल को जहरीली गैसों के असर से मुक्त मान लिया.

सरकार और कंपनी की मिलीभगत के चलते मुख्य आरोपी बच निकला:

इस मामले की सीबीआई जांच कराई गई. उन्होंंने अपनी जांच में कंपनी के कई अधिकारियों को दोषी पाया. इनमें से 7 पर मुकदमा चलाया गया और बाद में सजा भी सुनाई गयी, लेकिन त्रासदी के मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन सजा से बच गए. बाद में भारतीय न्यायपालिका के आदेशों पर यूनियन कार्बाइड कंपनी को 470 मिलियन डॉलर का हर्जाना देना पड़ा.

भोपाल गैस त्रासदी मामले में वारेन एंडरसन को 7 जून 2010 को न्यायालय द्वारा दोषी और फरार घोषित किया गया था. इसके बाद अब्दुल जब्बार और अधिवक्ता शहनवाज हुसैन ने तत्कालीन कलेक्टर मोदी सिंह और पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग की थी.

भोपाल गैस त्रासदी की सबसे चर्चित और दुखद तस्वीर. वारेन एंडरसन, यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन, मुख्य आरोपी

वॉरेन एंडरसन भोपाल गैस कांड के वक्त यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन थे. हादसे के चार दिन बाद यानी सात दिसंबर 1984 को एंडरसन हालात का जायजा लेने भोपाल आए. इन्हें भारतीय दंड विधान (आईपीसी) की ऐसी गंभीर धाराओं के तहत गिरफ्तार भी किया गया, जिन पर अदालत की इजाजत के बिना जमानत नहीं मिल सकती थी. लेकिन महज चार-पांच घंटे के भीतर इन्हें न सिर्फ जमानत मिल गई, बल्कि इनके लिए  देश से भागने का इंतजाम कर दिया गया. इसके बाद इनके खिलाफ अदालतों में सुनवाइयां होती रहीं, अमेरिका से इनके प्रत्यर्पण की कथित कोशिशें भी की जाती रहीं. पर ये कभी भारत लौटे नहीं. एंडरसन 1986 में यूनियन कार्बाइड के सर्वोच्च पद से रिटायर हुए और 92 साल की उम्र में 29 सितंबर 2014 को इनकी मौत हो गई.

जिस आदमी ने एंडरसन को देश से भागने में मदद की, वे और कोई नहीं, भोपाल के एसपी स्वराज पूरी थे. एंडरसन को भोपाल में पहले गिरफ्तार करने और फिर उनकी जमानत का इंतजाम इन्होंने ही किया था. यही नहीं, खुद गाड़ी ड्राइव करके उसे बाइज्जत भोपाल एयरपोर्ट तक छोड़ने भी यही गए थे. इन्होंने गैस कांड की जांच करने वाले आयोग के सामने खुद माना था, ‘हमने एंडरसन को लिखित आदेश के आधार पर गिरफ्तार किया था. लेकिन मौखिक आदेश के आधार उसे छोड़ दिया. ये मौखिक आदेश हमें ऊपर से मिला था.’ आदेश किसने दिया, इन्होंने कभी किसी को नहीं बताया. सरकार के ‘सच्चे सेवक’ पुरी 23 सितंबर 2006 को मध्य प्रदेश के महानिदेशक (डीजीपी) जैसे सर्वोच्च पद से रिटायर हुए. सेवानिवृत्ति के बाद इन्हें राज्य की भाजपा सरकार ने नर्मदा घाटी परियोजना के शिकायत निवारण प्राधिकरण का सदस्य बना दिया. इस बीच 2010 में जब इनके खिलाफ अदालत में कुछ संगठनों ने निजी तौर पर मामला दर्ज कराया तो इन्हें इस पद से हटा दिया गया. लेकिन मई 2015 में फिर भाजपा की ही सरकार ने इन्हें मध्य प्रदेश निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग का सदस्य बना दिया.

जब गैस दुर्घटना हुई, तब मोती सिंह भोपाल के डीएम थे. इन्हीं की सरकारी कार को खुद चलाते हुए स्वराज पुरी वॉरेन एंडरसन को हवाई अड्‌डे तक छोड़ने गए थे. उस कार में एंडरसन के साथ मोती सिंह भी थे. ये एंडरसन की गिरफ्तारी, जमानत और फिर उसे भागने का रास्ता सुलभ कराने की पूरी योजना में बराबर के साझीदार थे. इस बात का जिक्र इन्होंने खुद अपनी किताब ‘भोपाल गैस त्रासदी का सच’ में किया है. यह किताब 2009 में आई थी. इसमें इन्होंने 1984 के उस वाकये का विस्तार से जिक्र किया है.

15 जून 2010 में गैस पीडित संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार और अधिवक्ता शहनवाज हुसैन ने अदालत में एक परिवाद दायर किया था. इसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि जब लोग मर रहे थे तब तत्कालीन कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सरकारी संसाधनों को उपयोग कर भोपाल गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन को भोपाल से फरार करने में लगे थे.

आज तक भोपाल गैस त्रासदी के दुष्परिणाम झेल रहा है;  स्पष्ट आंकड़ों का भी अभाव है:

इस त्रासदी के 33 साल बीत जाने के बावजूद प्रशासन अभी तक त्रासदी में मारे गए लोगों से जुड़े आंकड़े उपलब्ध नहीं करा सका है. गैर सरकारी संगठन जहां इस गैस कांड से अब तक 25 हजार से ज्यादा लोगों के मारे जाने का दावा करते हैं, वहीं राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इस हादसे में 5295 लोग मारे गए और साढ़े पांच लाख लोग जहरीली गैस के असर से विभिन्न बीमारियों के शिकार हुए.

1997 के बाद सरकार ने गैस पीड़ितों के बारे में पता लगाना बंद कर दिया है. यूनियन कारबाइड कारखाने के परिसर में रखे गए 350 मीट्रिक टन जहरीले रासायनिक कचरे की वजह से भी हर साल बढ़ते रोगियों के आंकड़े नहीं जुटाए जा रहे हैं.

यूनियन कारबाइड कारखाने के परिसर में रखे 350 टन जहरीले रासायनिक कचरे का निपटान सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं हो सका है. गैस त्रासदी के 33 साल बाद भी कारखाने के गोदाम में रखे और जमीन में दबे जहरीले कचरे में तमाम कीटनाशक रसायन, लेड, मर्करी और आर्सेनिक मौजूद हैं, जिनका असर अभी कम नहीं हुआ है.  यह खुलासा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कारखाने के गोदाम में रखे जहरीले कचरे की जांच रिपोर्ट में किया है. इस कचरे की वजह से भोपाल और उसके आसपास का पर्यावरण और विशेषकर भूजल दूषित हो रहा है.

अनेक रिपोर्ट में ये बात खुल कर सामने आई है  कि यूनियन कारबाइड कारखाने वाले इलाके में रहने वाली महिलाओं में आकस्मिक गर्भपात की दर तीन गुना बढ़ गई है.  नवजात शिशुओं में आंख, फेफड़े, त्वचा आदि से संबंधित समस्याएं लगातार बनी रहती हैं. उनका दिमागी विकास अपेक्षित गति से नहीं होता है. इस इलाके में कैंसर के रोगियों की संख्या में भी लगातार इजाफा हो रहा है.

दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना से भारत ने कोई सबक नहीं लिया है.

 

 

    
  


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