अंकुर से गॉडमदर तक शबाना आज़मी का शानदार सफर; जन्मदिन पर विशेष

नवीन शर्मा

शबाना आजमी हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन अभिनेत्रियों में से एक हैं. शबाना ने 1973 में निर्देशक श्याम बेनेगल की क्लासिक फिल्म अंकुर से अभिनय की यात्रा का शानदार आगाज किया था. पहली ही फिल्म में वे इतना सशक्त अभिनय करती हैं कि लगता है कि कोई मंजी हुई अदाकारा हैं. इसमें वे दलित महिला की भूमिका में जान डाल देतीं हैं. उन्हें पहली ही फिल्म में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था.

शबाना की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे खुद को हर अभिनय के अनुरूप उसी साँचे ढल लेतीं हैं. उन्होंने हिंदी फिल्मों में एक से बढ़ कर एक और एकदम अलहदा किस्म के रोल अदा किये हैं. उनकी दर्जन भर फिल्में ऐसी हैं जिनमें उन्होने यादगार अभिनय किया है. हम इनमें से पांच फिल्मों की बात करते हैं.

मंडी की कोठेवाली शबाना ने मंडी फिल्म में एक कोठेवाली की भूमिका निभाई थी. इसमें वे खासी मेहनत करती हैं. इसके लिए उन्होंने अपना वजन भी बढ़ा लिया था. एक अधेड़ कोठेवाली के किरदार में अपने हाव भाव, उठने बैठने चलने और बोलने के अंदाज में कमाल का बदलाव लाया था. वे एकदम सौ फीसदी कोठेवाली लगतीं हैं.

अर्थ की स्वाभिमानी महिला महेश भट्ट के निर्देशन में बनी अर्थ लाजवाब फिल्म है हर लिहाज से. वैसे तो यह फिल्म महेश भट्ट की बायोपिक है। महेश के किरदार में कुलभूषण खरबंदा थे, लेकिन अभिनय के मामले में शबाना और स्मिता पाटिल में जबर्दस्त मुकाबला है. शबाना वैसी पत्नी के दर्द को शिद्दत से उभारतीं हैं जिसके पति का दूसरी महिला से विवाहेत्तर संबंध है. उसकी बेबसी को अपनी आंखों की नमी और हावभाव से इतने मार्मिक ढंग से पेश करतीं हैं दर्शक उस किरदार से इस कदर कनेक्ट होते हैं की उनकी आंखें भी कई बार नम हो जातीं हैं. इस फिल्म का अंत लीक से हटकर है. अपने पति से अलग होने के बाद शबाना की दोस्ती हालांकि राजकिरण से होती है लेकिन वो उसके कंधे का सहारा नहीं लेकर अपनी राह पर अकेली ही चलने का साहसिक फैसला लेती हैं.

मासूम में पत्नी का दर्द व मां की ममता का बयां शेखर कपूर की उम्दा फिल्म मासूम में शबाना कमाल करतीं हैं. इसमें उसके पति नसीरउद्दीन शाह के उनके विवाहेत्तर संबंध से जन्मे बच्चे को लेकर रची गई कथा में शबाना अपनी अभिनय प्रतिभा का नायाब नमूना पेश करतीं हैं. वे मासूम बच्चे को पहले एवाएड करतीं हैं लेकिन बाद में बच्चे की मासूमियत से एक मां किस तरह पिघल जाती है इसको शबाना बहुत ही बढ़िया तरीके से निभाती हैं.

गॉडमदर व जज्बा की शातिर महिला शबाना की यह खासियत है कि वे खुद को किसी खास छवि से बंधन में नहीं बंधना चाहतीं. वे हर पारंपरिक छवि को झटकर आगे निकल जाती हैं. इसी वजह से वे गॉडमदर फिल्म में गुजरात की माफिया महिला डॉन पर बनी बायोपिक मेंं काम करने का साहस दिखातींं हैं. वे माफिया डॉन की भूमिका में जंचतीं हैं. इसी तरह वे ऐश्वर्या राय के साथ वाली फिल्म में अपनी बेटी की मौत का बदला लेने के लिए एक शातिर महिला की भूमिका बखूबी निभातीं हैं.

जीवन की कहानी:

शबाना ऊर्दू के मशहूर शायर कैफी आजमी की बेटी हैं. उनकी माँ शौकत आजमी भी थिएटर की आर्टिस्ट थीं. मां से विरासत में मिली अभिनय-प्रतिभा को सकारात्मक मोड़ देकर शबाना ने हिन्दी फिल्मों में अपने सफर की शुरूआत की. पढ़ाई शबाना ने अपनी शुरुआती पढ़ाई क़्वीन मैरी स्कूल मुंबई से की है. उन्होंने मनोविज्ञान (Psychology) में स्नातक किया है. उन्होंने स्नातक की डिग्री मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज से ली है. शबाना आजमी ने अभिनय का कोर्स फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टिटीयूट ऑफ इंडिया (Film and Television Institute of India), पुणे से किया है. शादी शबाना आजमी की शादी हिंदी सिनेमा के मशहूर संगीतकार जावेद अख्तर से हुई है. जावेद अख्तर से शबाना का मेलजोल 1970 में शुरू हुआ. जावेद कैफी आजमी से लिखने की कला सीखते थे. जावेद अख्तर और शबाना आजमी के बीच नजदीकियां इसी दौरान बढ़ीं. दोनों के बीच अफेयर की भनक मीडिया को भी लग गई. शबाना आजमी को लेकर आए दिन जावेद अख्तर और हनी के बीच लड़ाईयां होने लगीं. जावेद अख्तर ने तलाक का फैसला लिया और वो शबाना से शादी की. उनकी यह जोड़ी आज भी लोग के लिए मिसाल है.

करियर:

शबाना के करियर का शानदार दौर 1980 का दशक रहा 1983 से 1985 तक लगातार तीन साल तक उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया. अर्थ, खंडहर और पार जैसी फिल्मों के लिए उन्हें ये सम्मान दिया गया. उस दौर में शबाना ने खुद को ग्लैमरस अभिनेत्रियों की भीड़ से स्वयं को अलग साबित किया. अर्थ, निशांत, अंकुर, स्पर्श, मंडी, मासूम, पेस्टॅन जी में शबाना आजमी ने अपने अभिनय की अमिट छाप दर्शकों पर छोड़ी. वहीं अमर अकबर एंथोनी, परवरिश व मैं आजाद हूं जैसी व्यावसायिक फिल्मों में अपने अभिनय के रंग भरकर शबाना आजमी ने सुधी दर्शकों के साथ-साथ आम दर्शकों के बीच भी अपनी पहुंच बनाए रखी. विवादास्पद फिल्म फायर प्रयोगात्मक सिनेमा के भरण-पोषण में उनका योगदान उल्लेखनीय है. फायर जैसी विवादास्पद फिल्म में शबाना ने बेधड़क होकर अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रमाण दिया. इसमें वे नंदिता दास के साथ एक लेस्बियन संबंध वाले अपने किरदार में एक अलग ही रंग भरतीं हैं। वहीं, बाल फिल्म मकड़ी में वे चुड़ैल की भूमिका निभाती हुई नजर आई.

प्रसिद्ध फ़िल्में

अंकुर, अमर अकबर अन्थोनी , निशांत, शतरंज के खिलाड़ी, परवरिश, किस्सा कुर्सी का, कर्म, आधा दिन आधी रात, स्वामी ,देवता ,जालिम ,अतिथि ,स्वर्ग-नरक, थोड़ी सी बेवफाई, स्पर्श, अमरदीप ,बगुला-भगत, एक ही भूल, हम पांच, अपने पराये ,लोग क्या कहेंगे, दूसरी दुल्हन गंगवा,कल्पवृक्ष, पार, कामयाब ,द ब्यूटीफुल नाइट, मैं आजाद हूँ, इतिहास व मटरू की बिजली का मंडोला.


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