एक व्यक्ति के रूप में कैसे थे दुनिया को बदलने वाले आधुनिक युग के मनीषी मार्क्स

मार्क्स की बेटी लॉरा से लाफार्ग का विवाह हुआ था. लाफार्ग ने अपने ससुर मार्क्स का संस्मरण लिखा है, जो मार्क्स के व्यक्तित्व पर बहुत अच्छा प्रकाश डालता है:

मै उस वक़्त 24 साल का था. पहली मुलाक़ात के समय जो उनका प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा, उसे मै जीवन भर नहीं भुला सकता. उस समय मार्क्स का स्वास्थ्य ख़राब था और वह कैपिटल की पहली जिल्द के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे. उन्हें इसकी बड़ी चिंता रहती थी कि शायद वह उसे समाप्त न कर सकें.

उनका बहुत प्रिय वचन था, “दुनिया के लिए काम करो.” मार्क्स ने अपने कार्यक्षेत्र को अपनी जन्मभूमि तक ही सीमित नहीं रखा. वह कहा करते थे, ” मै दुनिया का नागरिक हूँ.”

किताबें मार्क्स की दुनिया थीं:

पहली बार जब मैंने उन्हें मेटलेन पार्क रोड में उनके अध्ययन कक्ष में देखा, तो उस समय वह मुझे अद्वितीय और अनथक समाजवादी आन्दोलन के तौर पर नहीं, बल्कि विद्वान् के रूप में मालुम हुए.  दुनिया के सभी भागों से पार्टी के साथी उनके अध्ययन कक्ष में समाजवादी विचारधारा के आचार्य से राय लेने आते थे.

उनके कमरे में अखबारों और हस्तलेखों के पैकेट छत तक गंजे हुए थे. कमरे के बीचो बीच ३ फूट लम्बी और २ फूट चौड़ी सीधी सादी लिखने की मेज और एक लकड़ी की आराम कुर्सी थी. एक चमड़े से ढंका सोफा था, जिस पर विश्राम करने के लिए समय समय मार्क्स लेट जाया करते थे. फायर प्लेस के ऊपर वाले छज्जे पर और भी किताबें थीं, जिनके बीचों बीच सिगार, माचिस के बक्से, तम्बाकू का डिब्बा, पेपर वेट, अपनी लड़कियों, पत्नी जेनी, फ्रेडेरिक एंगेल्स और विल्हेम वोल्फ के फोटो थे.

सिगार के शौक़ीन मार्क्स:

मार्क्स बहुत ज्यादा तम्बाकू पीते थे. उन्होंने मुझसे कहा था: कैपिटल उतना भी पैसा नहीं ले आएगा, जितने की इसके लिखते वक़्त मैंने सिगार पी डाले.” दियासलायियों के इस्तेमाल में तो वह बहुत ही फजूलखर्च थे. वह अपने पाइप या सिगार को जलाते वक्त अक्सर भूल जाते. जल जाने के बाद भी वह एक के बाद एक दियासलाई जलाकर सुलगाते हुए थोड़े ही समय में एक पूरी दियासलाई की डिबिया ख़त्म कर देते.

Marx and Jenny

वह अपनी किताबों और कागजों को ठीक ठाक करके रखने  की इज़ाज़त किसी को नहीं देते. किताबें जो देखने में अस्त व्यस्त मालुम होती थीं, वो दरअसल अपने ठीक स्थान पर थीं. और बिना ढूंढने का प्रयत्न किये, वह जिस किताब या हस्तलेख को चाहते, उसे हाथ से उठा लेते थे. बातचीत करते समय भी वह अक्सर किताबों में से सम्बंधित वाक्य या तस्वीर दिखाने के लिए रुक जाते. अपने अध्ययन कक्ष में वह एक हो गए थे, वहां किताबें और कागज़ उसी तरह उनकी आज्ञा का अनुसरण करते थे, जैसे उनके शरीर के अंग.

उनके लिए किताबें शौकीनी की चीज  नहीं, बल्कि बौद्धिक हथियार थीं. वह पुस्तकों के रूप, जिल्द, कागज़ या छपाई की सुन्दरता का ज़रा भी ख्याल न रखते थे- वह पन्नों के कोने मोड़ देते, वाक्यों के नीचे पेन्सिल खीच देते और हाशिये को पेन्सिल की निशानी से ढांक देते.

कुछ वर्षों के अंतर से अपनी नोट बुक्स और किताबों में चिन्हित किये गए वाक्यों को अपनी स्मृति ताजा करने के लिए फिर से पढने की उनकी आदत थी. उनकी स्मृति असाधारण तीव्र और निर्भ्रांत थी. हायने और गोयथे उन्हें कंठस्थ थे और बातचीत में अक्सर उनका उद्धरण दिया करते थे. सभी यूरोपीय भाषाओँ के कवियों की कृतियों को चुनकर वह लगातार पढ़ा करते.

वह अक्सर दो या तीन उपन्यास एक साथ शुरू किये रहते और उन्हें बारी बारी से पढ़ते. फील्डिंग की टॉम जोंस उन्हें विशेष तौर पर प्रिय थीं. स्कॉट की ओल्ड मोर्टेलिटी को वह मास्टरपीस समझते थे. बालज़ाक को वह उपन्यास का महान आचार्य मानते थे.

नयी नयी भाषाओँ को सीखने के महारथी मार्क्स:

मार्क्स यूरोप की सभी प्रमुख भाषाएँ पढ़ सकते थे और उनमे से तीन- फ्रेंच, जर्मन और इंग्लिश में इतने सुन्दर ढंग से लिख सकते थे कि जिसे देख उन भाषाओँ से परिचितों के दिल से सम्मान पैदा होता था. वह कहा करते थे, ” जीवन संघर्ष में विदेशी भाषा हथियार का काम देती है.”

उनमे भाषाएँ सीखने की बड़ी प्रतिभा थी. पचास वर्ष के हो चुके थे, जब उन्होंने रुसी भाषा सीखना शुरू किया. छह महीने के भीतर उन्होंने इतनी प्रगति कर ली कि रुसी कवियों और लेखकों, खासकर पुश्किन, गोगोल और स्चेद्रिन की कृतियों को मूल भाषा में पढ़कर आनंद ले सकते थे.

गणित से बेहद प्रेम:

मानसिक विश्राम के लिए कविता और उपन्यास पढने के अतिरिक्त मार्क्स का गणित के लिए अत्यधिक प्रेम था. अलजेब्रा उन्हें हार्दिक संतोष देता था. अपनी पत्नी की अंतिम बिमारी के दिनों में अपने वैज्ञानिक कार्यों को वह यथावत नहीं कर पाते थे. पत्नी के दुस्सह कष्टों के विचार से अपने को राहत देने के लिए वह गणित में डूब जाते थे. आतंरिक दुस्सह पीड़ा के इस काल में उन्होंने “अनंतलव कलन” पर एक निबन्ध लिख डाला था, जो कि जानकार गणितज्ञों के मतानुसार प्रथम श्रेणी के महत्व का है.

 

मार्क्स के पुस्तकालय में एक हज़ार से ज्यादा जिल्दें थीं, जिन्हें अपने अनुसन्धान के जीवन में उन्होंने कड़ी मेहनत से जमा किया था और जो उनकी आवश्यकताओं के लिए अपर्याप्त थीं. अनेक वर्षों तक वह लगातार ब्रिटिश म्यूजियम की लाइब्रेरी में जाया करते थे.

यद्यपि वह सदा बहुत देर से सोने जाते थे, लेकिन सुबह 8 से 9 बजे के बीच सदा उठ खड़े होते. काली कॉफ़ी का एक प्याला पीकर वह अखबार पढ़ते, फिर अपने अध्ययन कक्ष में चले जाते, जहाँ वह रात के दो तीन बजे तक काम करते- बीच में सिर्फ खाने के समय उठते और जब मौसम अच्छा होता तो हेम्स्तेद हीथ में टहलने जाते. दिन में सोफा पर एक या दो घंटे सो जाते. जवानी में सारी सारी रात पढने लिखने में बिता देने की उन्हें आदत थी.

मार्क्स के लिए काम एक बिमारी थी और वह उसमे इतने तल्लीन हो जाते थे कि अपना भोजन भी भूल जाते थे. वह अल्पभोजी थे और भूख उन्हें कम लगती थी, जिसको उत्तेजित करने के लिए वह बहुत मसालेदार तली हुई चीजें- हैम, भुनी मछली, मुरब्बा और आचार खाया करते थे. दिमाग की जबरदस्त मेहनत के लिए उनके पेट को दंड भोगना पड़ता.

वह घंटों टहल सकते थे और बात करते और पाइप सिगार पीते जरा भी थकावट का परिचय दिए बिना पहाड़ों पर भी चढ़ जाते थे. अपने अध्ययन कक्ष में टहलते समय भी वह अपना काम किया करते थे.

मार्क्स के हृदय और उनके प्रेम को जानने के लिए उन्हें अपने दोस्तों और परिवार के बीच रविवार की शाम देखना चाहिए था. ऐसे समय वह बड़े ही आनंदी साथी, हाज़िर जबाब, अद्भुत मजाकी दिखाई पड़ते. उनका ठहाका हृदय के अंतस्तल से आता था.

बच्चों के बेहद प्रिय मार्क्स :

वह बच्चों के लिए भद्र, कोमल और दुसरे के भावों का सम्मान करने वाले पिता थे. वह अक्सर कहा करते थे, “बच्चो को अपने माता पिता को शिक्षित करना चाहिए.” उनकी बेटियां उन्हें अपना मित्र जैसा समझती थीं और साथ खेल के साथी जैसा बर्ताव करतीं.वह उन्हें बापू नहीं, बल्कि “मूर” कहकर संबोधित करतीं. अपेक्षाकृत अधिक श्यामल रंग और आबनूस जैसे काले बालों और दाढ़ी के कारण उन्हें यह नाम मिला था.

1844 में भी, जब कि वे 30 वर्ष के भी नहीं हुए थे, कम्युनिस्ट लीग के उनके साथी मेम्बर उन्हें बापू मार्क्स कहा करते थे. वह अपने बच्चों के साथ घंटों खेला करते थे.


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