बाजीराव मस्तानी: मराठा जनरल की अद्भुत प्रेम कहानी

नवीन शर्मा

बाजीराव मस्तानी कहानी है मराठा योद्धा पेशवा बाजीराव प्रथम की. बीस साल तक मराठा आर्मी का नेतृत्व किया इस युवा योद्धा ने. और इन बीस सालों में इसने दक्कन में निजाम को बार बार परास्त किया, दिल्ली में मुग़ल सल्तनत को अपनी तलवार की छाँव दी, मराठा परचम अटक से कटक तक लहराया. बाजीराव ने महज चालीस वर्ष की अवस्था में मिलिट्री कैंप में अंतिम साँस ली. दुनिया बाजीराव को एक योद्धा के रूप में तो याद रखती ही है, और साथ ही जानती है उसे उसके प्रेम के लिए. बाजीराव ने मस्तानी नामक नर्तकी से प्रेम किया और सामाजिक विरोध सहते हुए भी प्रेम को अंतिम तक निभाया. भारतीय इतिहास की इसी अमर प्रेम गाथा को सुनहरे परदे पर उतारा संजय लीला भंसाली ने.

संजय लीला भंसाली की बाजीराव मस्तानी ऱणवीर सिंह के कैरियर की अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्म है. प्रियंका तो पिछले कई वर्ष से उम्दा कलाकार के रूप में सामने आई है खासकर मैरीकोम में उन्होंने जबर्दस्त अभिनय किया था. बाजीराव में हालांकि प्रियंका नायिका की भूमिका में नहीं हैं लेकिन उन्होंने काशीबाई (बाजीराव की पत्नी ) के द्वंद्व को बखूबी उजागर किया है. अपने पति के किसी दूसरी औरत के साथ प्रेम में पड़ने पत्नी पर क्या गुजरती है यह दर्द पूरी फिल्म में प्रियंका ने अपनी खामोशी, उदासी से उम्दा तरीके से उभारा है. ऐसा भी लगता है कि वे दीपिका पर भारी पड़ी हैं. दीपिका ने भी मस्तानी के किरदार में जान डाली है. वे सुंदर तो हैं ही मस्तानी में आइना महल के दृश्य में और भी सुंदर लगी हैं. आइना महल का सेट लाजवाब बनाया गया है. भंसाली भव्य सेट बनवाने में माहिर हैं.

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युद्ध के दृश्यों में रणवीर का डिलडौल और एक्सप्रेशन शानदार है. ऐसा लगता है कि वे सचमुच युद्ध कर रहें हैं. लेकिन युद्ध के दृश्यों की अगर बाहुबली से तुलना करें तो वे कहीं नहीं टिकते हैं. वैसे यह भी कहा जा सकता है कि बाहुबली जहां मूल रूप से एक्शन फिल्म थी वहीं बाजीराव लव स्टोरी है. इस फिल्म में बाजीराव की विजयगाथा पर उतना जोर नहीं है जितना कि प्रेमकथा पर. यहीं बात इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी भी है और कमजोरी भी है. अगर विजयगाथा पर भी उसी अनुपात में जोर रहता तो शायद ये फिल्म बेहतरीन पीरियड फिल्म में शुमार हो सकती थी.

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बाजीराव फिल्म की सटीक तुलना जोधा-अकबर से ही की जा सकती है. इन दोनों फिल्मों की पृष्ठभूमि मुगलकाल है. दोनों में प्रेमकथा पर जोर है. इसके बावजूद आशुतोष गोवारिकर की जोधा-अकबर बाजीराव की तुलना में बेहतर पीरियड फिल्म कही जाएगी. अाशुतोष ने अकबर के जीवन के अन्य पहलुओं और विजयगाथा को ज्यादा अच्छी तरह पेश किया है. बाजीराव मस्तानी में कुछ गीत जबरन ठूंसे हुए लगते हैं. इससे फिल्म की गति प्रभावित होती है और लंबाई बढ़ गई है. एक-दो गाने कम करके बाजीराव के व्यक्तित्व के अन्य पहलुओं को दिखाया जा सकता था. रणवीर सिंह के अभिनय में एक बात खली. वो अपने डायलॉग डिलिवरी में गोलियों की रासलीला-रामलीला के स्टाइल पर अटक गए लगते हैं. उनका कई शब्दों को लहराते हुए बोलना खटकता है. इससे बाजीराव का व्यक्तित्व थोड़ा प्रभावित होता है.फिल्म के सहयोगी कलाकारों ने भी अच्छा काम किया है, खासकर तन्वी आजमी ने.

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