ऋषिकेश मुखर्जी हिंदी सिनेमा के नायाब निर्देशक

नवीन शर्मा
ऋषिकेश मुखर्जी 50 के दशक में बंबई बिमल रॉय के ग्रुप साथ हिंदी सिने जगत पर राज करने के लिए आए थे. बिमल रॉय की फिल्मों में वे एडिटर थे. तब तक बिमल रॉय के साथ ऋषि दा लगभग पांच साल तक उनके न्यू थियेटर्स में काम कर चुके थे. बंबई पहुंचकर सभी ने काम की तलाश में भटकना शुरू किया. बिमल रॉय की पूरी टोली एक दिन इरोज में मशहूर जापानी फिल्मकार अकीरा कुरोसावा की फिल्म रशोमोन देखने गई. वापस लौटने के बाद फिल्म ने उन सभी पर इतना गहरा प्रभाव छोड़ा की बेस्ट (BEST) की बस में बैठकर आते वक्त किसी ने एक दूसरे से बात नहीं की. तभी बिमल दा ने कहा कि ऐसी फिल्में कौन लिखेगा यहां पर? जवाब उनको मिला ऋषि दा से. ऋषि दा ने कहा कि आप मौका दीजिए लिखने का. उस डबल डेकर बेस्ट बस के सफर में इतिहास बनने जा रहा था. इस पूरी बातचीत के बाद बिमल रॉय प्रॉडक्शन्स की नींव उसी बेस्ट की बस में बनी थी.

पहली निर्देशित फिल्म मुसाफिर

ऋषिकेश मुखर्जी ने बतौर डायरेक्टर अपने करियर की शुरुआत 1957 में रिलीज फिल्म ‘मुसाफिर’ से की थी. दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन और किशोर कुमार जैसे सितारों की मौजूदगी भी इस फिल्म को हिट नहीं करा सकी. इस फिल्म में दिलीप कुमार ने लता मंगेशकर के साथ एक गाना गया था. इसी फिल्म में रफ़ी ने दिलीप कुमार के दोस्त की एक छोटी सी भूमिका परदे पर निभायी थी.

राजकपूर की अनाड़ी सुपरहिट रही

1959 में ऋषिकेश मुखर्जी को राजकपूर की फिल्म ‘अनाड़ी’ में डायरेक्शन का मौका मिला. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई और ऋषिकेश मुखर्जी का करियर भी बुलंदियों पर पहुंच गया. ऋषिकेश ने अपने करियर में कई हिट फिल्में दी, जिसमें ये फिल्में बेहद खास रहीं.

आनंद कैंसर पीड़ित की मार्मिक दास्तान

1971 में रिलीज हुई ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद उनकी क्लासिक फिल्मों में से एक हैं. ‘कैंसर पीड़ित किरदार को जिस ढंग से राजेश खन्ना ने जिया, वह बाद की पीढ़ी के कलाकारों के लिए उदाहरण बन गया.

ऐसी मिली ‘गुड्डी’ की कहानी

ऋषि दा अपनी कहानियों को आम जिंदगी से ही उठाते थे और इसका एक जीता जागता नमूना खुद उनकी फिल्म गुड्डी है. एक बार हवाई जहाज़ में सफर करते वक्त उनकी मुलाकात हो गई अभिनेत्री नूतन और तनुजा की बहन चारुता से. चारुता उस वक्त बतौर एयर होस्टेस काम किया करती थी. ऋषि दा उन दिनोंं आनंद की शूटिंग शुरु कर चुके थे. चारुता ठहरी राजेश खन्ना की ज़बरदस्त फैन लिहाजा हर दो मिनट पर वो ऋषि दा से अपने पसंदीदा सितारे के बारे में पूछने आ जाया करती थी. सितारों के आम जनता के मानस पटल पर उनके करिश्मे को ऋषि दा ने गुड्डी में अपना केंद्र बिंदु बनाया.
फिल्म ‘गुड्डी’ के जरिए ऋषिकेश मुखर्जी ने एक ऐसी लड़की की कहानी बताई, जो फिल्में देखने की काफी शौकीन है और उसे धर्मेंद्र से प्यार हो जाता है. अपने इस किरदार को जया भादुड़ी ने इतने चुलबुले तरीके से निभाया कि दर्शक आज भी याद करते हैं.

अभिमान में पत्नी के साथ ईगो का टकराव

1973 में रिलीज हुई फिल्म ‘अभिमान’ ऋषिकेश मुखर्जी की लोकप्रिय फिल्मों में से एक है. अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने एक ऐसे अभिमानी पति की भूमिका निभाई जो पत्नी को गायन के क्षेत्र में बढ़ता देखकर अंदर ही अंदर जलने लगता है. जया भादुड़ी अपने किरदार को आत्मसात करने के लिए कई बार लता मंगेशकर के गीतों की रिकार्डिंग देखने जाती थीं. फिल्म में जया के किरदार का पहनावा, हावभाव व गाने की शैली लता जी को बारिकी से आब्जर्व कर रचा गया. इस फिल्म के गीत तो सदाबहार हैं जैसे तेरे मेरे मिलन की ये रैना, लूटे कोई मन का नगर बन के मेरा साथी, नदिया किनारे हेराय आई कंगना व कोई मीत ना मिला रे मन का आदि.

‘चुपके चुपके’ लाजवाब कामेडी

फिल्म ‘चुपके चुपके’ उस वक्त रिलीज हुई जब बॉलीवुड में मारधाड़ वाली फिल्मों का चलन शुरू हो गया था. इस दौर में अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र को लेकर फिल्मकार एक्शन फिल्में बनाया किया करते थे, लेकिन उन्होंने उन दोनों एक्शन हीरो को लेकर हल्की-फुल्की फिल्म ‘चुपके चुपके’ बनाई, जो उस दौर की हिट फिल्म साबित हुई. इस फिल्म में धर्मेंद्र के किरदार की संस्कृतनिष्ठ हिंदी सुन कर आप पेट पकड़ कर हंसने को मजबूर हो जाएंगे. वहीं अोमप्रकाश की गंभीर होकर संवाद अदायगी भी आपको हंसने को मजबूर कर देगी. ऐसी साफ सुथरी कामेडी फिल्‍में बाद के दौर में दुर्लभ हो गईं.

गोलमाल यानी हंसी का खजाना

अमोल पालेकर के डबल रोल वाली गोलमाल लाजवाब कामेडी फिल्‍म है. इसमें अमोल पालेकर और उत्पल दत्त के बीच जब भी संवाद होता थी तो आप मुस्काने पर मजबूर हो जाएंगे. इसी फिल्‍म का ही प्रभाव देखिए कि कई दशक बाद गोलमाल के नाम से तीन फिल्‍मों का सिक्वल बनाया गया.

ऐसा काम करते थे दा

उनके काम करने के स्टाइल को लेकर एक बार गुलजार ने अपने एक साक्षात्कार में रोशनी डाली थी. उनके बक़ौल ऋषि दा एक्स्ट्रा शॉट्स या फिर एक्स्ट्रा एंगल में विश्वास नहीं करते थे और एडिटर होने की वजह से फिल्म के सारे सीन्स अपने दिमाग में ही एडिट कर लिया करते थे. जब सेट पर फिल्म के सींस को फिल्माने का काम चल रहा होता था तो उस दरमियान ऋषि दा शतरंज के खेल में व्यस्त रहते थे और अचानक बीच बीच में इंस्ट्रक्शन्स देते रहते थे.


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