#अपनाशहर; मेरी रांची, प्यारी रांची

नवीन शर्मा 

रांची में ही जन्म हुआ था. करीब चार दशक तक इस शहर को करीब से देखा,जाना और महसूस किया है. इससे प्यार भी है. कई शहर को देखने के बाद भी कई कमियों के बावजूद अपनी रांंची ही अच्छी लगती है, लेकिन पिछले दो दशकों में इसके रूप और मिजाज में बदलाव हुए हैं उनमें से कई रास नहीं आते हैं. अभी रांची स्मार्ट सिटी के लिए चुना गया है. ब्यूरोक्रेट कई योजनाएं बनाने में लगे हैं, लेकिन मेरी बस छोटी सी ख्वाहिश है कि मेरी रांची स्वच्छ, सुंदर, हरी-भरी और सुव्यवस्थित रहे. स्मार्ट सिटी बनने की राह तो काफी लंबी है देखना है कि ये सफर कैसी तय होता है.


पिछले दो दशक में रांची की आबादी अंधाधुंध बढ़ी है खासकर 2000 में राजधानी बनने के बाद राज्य भर से और बाहर से भी काफी लोग यहां आकर बस गए हैं लेकिन इस बढ़ती आबादी के हिसाब से शहर का योजनाबद्ध ढंग से विकास करने की और सरकार ने गंभीरता से कोई प्रयास ही नहीं किया.  सारा आवासीय और अन्य ढांचा बहुत ही बेतरतीब ढंग से विकसित हुआ. शहर में अशोक नगर और अरगोड़ा को छोड़ दिया जाए तो अन्य कोई व्यवस्थित कॉलोनी नहीं हैं. कई मुहल्लों में कई काफी छोटी-छोटी संकीर्ण गलियां हैं जहां छोटी कार भी नहीं जा सकती है. यहां के मकान भी बिना नक्शा पास किए बन गए. नगर निगम का इनपर कभी अंकुश नहीं रहा. 


कभी अधिकारी अगर किसी का निरीक्षण करने जाते भी हैं तो ले-देकर मामला सलटा दिया जाता है. सीएनटी एक्ट के बावजूद आदिवासियों की जमीन पर अवैध ढंग से कब्जा करके भी कई अपार्टमेंट और माल बना दिये गए हैं. सड़कें किसी भी शहर की लाइफलाइन होती हैं लेकिन रांची में कुछ मुख्य सड़कों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर सड़कों में आपको छोटे-मोटे गढ़े दिख ही जाएंगे.
नालियां तो जैसे जरूरी ही नहीं है- यह अजब स्थिति है हड़प्पा संस्कृति के दौर में भी सुव्यस्थित ढंग से नालियां बनी होती थीं लेकिन रांची में शायद ही किसी मुख्य सड़क पर ढंग की नालियां हों. जो हैं वो भी आधी अधूरी. कुछ तो सड़क से भी ऊंची बनाई जा रही हैं.


सफाई व्यवस्था ध्वस्त- सबसे अधिक कोफ्त इसी बात से होती है. आप जिस भी सड़क और गली से गुजर जाइएं आपको गंदगी का अंबार नजर आ जाएगा. ना तो ढंस से कुड़े का उठाव होता है और ना ही उसका निस्तारण.


बिजली के नंगे तार- आज इक्कीसवीं सदी में भी हमारे शहर में एक दो सड़कों को छोड़ दे तो बिजली के तार ऊपर आसमान में ही झूल रहे हैं. इसी वजह से बारिश के मौसम में जैसे ही तेज हवा चलती है बिजली काटकर समाधान निकाल दिया जाता है.
यातायात व्यवस्था जैसी कोई चीज है ही नहीं– शहर में यातायात व्यवस्था जैसी चीज है ही नहीं. रोज जाम लगा यहां का आम दृश्य है लोग इसके अभ्यस्त से हो गए हैं.


मौसम का मिजाज भी बदल गया- रांची कभी ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी लेकिन अब वो बात नहीं रही. तेजी से बढ़ती आबादी और कंक्रीट के बेतरतीब ढंग से उग आए जंगल ने रांची की सबसे बड़ी खूबी पर ग्रहण लगा दिया है. अस्सी के दशक तक करोड़पति के घर में भी एसी और कुलर आपको नजर नहीं आते. महज पंखे से ही गर्मी निकल जाती थी. जिस दिन अधिक ग्रमी पड़ती थी उस दिन शाम को बारिश होनी लगभग तय थी. बारिश के मौसम में कई बार हफ्ते भर तक सूरज भगवान के दर्शन नहीं होते थे. अब आद्रता ने एसी की अनिवार्यता बढ़ा दी है. कोहरे के कारण नयी तरह की समस्या हो रही है. गर्मी में मेहमाननवाजी के बदले रांचीवासी खुद ही हिल स्टेशनों का रुख करने लगे हैं.


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